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मोदी राज के आखिरी महीनों में बर्बादी की कगार पर ONGC

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Girish Malviya

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देश की नवरत्न कंपनी कहे जाने वाली ओएनजीसी भी मोदी राज के आखिरी महीनों में बर्बादी की कगार पर पुहंच गयी है. मार्च 2017 में ओएनजीसी का कैश रिजर्व 9,511 करोड़ था. जो अब घटते-घटते सितंबर 2018 मे 167 करोड़ ही रह गया.

ओएनजीसी के पूर्व निदेशक आलोक कुमार बनर्जी कहते हैं कि 63 साल में ऐसा पहली बार हुआ है कि जब कंपनी का कैश रिजर्व इस स्तर पर पहुंचा है. इससे पहले कभी भी कंपनी के हालात इस तरह के नहीं थे. उन्होंने इसे अलार्मिंग सिचुएशन कहा है.

वो कहावत है न कि ‘जहां जहां पांव पड़े संतन के तहां तहां बंटाढार’ ….. ओएनजीसी को मोदी सरकार ने घाटे में डालने की शुरुआत तब की जब उन्होंने गुजरात राज्य पेट्रोलियम निगम जीएसपीसी को ओएनजीसी को आठ हजार करोड़ रुपये में बेच दिया.

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जीएसपीसी के माध्यम से गुजरात में भ्रष्टाचार के बहुत बड़े खेल खेले गए. गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए नरेंद्र मोदी ने घोषणा की थी कि गुजरात राज्य पेट्रोलियम निगम जीएसपीसी ने 20 खरब क्यूबिक फुट गैस की खोज की है जो दो लाख 20 हजार करोड़ रुपये से अधिक लागत की है.

जो कि सफेद झूठ था क्योंकि हजारों करोड़ रुपये खर्च किए गए लेकिन एक क्यूबेक फुट गैस भी नहीं मिली. जब घाटा सामने आने लगा तो ओएनजीसी को आठ हजार करोड़ रुपये में बेच दिया गया. यहीं से ओएनजीसी की बर्बादी की शुरुआत हुई. जो कंपनी 2015 तक हजारों करोड़ का शुद्ध लाभ दिखलाती थी उसे गड्ढे में उतार दिया गया.

लेकिन इतने से भी मोदी सरकार का जी नहीं भरा. उन्होंने संबित पात्रा को इस कंपनी का स्वतंत्र डायरेक्टर अपॉइंट करवाया और फिर एक नया खेल विनिवेश के नाम पर खेला गया.

नोटबंदी और GST के बाद सरकार की आर्थिक स्थिति लड़खड़ाने को आई थी. उसे कहीं ज्यादा पैसे की जरूरत थी. 2017-18 में सरकार ने 72,500 करोड़ रुपये के विनिवेश लक्ष्य के मुकाबले 11 जनवरी तक 54,337 करोड़ रुपये का विनिवेश लक्ष्य ही हासिल किया था.

वित्त वर्ष खत्म होने में सिर्फ 50 दिन बचे थे. लेकिन मोदी सरकार ने बड़ी गजब की बाजीगरी दिखाई. जिसे देख कर बड़े बड़े अर्थशास्त्रियों ने भी अपना सर पीट लिया. उसने अपनी ही कंपनी की हिस्सेदारी अपनी ही किसी दूसरी कंपनी के हाथों बेचने की योजना बना ली. मोदी सरकार ने डूबती हुई हिंदुस्तान पेट्रोलियम काॅरपोरेशन लिमिटेड यानी एचपीसीएल में अपनी कुल 51 फीसदी हिस्सेदारी ओएनजीसी को बेच दी.

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दूसरी तरह से कहा जाए तो मोदी सरकार ने खुलेआम मनमानी करते हुए ओएनजीसी की बैलेंस शीट से कैश निकालकर अपने खजाने में डाल दिया था. इस सौदे को “वर्टिकल मर्जर” कहा गया. इस वजह से ONGC का पूरा भट्टा बैठ गया. उसके पास जितना भी कैश था वह उसने सरकार को उठा कर दे दिया और अलग से बाजार से 25 हजार कर्जा भी उठाना पड़ा.

आपको याद होगा कि ओएनजीसी के गैस क्षेत्र से रिलायंस इंडस्ट्रीज द्वारा कथित तौर पर गैस निकाल लिये जाने के मामले में रिलायंस से 1.50 अरब डॉलर की मांग को मध्यस्थता अदालत ने खारिज कर दिया था. उस मामले में भी मोदी सरकार द्वारा कोई इंटरेस्ट नही दिखाया गया था.

इसके अलावा मोदी सरकार के मंत्री लगातार दबाव बनाकर पिछले चार सालों से ONGC से पैसा लेकर खर्च कर रहे हैं. चाहे एलपीजी कनेक्शन वितरण हो, शौचालय बनाना हो, गांवों को गोद लेना हो या फिर लड़कियों के लिए सैनिटरी नैपकिन वितरण हो हर काम के लिए सरकारी योजनाओं के फंड के बजाए ओएनजीसी के सीएसआर का पैसा लगाने का लगातार दबाव बनाया जा रहा है.

ओर यह बात हम नहीं कह रहे हैं यह ONGC के कर्मचारियों का संघ कह रहा है. लेकिन किसी न्यूज चैनल और मीडिया हाउस की यह ताकत नहीं है कि इन सब तथ्यों के मौजूद रहते हुए इस तरह की पूरी खोज कर स्टोरी सामने लाए. जिसमें इन सभी तथ्यों का समावेश हो कि ONGC जैसी देश की शान कहे जाने वाली कंपनी आज बर्बादी की कगार पर कैसे पहुंच गयी.

Girish malviya आर्थिक मामलों के जानकार हैं. यह लेख उनके फेसबुक वॉल से लिया गया है. लेख में उल्लेखित तथ्य उनके निजी जानकारी और विचार हैं. 

 

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