Opinion

सच्चा-झूठा, कच्चा-पक्का हिंदू कुछ नहीं होता, फर्क है सिर्फ “दिखावा करना या ना करना”

Nitin Thakur

मैंने कई जगह देखा. अति उत्साही लोग ज़रा लिबरल और सरकार में धर्मनिरपेक्षता के पक्षधर लोगों की वॉल पर लिखे चले जा रहे हैं कि पांच अगस्त को सदमा लगा होगा. तुम्हें तो दुख हुआ होगा. अभी तो काशी मथुरा होगा.

वाकई इन लोगों को अंदाज़ा भी नहीं कि धर्म पर राजनीति करने वाली पार्टी यही चाहती है कि जो कोई ग़ैर हिंदुओं को चिढ़ाने की हद तक थाली ना पीटे उसे यही सब कहकर हिंदू ना होने जैसा सिद्ध कर दो. जो कोई उस दल के नेता को अवतार ना माने उसे धर्मद्रोही सिद्ध करो. जो भी कोई इनके विमर्श पर सहमत ना हो उसे “कमतर” हिंदू की तरह देखो.

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अब इस बात के लिए बधाई दी जानी चाहिए कि सच्चा जर्मन वही हो गया जो यहूदियों से चिढ़े. ये नैरेटिव बनाने में श्रम लगता है.

इस बात को कोई नहीं देखना चाहता कि अयोध्या में विहिप को गाली देनेवाले साधु संतों की कभी कमी नहीं रही. ऐसे बहुत धर्माचार्य हैं, जो अब भी नागपुर की सीढ़ी नहीं चढ़ते. कितने कथावाचक हैं, जो धर्म के नाम पर राजनीति कर रही पार्टी के झंडे तले सहज नहीं महसूस करते. सपा-बसपा-कांग्रेस-रालोद-आप-राजद-जदयू-लोजपा-टीआरएस में अधिकतर लोग ऐसे हैं जो सुबह शाम घरों में घंटी बजाते हैं और मंदिर में बैठे देव को पूजते भी हैं पर वो “ज़्यादा” हिंदू होने में दिलचस्पी नहीं रखते क्योंकि इस “ज़्यादा” की शर्त ये है कि जो दूसरे धर्म का है उसे चिढ़ाओ. मुझे एक वाकया याद है.

2007 के आसपास मैं एक वरिष्ठ विहिप नेता के पास बैठा था. अर्धकुंभ प्रयाग में समाप्त हुआ था और संगठन चाहता था कि जहां मेलाक्षेत्र था वहां की व्यवस्था प्रशासन कुछ हफ्ते बनाए रखे ताकि एक विश्व हिंदू सम्मेलन किया जा सके. राज्य में सपा सरकार थी. मुलायम सीएम थे. विहिप का प्रतिनिधि मंडल लखनऊ पहुंचा. मुलायम मिले और पूरी बात सुनी. थोड़ी देर में उन्होंने प्रतिनिधिमंडल को चौंकाते हुए कहा कि, “कुछ और चाहिए तो वो भी बताइए और आराम से कार्यक्रम कीजिए. मैं भी हिंदू हूं और बजरंग बली का भक्त भी, भले आप मत मानिए. अखाड़े का पहलवान रहा हूं. देखिए आज भी धोती पहनता हूं, आपमें से कितने लोग पहनते हैं?”

जो वाकया बता रहे थे वो बोले कि वाकई मुलायम सिंह यादव से ऐसा कुछ सुनने की उम्मीद नहीं थी. उम्मीद कैसे होती? संघ परिवार के लिए ये वही मुलायम थे जिसने “मुस्लिम वोटबैंक के लिए कारसेवकों पर गोली चलवा दी थी”. संभवत: यही कारण था कि हिंदूवादी संगठनों के बीच वो “मुल्ला मुलायम” कहे जाते थे. एक गाना तो ऐसा था, जिसमें उन्हें अपशब्द बोले जाते थे. ये भी बात है कि पंक्ति में पासवान का नाम भी लिया जाता था. हो सकता है 2014 के बाद अब संशोधित हुआ हो. राम जन्मभूमि मंदिर के मुख्य पुजारी लालदास तो खुलकर अयोध्या वाले विवाद को राजनीति और भ्रष्टाचार से भरा मानते थे. बाद में उनकी हत्या भी हो गयी. जाने किसने की थी.

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कहने का कुल जमा मतलब इतना है कि सच्चा, झूठा, कच्चा, पक्का हिंदू कुछ नहीं होता. फ़र्क़ इतना है कि शो ऑफ (दिखावा) करना या ना करना मरज़ी पर है. राम का नाम लेकर मरनेवाले गांधी जीवनभर हिंदू आस्था पर चले. जिन्ना उन्हें हिंदू नेता कहता रहा. “रामराज्य” वाली बातों पर वो आलोचना झेलते रहे, लेकिन अंत में जिसने उन्हें गोली मारी उसने धर्म के बहाने मारी और उसके अपने नाम तक में “राम” था.

पड़ताल होने पर पता चला कि धर्म से उसका संबंध कोई बहुत ज़्यादा नहीं था. जो सावरकर उसके गुरू थे वो तो गाय को सबसे मूर्ख जानवर कहते थे जबकि गांधी गौहत्या के सवाल पर हमेशा भावुक रहे. सावरकर ने तो अंतिम संस्कार तक बिना विधि विधान कराया और गांधी के संस्कार पूरे हुए. हिंदू सब थे.

अंतर यही था कि उनका धर्म दिखावे का मोहताज़ नहीं था. वो फ़र्क अब तक चला आ रहा है और चलता रहेगा. अब आप इस पोस्ट में हिंदू की जगह किसी और धर्म का नाम भी लिख दें तो भी संदेश वही रहेगा. सारे फ़साद की जड़ ये धर्म का शो ऑफ है.

डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं.

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