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महाशिवरात्रि विशेष : द्वादश ज्योतिर्लिंग बैद्यनाथ मंदिर में शिवरात्रि पूजन उत्सव का विशेष महत्व

स्कंदपुराण के अनुसार शिवरात्रि वह रात्रि है जिसका शिवतत्व से घनिष्ठ संबंध होता है. भगवान शिव की अतिप्रिय रात्रि को ही शिव रात्रि या काल रात्रि कहा जाता है. हिंदी पंचांग के अनुसार फाल्गुन माह की कृष्ण पक्षीय चतुर्दशी के दिन शिवरात्रि का पर्व मनाया जाता है. मान्यता है कि महाशिवरात्रि के प्रदोषकाल में शंकर-पार्वती का विवाह हुआ था. प्रदोष काल में महाशिवरात्रि तिथि में सर्व ज्योतिर्लिंगों का प्रादुर्भाव हुआ था.

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शास्त्रनुसार सर्वप्रथम ब्रह्मा व विष्णु ने महाशिवरात्रि पर शिवलिंग पूजन किया था और सृष्टि की कल्पना की थी. शिव पुराण के ईशान संहिता में फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात्रि में आदिदेव भगवान शिव करोड़ों सूर्य के समान प्रभाव वाले लिंग के रुप में प्रकट हुए थे.

पूजा के बाद नैवेद्य के करवे और दक्षिणा ब्राह्मण को देकर चन्द्रमा को अर्घ्य दिया जाता है. पूजा के बाद पति के हाथों जल का पान करें और फिर भोजन ग्रहण करें.

देवघर में हर वर्ष फागुन चतुर्दशी तिथि को चार पहर में माता पार्वती व बाबा भोलेनाथ का अभिषेक पूजन होता है. सुबह बाबा का विशेष श्रृंगार पूजन पुजारी के द्वारा संपन्न किया जाता है. जबकि स्टेट तीर्थ पुरोहित के अलावा आचार्य व पुजारी की देखरेख में शिव विवाह संपन्न कराया जाता है. चार पहर में अलग-अलग वस्तुओं से शिवलिंग का अभिषेक होता है.

जिसमें दूध, दही,मधु, ईख का रस, घी, गंगाजल सहित फल फूल बेलपत्र शामिल है. बाबा को अंग वस्त्र भेंट व शिवलिंग पर सिंदूर अर्पण कर शिव पार्वती विवाह संपन्न कराया जाता है.

महाशिवरात्रि के मौके पर संपन्न होने वाले शिव विवाह के लिए बाबा भोलेनाथ का मोर व माता पार्वती का मुकुट रोहिणी स्टेट परिवार की ओर से तैयार किया जाता है. आज भी यह परंपरा जीवित है.

तैयार मोर मुकुट को रोहिणी से बाबा मंदिर लाकर मंदिर प्रशासन भेंट किया जाता है. जिसके बाद देर रात्रि संपन्न होने वाले शिव विवाह में इसका इस्तेमाल होता है. शिवरात्रि महोत्सव को लेकर लोगों में गजब का उत्साह देखा जा रहा है.

इस वर्ष

-महाशिवरात्रि पहले प्रहर की पूजा: मंगलवार 1 मार्च को संध्या 6:21 से रात्रि 9:27 तक

-महाशिवरात्रि दूसरे प्रहर की पूजा: 1 मार्च को रात्रि 9:27 से 12:33 मध्यरात्रि तक

-महाशिवरात्रि तीसरे प्रहर की पूजा: 1 और 2 मार्च को रात्रि 12:33 से सुबह 3:39 तक

-महाशिवरात्रि चौथे प्रहर की पूजा: 2 मार्च  को पूर्वाह्न 3:39 से प्रातः 6:45 तक

 

-व्रत का पारण : 2 मार्च 2022, बुधवार को प्रातः 6:45

साल में होने वाली 12 शिवरात्रियों में से महाशिवरात्रि को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है : डॉ प्रदीप

 

शिवरात्रि महोत्सव के सन्दर्भ में राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता सह बैद्यनाथ महात्म्य के लेखक डॉ प्रदीप कुमार सिंह देव ने कहा कि पौराणिक कथाओं के अनुसार शिवरात्रि के दिन सृष्टि का आरम्भ अग्निलिंग जो महादेव का विशालकाय स्वरूप है के उदय से हुआ.

इसी दिन भगवान शिव का विवाह देवी पार्वती के साथ हुआ था. साल में होने वाली 12 शिवरात्रियों में से महाशिवरात्रि को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है.

समुद्र मंथन के सम्बन्ध में डॉ देव ने कहा कि समुद्र मंथन अमर अमृत का उत्पादन करने के लिए निश्चित था, लेकिन इसके साथ ही हलाहल नामक विष भी पैदा हुआ था. हलाहल विष में ब्रह्माण्ड को नष्ट करने की क्षमता थी और इसलिए केवल भगवान शिव इसे नष्ट कर सकते थे. भगवान शिव ने हलाहल नामक विष को अपने कण्ठ में रख लिया था. जहर इतना शक्तिशाली था कि भगवान शिव बहुत दर्द से पीड़ित हो उठे थे और उनका गला बहुत नीला हो गया था. इस कारण से भगवान शिव ‘नीलकंठ’ के नाम से प्रसिद्ध हैं.

उपचार के लिए, चिकित्सकों ने देवताओं को भगवान शिव को रात भर जागते रहने की सलाह दी. इस प्रकार, भगवान भगवान शिव के चिन्तन में एक सतर्कता रखी. शिव का आनन्द लेने और जागने के लिए, देवताओं ने अलग-अलग नृत्य और संगीत बजाने लगे. जैसे सुबह हुई, उनकी भक्ति से प्रसन्न भगवान शिव ने उन सभी को आशीर्वाद दिया.  शिवरात्रि इस घटना का उत्सव है, जिससे शिव ने दुनिया को बचाया. तब से इस दिन, भक्त उपवास करते हैं.

