National

#NRCIssue : पूर्व जजों और नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं के निर्णायक मंडल  ने  SC की आलोचना की

NewDelhi :  असम में एनआरसी मुद्दे से निपटने को लेकर सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज मदन बी लोकुर, कुरियन जोसेफ और दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस एपी शाह सहित नागरिकों के निर्णायक मंडल पीपुल्स ट्रिब्यूनल ने सुप्रीम कोर्ट के तरीके की कड़ी आलोचना की है. इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार पीपुल्स ट्रिब्यूनल जूरी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के जिस फैसले से एनआरसी प्रक्रिया शुरू की गयी, वह असत्यापित और अप्रमाणित डाटा पर आधारित था,

Jharkhand Rai

जिसके अनुसार बाहरी आक्रोश के कारण भारत में प्रवासन हो रहा है. जूरी के अनुसार यही कारण था कि कोर्ट ने प्रवासियों के साथ अमानवीय व्यवहार किया और उनके स्वतंत्रता एवं सम्मान के साथ जीने के अधिकार का उल्लंघन किया.

इसे भी पढ़ेंः #JPSC की कार्यशैली पर लगातार प्रतिक्रिया दे रहे हैं छात्र, पढ़ें-क्या कहा छात्रों ने…. (छात्रों की प्रतिक्रिया का अपडेट हर घंटे)

न्यायपालिका की समय सीमा तय करने की जिद ने परेशानी बढ़ा दी

इस क्रम में जूरी ने कहा, इतने बड़े पैमाने पर चलाये गये अभियान के बावजूद न्यायपालिका की समय सीमा तय करने की जिद ने प्रक्रिया और इसमें शामिल लोगों की परेशानी बढ़ा दी. जूरी की रिपोर्ट कहती है कि जब अदालत इस तरह की प्रक्रियाओं का कार्यभार संभालती है, तो गलतियां ठीक करने में समस्या आती है.

जान लें कि पीपुल्स ट्रिब्यूनल जनसुनवाई की एक ऐसी प्रक्रिया होती है, जिसमें संवैधानिक प्रक्रियाओं और मानवाधिकारों पर सुनवाई के लिए नागरिक समाज के लोगों को जूरी में शामिल किया जाता है.

Samford

इसे भी पढ़ेंः #EconomicSlowDown खस्ता हाल ऑटो सेक्टर को राहत देने में सरकार पर पड़ेगा 30 हजार करोड़ का भार

सात और आठ सितंबर को पीपुल्स ट्रिब्यूनल का आयोजन किया गया

नागरिक समाज के समूहों ने सात और आठ सितंबर को पीपुल्स ट्रिब्यूनल का आयोजन  किया था.  आयोजन में जूरी ने असम के लोगों की व्यक्तिगत गवाही और कानूनी विशेषज्ञों की बात सुनी, जिन्होंने एनआरसी को अपडेट करने की प्रक्रिया में भाग लिया था. इसमें अधिवक्ता अमन वदूद, गौतम भाटिया, वृंदा ग्रोवर और मिहिर देसाई शामिल थे. जूरी ने कहा कि नागरिकता अधिकारों के होने का अधिकार है और यह आधुनिक समाज में सबसे बुनियादी, मौलिक मानवाधिकारों में से एक है.

जूरी के अनुसार एनआरसी से बाहर किये जाने, विदेशी घोषित किये जाने और अंत में हिरासत केंद्र में भेजे जाने के डर ने कमजोर समुदायों, विशेषकर बंगाल मूल के असमिया मुस्लिम और असम राज्य में रहने वाले बंगाली हिंदुओं के बीच स्थायी दुख की स्थिति पैदा हो गयी है.

ट्रिब्यूनल जूरी में  जस्टिस लोकुर, जोसेफ और शाह सहित नाल्सार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के कुलपति प्रो. फैजान मुस्तफा, योजना आयोग के पूर्व सदस्य, सैयदा हामिद, बांग्लादेश में पूर्व राजदूत, देब मुखर्जी, इंडियन राइटर्स फोरम की संस्थापक-सदस्य गीता हरिहरन और जामिया मिलिया इस्लामिया में सेंटर फॉर नॉर्थ ईस्ट स्टडीज एंड पॉलिसी रिसर्च के अध्यक्ष प्रोफेसर मोनिरुल हुसैन शामिल थे.

इसे भी पढ़ेंः#NewTrafficRule : जमशेदपुर में कैसे होगा पालन, महज 67 ट्रैफिक पुलिस के भरोसे है व्यवस्था

Advertisement

Related Articles

Back to top button
%d bloggers like this: