Opinion

अब शुरू हुआ कोरोना से हुई मौतों के आंकड़े छुपाने का घृणित खेल

Faisal Anurag

क्या कोविड 19 के आंकड़ों को ले कर सरकार बाजीगरी कर रही है. नागरिकों को सूचना देने के बजाय अपने आंकड़ों को दुरूस्त कर सरकार की कामयाबी दिखायी जा रही है?  आंकड़ों को लेकर संदेह तो पहले से ही मौजूद है.  इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि दिल्ली में कोरोना मरीजों के साथ जानवर जैसा व्यवहार हो रहा है.

देश के अन्य राज्यों की हालत भी कमोबेश ऐसी ही है. अहमदाबाद के अस्पताल को तो हाई कोर्ट मौत का तहखाना बता चुका है. जिस तेजी से मरीजों की संख्या बढ़ रही है, पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था लचर नजर आ रही है. आंकडों को ले कर दिल्ली सरकार और दिल्ली के तीनों महानगर निगमों के बीच मृतकों की संख्या को ले कर जो विवाद उभरा है उसने बता दिया है कि पूरा देश किस तकलीफ से गुजर रहा है. या गुजरने वाला है.

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दिल्ली सरकार और दिल्ली के तीन महानगर निगमों के बीच जारी विवाद के कारण ऐसी सूचना प्रकाश में आयी है जिससे न केवल दिल्ली राज्य की सरकार बल्कि देश भर के आंकड़ों को लेकर संदेह का माहौल बना है. टाइम्स आफ इंडिया की एक खबर बताती है कि दिल्ली में सरकार और निगमों ने जो कोविड मृतकों का आंकड़ा दिया है, उससे मामला बेहद संगीन हो गया है.

तीनों निगमों ने कहा है कि उनके आंकड़े के अनुसार दिल्ली में कोविड से मरने वालों की संख्या 2098 है. इसमें ज्यादातर मौतें पिछले पंद्रह दिनो में हुई हैं. दिल्ली सरकार के आंकड़े बता रहे हैं कि मृतकों की संख्या 1085 है. एक हजार से अधिक लोगों की मौत के आंकड़ों का यह विवाद हो सकता है कि दो राजनीतिक दलों के बीच विवाद के कारण है. लेकिन तथ्यों के बारे में लागों को जानने का अधिकार है. और उन्हें वास्तविक संख्या बतायी जानी चाहिए.

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दिल्ली में सरकार आम आदमी पार्टी की है. जबकि तीनों निगमों का प्रशासन भारतीय जानता पाटी के हाथों में है. निगमों और राज्य सरकार का विवाद तो पिछले छह सालों से राजनीतिक कारणों से जारी है. बावजूद इसके कोविड मृतकों की संख्या को ले कर कोताही या गलतबयानी संगीन मामला है.

तीनों मेयरों,  हाउस के नेताओं और तीनों निकायों की स्थायी समिति के अध्यक्षों ने एक संयुक्त संवाददाता सम्मेलन किया. जिसमें निगमों ने मृतकों के आंकड़े जारी किए. प्रेस कांफ्रेस में दिल्ली सरकार के आंकड़ों को चुनौती दी गयी. निगमों का दावा है कि उनके आंकड़े अंतिम संस्कार के स्थानों की संख्या के आधार पर हैं. दक्षिणी दिल्ली नगर निगम की स्थायी समिति के अध्यक्ष भूपेंद्र गुप्ता ने दिल्ली सरकार पर सही आंकड़े छिपाने का आरोप लगाया.

इस प्रेस कांफ्रेंस में यह बताया गया कि कोविड 19 से मरने वालों के अंतिम संस्कार के लिए प्रोटोकॉल तय है. इसके अनुसार ही अंतिम संस्कार को डाक्टर के प्रमाण पत्र के आधार पर अंजाम दिया जाता है. जब कोई भी अस्पताल एक मरीज के मृत शरीर को भेजता है उसका अंतिम संस्कार कोविड 19 प्रोटोकॉल के अनुसार सावधानी से किया जाता है. श्मशानों और कब्रिस्तानों में जमा किए गए इन प्रमाण पत्रों के आधार पर अब तक कोविड 19 से 2098 शव आए हैं. जिनका अंतिम संस्कार किया गया है.

