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कभी गांव की कच्ची सड़कों पर खेला करती थी, आज विदेशों की धरती पर बिखेर रही है जलवा

Khunti: ऊपर वाला समस्याऐं उन्हें ही देता है, जिनमें लड़कर सफल होने की क्षमता होती है. खूंटी के एक गांव हेसेल की बेटी निक्की प्रधान गंवई परिवेश में पली-बढ़ी. गांव की कच्ची सड़कों पर हॉकी खेली. तमाम चुनौतियों लड़कर आगे बढ़ी और विदेशों के टर्फ पर हॉकी खेलती हैं.

निक्की प्रधान चार बहन थीं और उनका एक भाई था. पिता पिता पुलिस में थे (अब सेवानिवृत). गांव के लोग हमेशा कहा करते थे कि चार बेटी ही है इन्हें काफी परेशानी होगी. गांव वालों की यह बातें निक्की को चुभती थी. मन ही मन सोचती थी कि एक दिन मेरी सफलताऐं गांव के लोगों के इस ताने-बाने का जवाब होगा.

मैदान विहीन गांव में हॉकी में कैरियर दिखा निक्की को

हेसेल एक ऐसा गांव है जहां हॉकी का मैदान भी नहीं है. इस गांव में रहकर निक्की को हॉकी में अपना कैरियर नजर आया. उसने गांव की कच्ची सड़कों पर सहेलियों के साथ अभ्यास शुरू किया. वर्ष 2006 में स्कूल के शिक्षक सह हॉकी कोच दशरथ महतो का भरपूर के बल पर निक्की प्रधान का चयन जुनियर साई सेंटर, बरियातु में हो गया. निक्की के हौसले को उड़ान मिलने लगा. गांव की लड़की को हॉकी का बेसिक पता नहीं था. वह सीखना चाहती थी, लेकिन उसे हॉस्टल से निकाल दिया गया. अब उसे लगा कि अब हॉकी में आगे बढ़ने की संभावना खत्म हो गई. लेकिन निक्की के सपनों में जान था. उसे स्टेट हॉस्टल में रखा गया. 2010 में जब वह 12वीं पास कर गई, तब उसे हॉस्टल छोड़ना पड़ा. लेकिन सिल्वानुस डुंगड़ुंग समेत अन्य लोगों के सहयोग से उसे हॉस्टल में ही एक कमरा दिया गया. लेकिन खाना-पीना अपने पैसे से स्वयं बनाना और खाना पड़ता था. यह सबकुछ करते हुए निक्की ने अभ्यास में कभी कोई कमी नहीं छोड़ी.

2011 बेस्ट ईयर साबित हुआ

2011 निक्की के लाईफ का बेस्ट ईयर साबित हुआ. रांची में नेशनल गेम आयोजित हुआ, जिसमें इंटरनेशनल प्लेयरों के साथ निक्की का चयन भी झारखंड टीम में हुआ. वह उछल पड़ी. मन ही मन सोचा यह मौका वह हाथ से जाने नहीं देगी. हालाकि हॉकी से जुड़े कई लोगों ने कहा कि झारखंड में निक्की समेत अन्य चार लड़कियों का चयन क्यों हुआ. यहां तो और भी अच्छी प्लेयर हैं. यह निक्की का फर्स्ट मैच था. उसने लेफ्ट हाफ से खेलते हुए एक गोल मारकर टीम को जीत दिलाने के साथ उन सारे लोगों के मुंह पर ताला लगा दिया, जिसने कहा था कि निक्की का चयन क्यों हुआ.

उसी साल निक्की जुनियर कैंप में भोपाल चली गई. 2011 में बैंकॉक में आयोजित खेल में इंडिया जुनियर टीम से खेलते हुए भारत को तीसरा स्थान दिलाया. 2012 में उसे इस्टर्न रेलवे में जॉब मिल गया. और उम्र सीमा पार करने के कारण वह जुनियर टीम से बाहर हो गई. उसे लगा अब सिनियर टीम में शामिल होना मुश्किल होगा. लेकिन सपनों में दम थे निक्की के. वह काम करती और अभ्यास भी. खाना भी स्वयं पकाती थी. थकती थी, लेकिन हार कभी नहीं मानी.

सफलताओं का लगा तांता

निक्की ने जिन मैचों में हिस्सा लिया उनमें प्रमुख हैं:

वर्ष 2015 में सिनियर महिला ट्रायल में 20 खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया, लेकिन सेलेक्शन हुआ सिर्फ निक्की का.

2016 में ब्राजिल में आयोजित ओलम्पिक में खेलने का मौका मिला.

2016 में ही सिंगापुर में एशियन चैम्पियन ट्रॉफी में निक्की की टीम ने गोल्ड मेडल जीता.

2017 में जापान में आयोजित महिला एशिया कप में इंडिया टीम से खेली और इंडिया ने गोल्ड मेडल जीती.

2018 में ऑस्ट्रेलिया में कॉमन वेल्थ में इंडिया चौथे स्थान पर रहा. इसी वर्ष कोरिया में एशियन चैम्पियनशिप में इंडिया की टीम दुसरे स्थान पर रही.

2018 में लंदन में आयोजित वर्ल्ड कप में इंडिया की टीम 30 सालों बाद क्वाटर फाइनल मैच तक पहुंची.

2018 में इंडोनेशिया में आयोजित एशियन गेम में इंडिया को सिल्वर मेडल मिला.

2020 में टोक्यो में 20-20 ओलम्पिक टेस्ट इवेंट में इंडिया ने गोल्ड मेडल जीता.

2021 के जनवरी में निक्की अर्जेंटीना और फरवरी में जर्मनी में प्रैक्टिस मैच खेलने गई थी. जहां से वह सात जनवरी को ही वापस लौट आई है.

महिला दिवस पर दिया संदेश

महिला दिवस पर निक्की प्रधान ने देश की महिलाओं को शुभकामना दी है. इसके साथ ही उन्होंने अपने संदेश में कहा है कि महिलाओं को और उनके प्रति लोगों को सोच बदलना होगा. आज महिला और पुरूष दोनो सामानांतर हैं. महिलाओं में भी काबिलियत है, जो अपने बल पर ढ़ेरो मुकाम हासिल कर सकतीं हैं.

गांव में हॉकी मैदान नहीं होने का टिस है निक्की के मन में

हेसेल गांव जहां से पुष्पा प्रधान और निक्की प्रधान अंर्तराष्ट्रीय हॉकी प्लेयर हैं. हेसेल गांव की लगभग दो दर्जन लड़कियां हॉकी की नेशनल प्लेयर हैं. इसके बावजूद हेसेल गांव में एक अदद खेल का मैदान नहीं होने का टिस निक्की के मन में है. खूंटी में हॉकी की महिला खिलाड़ियों के अलग से हॉस्टल नहीं होने का अफसोस भी निक्की को है.

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