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परंपराः वसंत पंचमी पर बाबा को तिलक चढ़ाने उमड़ा मिथिलावासियों का हुजूम

मिथिलावासी अपने को पार्वती का भाई और बाबा भोले को बहनोई मानते हैं

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Deoghar: वसंत पंचमी का पर्व देश भर में विद्या की देवी मां सरस्वती की पूजा-अर्चना के रुप में मनाया जाता है, लेकिन देवघर के विश्व प्रसिद्ध बाबा बैद्यनाथ मंदिर में आज का दिन बाबा बैद्यनाथ के तिलकोत्सव के रूप में  मनाया जाता है. तिलक की इस रस्म को अदा करने के लिए बाबा के ससुराल यानी मिथिलांचल से बड़ी संख्या में श्रद्धालु अलग तरह का कांवर लेकर बाबा धाम पहुंचते हैं. बाबा का तिलकोत्सव कर अबीर-गुलाल लगा एक-दूसरे को बधाई देते है और शिवरात्रि के अवसर पर शिव विवाह में शामिल होने का संकल्प लेकर वापस लौटते हैं.

क्या है बाबा के तिलक के पीछे की कथा

माघ शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को यानी आज, बाबा बैद्यनाथ मंदिर में श्रद्धालुओ की अपार भीड़ उमड़ पड़ी है. यह भीड़ है मिथिलांचल से बाबा के तिलकोत्सव में शामील होने आये श्रद्धालुओ की. प्रत्येक वर्ष बसंत पंचमी के दिन बाबा का जलाभिषेक करने ये भक्त देवघर आते हैं. विशेष प्रकार के कांवर, वेशभूषा और भाषा से अलग पहचान रखने वाले ये मिथिलावासी अपने को बाबा का संबंधी मानते हैं. इसी नाते आज के दिन बाबा के तिलकोत्सव में शामिल होने देवघर आते हैं. इन्हें तिलकहरु कहते है. तिलकोतस्व मनाने की यह परंपरा सदियों से चली आ रही है. मिथलावासियों का मानना है कि माता पार्वती, सती, एवं माता सीता हिमालय पर्वत की सीमा की थीं और मिथिला हिमालय की सीमा में है. इसलिए माता पार्वती मिथिला की बेटी है. इसलिए मिथिलावासी लड़की पक्ष की तरफ से आते हुए तिलकोत्सव मनाते हैं. कई टोलियों में आये ये मिथिलावासी शहर के कई जगहो पर इकठ्ठा होते हैं. मिथिलावासी बड़ी श्रद्धा से पूजा-पाठ, पारंपरिक भजन-कीर्तन कर आज के दिन बाबा का तिलकोत्सव मनाते हैं. इसी खुशी में आपस में अबीर-गुलाल खेल कर खुशियां बांटते हैं और एक दुसरे को बधाइयां देते हैं.

मान्यता के अनुसार ऋषि-मुनियों शुरू की है यह परंपरा

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तीर्थ पुरोहित की मानें तो वसंत पंचमी के अवसर पर मिथिलांचल के लोगों द्वारा देवाधिदेव महादेव को तिलक चढ़ाने की परंपरा प्राचीन है. ऋषि-मुनियों ने इस परंपरा की शुरुआत की थी. इसे मिथिलावासी आज तक निभाते आ रहे हैं. मिथिलावासी अपने को माता पार्वती का भाई और बाबा भोले को अपना बहनोई मानते हैं. आज के दिन उनका तिलक कर उन्हे शिवरात्रि के दिन बारात लेकर आने के लिए आमंत्रण देते हैं. बहराल, इस प्रकार तिलक चढ़ाने की परंपरा शायद एक मात्र देवघर में स्थित द्वादश ज्योर्तिलिंग में ही देखने को मिलती है.

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