दिल्ली सरकार ने भी इस पर प्रतिक्रिया दी है. उसने कहा है कि दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश के आलोक में गठित मृत्यु आडिट कमेटी तथ्यों की जांच कर रही है. सवाल आरोप-प्रत्यारोप से कहीं ज्यादा गंभीर है. कोविड 19 के खिलाफ भारत में जंग किए जाने की बात कही जाती रही है. लेकिन जिस तरह के हालात अब सामने आ रहे हैं वे न केवल आंकड़ों पर बल्कि पूरे देश में प्रबंधन पर भी सवाल खड़े कर रहे हैं.

वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश की प्रतिक्रिया है : देश ने अपने नागरिकों का इस महामारी में अगर ख़्याल नहीं रखा, समय रहते बेहतर इलाज से उन्हें बचाने में नाकाम रहे तो उनकी मौत के बाद उनकी बेशकीमती जिंदगी जो चली गई, उसके वजूद से तो इंकार मत कीजिए!

हम किसी ‘एक’ को नहीं कह रहे, ‘सबको’ कह रहे हैं. हम किसी पर आरोप नहीं लगा रहे हैं. कौन जाने किसके हिस्से में कितना सच है? हम इस ‘ख़बर’ की बाबत आपके कर्तव्यों से आपको रू-ब-रू कराते हुए सिर्फ विनम्र प्रार्थना भर कर रहे हैं! वैसे भी ऐसा विवाद सिर्फ़ दिल्ली में ही नहीं उठा है. देश के दूसरे राज्यों से भी ऐसे विवाद के दुखद समाचार आ रहे हैं. आम नागरिक क्या जाने, किसकी बात में कितना सच और कितना झूठ है! सरकारों को अपने नागरिकों की मौत के आंकड़ों से नहीं ‘खेलना’ चाहिए. किसी तरफ से किसी तरह की ‘सियासतबाजी’ नहीं होनी चाहिए! इस महामारी में मरने वालों (जिसमें ज्यादा मौतों के लिए शासन और स्वास्थ्य सेवाओं की बदइंतजामी जिम्मेदार है) का यह घोर अपमान है. बेहद अमानवीय और शर्मनाक है!

न तो सरकार के आंकड़े विवादों से परे हैं और न ही उसके स्वस्थ्य प्रबंधन को ले कर लोगों में संतोष है. हर दिन खबरें आ रही हैं कि लोगों को अस्पतालों में भर्ती नहीं लिया जा रहा है. और न ही उनकी जांच की जा रही है. निजी अस्पतालों ने इसे लूट कारोबार में बदल दिया है. सरकार इसे लगातार नजरअंदाज कर रही है. अब तो आंच आम लोगों से खास लोगों तक पहुंच रही है. जो सरकार में उच्च पदों पर बैठे अधिकारी हैं.

वित्त मंत्रालय की एक अधिकारी ने अपने पति को अस्पताल में बेड दिलाने का मार्मिक वर्णन किया है. उन्होंने इसे सोशल मीडिया पर लिख कर साहस भी दिखाया है. और अगाह भी किया है. पत्रकार हों या अफसर. सभी इस समय अस्पतालों के सामने बेबस महसूस कर रहे हैं. ऐसी हालत तब है जब कोविड 19 के आंकड़े 3 लाख तक पहुंच गए हैं. और इन में ठीक हुए मरीजों को नए निर्देशों के अनुसार जल्द अस्पतालो से छुट्टी दे दी जा रही है.

अनुमानों के अनुसार भारत पिक हालत में पहुंच रहा है. लेकिन विवाद आंकड़ों और कम्युनिटी ट्रांसमिशन को ले कर जारी है.  दिल्ली सरकार कह रही है कि दिल्ली के आंकड़े और जांच बता रहे हैं कि कम्युनिटी ट्रंसमिशन होने लगा है. लेकिन केंद्रीय एजेंसी इसे मानने से इंकार कर रही है. कई राज्यों में डाक्टरों को तीन तीन महीने से वेतन नहीं दिया जा रहा है. जब कि वे फ्रंटलाइन योद्धा हैं. दर्दनाक हकीकतों से पूरे तथ्य भरे पड़े हैं. इन तथ्यों को नजरअंदाज करना आने वाले समय में और भारी पड़ सकता है.

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