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नोटबंदी के कहर ने 50 लाख नौकरियां छीनीं

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Faisal Anurag

सीएसई की ताजा जारी रिपोर्ट ने चुनावों में बेरोजगारी और रोजगारहीनता के सवाल को एक बार फिर खड़ा कर दिया  है. इस रिपोर्ट के अनुसार नोटबंदी के बाद 50 लाख लोगों को नौकरियों से हाथ धोना पड़ा है.

इसका सबसे ज्यादा असर असंगठित क्षेत्र के कार्यरत लोगों पर पड़ा है. इसका सर्वाधिक शिकार  गांमीण इलाके के लोग हुए हैं. प्रभावित लोगों में सबसे ज्यादा कमजोर वर्ग के लोग हैं.

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अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर सस्टेनेबल इंप्लॉयमेंट के अध्ययन स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया 2019 के नाम से जारी रिपोर्ट में नौकरियों से छंटनी की इस भयावहता का उल्लेख है. रिपोर्ट 16 अप्रैल को जारी की गयी है. नोटबंदी के बाद जिस तरह का नकारात्मक प्रभाव असंगठित क्षेत्र पर पड़ा है.

उसकी अनेक दर्दनाक कहानियां प्रकाश में आती रही हैं. यह रिपोर्ट उस भयावहता को ही पुष्ट करता है, जिसकी चर्चा मात्र से मोदी सरकार की परेशानी बढ़ जाती है. हर साल दो करोड़ लोगों को रोजगार के वायदे के साथ सत्ता में आयी सरकार ने नोटबंदी के बाद 50 लाख लोगों का निवाला छीन लिया है.

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नोटबंदी को विपक्ष के अनेक नेता आजाद भारत का सबसे खौफनाक फैसले के साथ सबसे ज्यादा बड़ा घटाला बताते रहे हैं. नोटबंदी अपने घोषित लक्ष्यों को तो पा नहीं सकी, उलटे भारत की अर्थव्यवस्था पर इसके बुरे प्रभाव को देश पिछले कई सालों से देख रहा है. भारत सरकार ने विकास के आंकड़ों का जो नया प्रतिमान बनाया है, उसे देश और दुनिया में संदेह की निगाह से देखा जाता है.

विकास संबंधी मोदी सरकार के दावे को अर्थशास्त्री अक्सर चुनौती देते रहे हैं. विकास के तमाम आंकड़ों के प्रतिमान बदलने के बाद भी कोर सेक्टर के ग्रोथ के निराशाजनक आंकड़े ही जारी करते रहे हैं.

भारत के औद्योगिक और कृषि संबंधी विकास के आंकड़ों के निराशाजनक परिणाम की गवाही देते हैं. रोजगार की गिरावट के बारे में सरकार की एजेंसियों के आंकड़े भी सामने आ चुके हैं. केंद्र सरकार ने तो आंकडों की देखरेख और अध्ययन करने वाली संस्थाओं की स्वतंत्र कार्यशैली को भी बाधित किया है.

सीएसई के अध्यक्ष ने रिपोर्ट जारी करने के बाद कहा कि देश में जब जीडीपी बढ़ रही हो तो कार्यबल घटना नहीं चाहिए.  इसे भयावह अर्थ संकट बताया जा रहा है. पचास लाख लोगों का नौकरी खोना कोई सामान्य बात नहीं है.

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अर्थव्यवस्था के संकट को रोजगार की कमी की स्थिति उजागर कर रही है. नौकरी के इस संकट के संदर्भ में सीएसई प्रमुख ने कहा कि नोटबंदी और जीएसटी के अलावे इसका कोई और कारण नजर नहीं आता है.

इस रिपोर्ट के अनुसार, सबसे ज्यादा बेरोजगारी 20-24 साल के आयुवर्ग में है. कम शिक्षित लोगों पर  नौकरी का संकट का सबसे ज्यादा असर डाल रहा है. रिपोर्ट यह भी बताती है कि महिलाओं पर इसका सबसे बुरा प्रभाव पड़ा है.

बेरोजगारी की दर खतरे के निशान को पार कर रहा है. इस रिपोर्ट के अनुसार, शिक्षित बेरोजगारी की दर 2011 में जहां 10 फीसदी थी, वहीं 2017 में वह बढ़कर 16 प्रतिशत हो गयी. बेरोजगारी दर बाद के सालों में तेजी से बढ़ी है.

अर्थव्यवस्था का संचालन कर रहे लोगों ने इस चुनौती को जिस तरह से नजरअंदाज किया है, उसे लेकर अनेक प्रतिक्रियाएं आ चुकी हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत अपनी बेरेजगारी दर को तुरंत कम नहीं करता है तो आने वाले दिनों में इसके बुरे राजनीतिक और सामाजिक दुष्परिणाम होंगे.

जब कभी बेरोजगारी दर की भयावहता की चर्चा होती है, वितमंत्री जेटली आंकड़ों को सिरे से नकारते हुए तर्क देते रहे हैं कि यदि बेरोजगारी की स्थिति इतनी खराब होती तो देश युवाओं के आंदोलन के तूफान को महसूस करता. जेटली देशभर में बेरोजगारों के आक्रोश को एक फर्जी परसेप्शन बताकर इसे विरोधियों की साजिश बताते रहे हैं.

चुनावों के दौरान आये इन आंकड़ों ने भाजपा के लिए मुसीबत खड़ा किया है. दुनिया के कई प्रमुख मीडिया ने इस आंकड़े को प्रमुखता से प्रकाशित किया है. हॉफिंगटन पोस्ट भी इसमें शामिल है.

आर्थिक नीतियों के कारण बढ़ती असमानता खाई पर भी अनेक शोध आलेख प्रकाश में आ चुके हैं. विपक्ष ने अपने चुनाव अभियान में दो करोड़ रोजगार के वायदे का सवाल उठाकर भाजपा को इस फ्रंट पर परेशान कर रखा है. देखना है आने वाले दिनों में भाजपा के पकिस्तान और राष्ट्रवाद के मुद्दे को ही प्रमुख चुनावी एजेंडा कितना काउंटर कर सकता है.

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