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देश में पहली बार इस चुनाव में ‘नोटा’ जीता, आगे का रास्ता फिर चुनाव

महाराष्ट्र में हुए पंचायत चुनाव में सतारा जिले दो गांवों के वोटरों ने दिया क्रांतिकारी जनादेश

Sudhir Pal

Ranchi: भले ही सुप्रीम कोर्ट और भारत के निर्वाचन आयोग की निगाह में उम्मीदवारों को खारिज किये जाने का कोई कानून देश में ना हो लेकिन जनता के पास यह विकल्प है. विकल्पहीन नहीं है राजनीति. जनता राजनीतिक सुधार के लिए हमेशा प्रयोग करती रहती है. इसी प्रयोग के तहत महाराष्ट्र में हाल में हुए पंचायत चुनाव में दो वार्डों में मतदाताओं ने ‘नोटा’ को ही अपना प्रतिनिधि चुन लिया. मतदाताओं ने दोनों वार्डों में चुनाव में खड़े सभी उम्मीदवारों को दागी और जन सरोकार से वास्ता नहीं रखने वाला पाया. पैसा, प्रलोभन और दबंगई को धत्ता बताते हुए यहां के मतदाताओं ने ‘नोटा’ यानी खड़े सभी उम्मीदवारों में से कोई नहीं के विकल्प को चुनना पसंद किया.

महाराष्ट्र के सतारा में दो वार्डों में नोटा को सबसे ज्यादा वोट

महाराष्ट्र के सतारा जिले के खंडाला प्रखंड के धनगढ़वारी गांव के दो वार्डों में ज्यादातर मतदाताओं ने नोटा पर ही बटन दबाया. इन दोनों वार्डों में नोटा को क्रमशः सबसे ज्यादा 211 और 217 वोट मिले. डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट ने राज्य निर्वाचन आयुक्त को पत्र लिखकर आवश्यक कारवाई के लिए मंतव्य मांगा है. राज्य की 14 हजार से ज्यादा ग्राम पंचायतों में 15 जनवरी को वोट डाले गये थे और 18 जनवरी को परिणाम की घोषणा हुई है.महाराष्ट्र राज्य निर्वाचन आयोग के निर्देशों के मुताबिक़ इन जगहों पर फिर से मतदान होंगे.

सुप्रीम कोर्ट ने दी थी यह व्यवस्था

27 सितम्बर, 2013 को पीयूसीएल बनाम भारत सरकार के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी थी कि चुनाव में प्रतिनिधियों के खिलाफ़ वोट डालना मतदाताओं का संवैधानिक अधिकार के दायरे में आता है लेकिन इसे ‘प्रतिनिधियों को खारिज’ किये जाने का प्रावधान नहीं माना जा सकता है. भारत निर्वाचन आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के आलोक में व्यवस्था दी है कि यदि लोक सभा या विधान सभा चुनाव में किसी निर्वाचन क्षेत्र में अकेले ‘नोटा’ को अन्य सभी उम्मीदवारों से ज्यादा वोट मिलते हैं तो भी सबसे ज्यादा वोट मिलने वाले उम्मीदवार को ही विजयी घोषित किया जाएगा.

राज्य निर्वाचन आयोग ने उठाया क्रांतिकारी कदम

भले सुप्रीम कोर्ट और भारत निर्वाचन आयोग ‘नोटा’ को जनता द्वारा प्रतिनिधियों को ‘रिजेक्ट’ करने का उपकम नहीं मानती हो लेकिन महाराष्ट्र में राज्य निर्वाचन आयोग ने यह व्यवस्था कर दी है. महाराष्ट्र के स्थानीय निकायों के चुनाव राज्य निर्वाचन आयोग इस आशय का आदेश जारी किया है कि यदि किसी निर्वाचन में नोटा को सर्वाधिक वोट मिलता है तो वहां फिर से निर्वाचन होगा.

दोबारा होने वाली निर्वाचन में जनता द्वारा खारिज किये गये उम्मीदवार भी पुन: चुनाव लड़ सकते हैं. लेकिन दोबारा हुए चुनाव में फिर से नोटा ही विजयी होता है तो उम्मीदवारों के बीच सबसे ज्यादा मत पाने वाले विजयी घोषित होंगे. महाराष्ट्र राज्य निर्वाचन आयोग ने 2018 में इस सम्बन्ध में एक नियम बनाया है. संभव है इन पंक्तियों के लिखे जाने तक उपरोक्त दोनों वार्डों में फिर से चुनाव की अधिसूचना जारी हो जाये.

महाराष्ट्र राज्य निर्वाचन आयोग के इस नियम की वैधानिकता पर सवाल उठते रहे हैं लेकिन महाराष्ट्र में दिसम्बर, 2018 में हुए नगर निकायों के चुनाव के समय से यह लागू है. महाराष्ट्र की तर्ज पर हरियाणा राज्य निर्वाचन आयोग ने भी नोटा को ‘काल्पनिक उम्मीदवार’ माना है और सर्वाधिक वोट मिलने की स्थिति में पुन: मतदान का प्रावधान किया है. महाराष्ट्र राज्य निर्वाचन आयोग के आदेश को मतदाताओं द्वारा ‘खारिज’ किये जाने के अधिकार के तौर नहीं देखा जाना चाहिए,क्योंकि यह नोटा से हारे उम्मीदवारों को पुन: निर्वाचन में भाग लेने से रोकता नहीं है.