कुछ अन्य कथा भी शिवरात्रि के संबंध में प्रचलित है. मध्य भारत में शिव अनुयायियों की एक बड़ी संख्या है. महाकालेश्वर मंदिर सबसे सम्माननीय भगवान शिव का मंदिर है. जहां हर वर्ष शिव भक्तों की एक बड़ी मंडली महाशिवरात्रि के दिन पूजा-अर्चना के लिए आती है. जेओनरा, सिवनी के मठ मंदिर में व जबलपुर के तिलवाड़ा घाट नामक दो अन्य स्थानों पर यह त्योहार बहुत धार्मिक उत्साह के साथ मनाया जाता है.

दमोह जिले के बांदकपुर धाम में भी इस दिन लाखों लोगों का जमावड़ा रहता है. कश्मीरी ब्राह्मणों के लिए यह सबसे महत्वपूर्ण त्योहार है.

यह शिव और पार्वती के विवाह के रूप में हर घर में मनाया जाता है. यह उत्सव के 3-4 दिन पहले यह शुरू हो जाता है और उसके दो दिन बाद तक जारी रहता है.

बांग्लादेशी हिंदुओं की मान्यता है कि इस दिन व्रत व पूजा करने वाले स्त्री व पुरुष को अच्छा पति या पत्नी मिलती है. इस वजह से ये पर्व यहां खासा प्रसिद्ध है.

महाशिवरात्रि को नेपाल में व विशेष रूप से पशुपति नाथ मंदिर में व्यापक रूप से मनाया जाता है. महाशिवरात्रि के अवसर पर काठमांडू के पशुपतिनाथ मन्दिर पर भक्तजनों की भीड़ लगती है.

परंपरा के अनुसार, इस रात को ग्रहों की स्थिति ऐसी होती है जिससे मानव प्रणाली में ऊर्जा की एक शक्तिशाली प्राकृतिक लहर बहती है. इसे भौतिक और आध्यात्मिक रूप से लाभकारी माना जाता है. इसलिए इस रात जागरण की सलाह भी दी गयी है.

शिवरात्रि को महिलाओं के लिए विशेष रूप से शुभ माना जाता है. विवाहित महिलाएं अपने पति के सुखी जीवन के लिए प्रार्थना करती हैं व अविवाहित महिलाएं भगवान शिव, जिन्हें आदर्श पति के रूप में माना जाता है. जैसे पति के लिए प्रार्थना करती हैं.

मान्यता के अनुसार इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करने से वैवाहिक जीवन की सभी समस्याएं दूर होती हैं, इसके साथ ही जिन लोगों के विवाह में देरी हो रही हो या फिर जो लोग अपने सच्चे प्रेम की प्राप्ति करना चाहते हैं तो महाशिवरात्रि का पर्व उनके लिए बहुत ही शुभ दिन है.

जो लोग अपने प्रेम को रिश्ते में बदलना चाहते हैं यानि विवाह करना चाहते हैं या फिर किसी के विवाह में बाधाएं आ रही हो तो महाशिवरात्रि के दिन किसी ऐसे मंदिर में जाएं जहां पर शिव-पार्वती की प्रतिमाएं एक दूसरे के पास बनी हुई हो.

इसके बाद लाल रंग की मौली लेकर भगवान शिव और माता पार्वती की परिक्रमा करते हुए सात बार मौली से दोनों के बांध दें. यदि परिक्रमा करने के लिए उपयुक्त स्थान न हो तो एक ही स्थान पर खड़े होकर भी मौली बांध सकते हैं. तत्पश्चात दोनों की संयुक्त रूप से पूजा अर्चना करें.

भगवान शिव और माता पार्वती से मनोकामना पूर्ति की प्रार्थना करें. महाशिवरात्रि के दिन लाल रंग के वस्त्र पहनकर किसी शिव मंदिर में जाएं. भगवान शिव, माता पार्वती की संयुक्त रूप से पूजा करें. इसके बाद माता पार्वती को सुहाग की वस्तुएं लाल चूड़ियां, लाल चुनरी, मेहंदी, बिंदी, सिंदूर, कुमकुम आदि चीजें अर्पित करें. इसके बाद माता पार्वती से प्रार्थना करें.

इसके बाद रामचरितमानस में वर्णित शिव-पार्वती विवाह का प्रसंग अवश्य पढ़ें. विवाह में आने वाली बाधाओं को दूर करने और मनाचाहे जीवन साथी की प्राप्ति के लिए यह पाठ बहुत ही शुभफलदायक माना गया है.

यदि आप किसी से बहुत प्रेम करते हैं और उसे जीवनसाथी के रूप में पाना चाहते हैं तो महाशिवरात्रि के दिन माता पार्वती के समक्ष रामचरित मानस की इस चौपाई का पाठ करें. इस उपाय को अचूक माना जाता है.

 

‘तौ भगवानु सकल उर बासी। करिहि मोहि रघुबर कै दासी।।

जेहि कें जेहि पर सत्य सनेहू। सो तेहि मिलइ न कछु संदेहू।।’

रामचरित मानस में यह प्रसंग बालकांड का है. जिसके अनुसार प्रभु श्री राम को देखकर सीता जी उनसे विवाह करने की कामना के लिए देवी पार्वती के मंदिर जाकर इस चौपाई को पढ़ते हुए मां पार्वती से भगवान राम को वर के रूप में प्राप्त करने की कामना की थी.

 

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