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महाराष्ट्र राज्य निर्वाचन आयोग ने राज्य में 2018 में पंचायतों के हुए चुनाव के बाद एक अध्ययन में पाया था कि कई निर्वाचन क्षेत्रों में जीते हुए उम्मीदवार ज्यादा वोट नोटा को मिला है. पुणे के बोरी ग्राम पंचायत में नोटा को 85.57 फ़ीसदी वोट मिला था. इसी जिले की मानकरवारी ग्राम पंचायत में कुल 330 मतों में से 204 मत नोटा को मिले थे. नांदेड जिले के खुगांव खुर्द में सरपंच को सिर्फ 120 वोट मिले थे जबकि नोटा को 627 वोट. इसी प्रकार लांजा तहसील के खावादी गांव के पंच को मात्र 130 वोट मिले थे और नोटा को 210 वोट. राज्य निर्वाचन आयोग ने इसी अध्ययन के आधार पर ‘नोटा’ के विजयी होने पर पुन: निर्वाचन का नियम बनाया था.

महाराष्ट्र राज्य निर्वाचन आयोग की मान्यता रही है कि सर्वोच्च न्यायालय के आदेश से मतदाता को नकारात्मक मतदान का अधिकार मिल गया है. संविधान पीठ के निर्देश के आलोक में निर्वाचन आयोग ने इवीएम में विकल्प के रूप में ‘इनमें से कोई नहीं’ का बटन शामिल किया है. इससे पहले तक चुनाव प्रणाली में प्रारूप 49 एक ऐसी अर्जी है, जो उम्मीदवारों को नकारने का अधिकार मतदाता को देती है, लेकिन इसमें गोपनीयता नहीं रहती.

राज्य निर्वाचन आयोग का तर्क रहा है कि मतदाता को मिलनेवाला नकारात्मक मतदान का अधिकार चुने गये जनप्रतिनिधि को भी जनता के प्रति जवाबदेह बनाने में सहायक हो सकता है. हालांकि किसी प्रत्याशी को पसंद नहीं करने का अर्थ यह कदापि नहीं है कि संपूर्ण चुनाव प्रक्रिया या प्रजातांत्रिक व्यवस्था को अस्वीकार किया जा रहा है, बल्कि अस्वीकार के हक से तात्पर्य यह है कि मतदाता अथवा क्षेत्र का बहुमत ऐसे उम्मीदवारों को नकार रहा है, जिनकी छवि जनमानस में ठीक नहीं है. इंडोनेशिया के मकस्सर में 2018 में मेयर चुनाव में सिर्फ एक उम्मीदवार खड़ा था. मतदाताओं के पास वोट का दूसरा विकल्प ‘नोटा’ था. मतदाताओं ने उम्मीदवार की तुलना में नोटा को सर्वाधिक वोट दिया. नियमानुसार यहां फिर से चुनाव हुए.

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लोक सभा या विधान सभा के चुनाव में ‘नोटा’ का कोई चुनावी मूल्य नहीं

अभी तक लोक सभा या विधान सभा के चुनाव में ‘नोटा’ का कोई चुनावी मूल्य नहीं है. भले ही नोटा को अधिकतम वोट क्यों ना मिले हों, फिर भी अधिकतम वोट शेयर वाला उम्मीदवार ही विजयी घोषित होगा. लेकिन नोटा मतदाताओं के बीच लोकप्रिय हो रहा है. 2019 में झारखंड विधानसभा चुनाव में नोटा से 254 प्रत्याशी चुनाव हार गए थे. राज्य के 81 विधानसभा सीटों पर नोटा में कुल एक लाख 96 हजार 154 वोट पड़े. चतरा विधानसभा सीट पर नोटा में सबसे ज्यादा 6357 वोट पड़े. खास बात यह है कि सिमडेगा, बाघमारा में जीत-

हार के अंतर से अधिक वोट नोटा में पड़े. सिमडेगा में भाजपा के श्रद्धानंद बेसरा कांग्रेस के भूषण बाड़ा से 285 वोट से हार गए थे. इस सीट पर 3819 मतदाताओं ने नोटा में वोट दिया था. अधिक नोटा वोट के कारण यह सीट भाजपा के खाते से निकल गई. वहीं बाघमारा में भाजपा और कांग्रेस के बीच जीत-हार का अंतर 824 वोटों का रहा. जबकि इस सीट पर नोटा में 1491 वोट पड़े. जाहिर है, नोटा के वोटों का रुझान यहां जीत-हार का फैसला कर सकता था. भवनाथपुर और बोकारो सीट पर 19 प्रत्याशियों को नोट से कम वोट मिले.

इसी प्रकार गुजरात में 2017 के विधानसभा चुनावों के अलावा कर्नाटक (2018), मध्य प्रदेश (2018) और राजस्थान (2018) के चुनावों में भी इसका असर महसूस किया गया. 2017 के गुजरात विधानसभा चुनावों में, नोटा का कुल वोट शेयर केवल भाजपा, कांग्रेस और निर्दलीय उम्मीदवारों से कम था.

118 निर्वाचन क्षेत्रों में, नोटा को भाजपा और कांग्रेस के बाद सबसे ज्यादा वोट मिले. वहीं, 2018 के कर्नाटक विधानसभा चुनावों में, सीपीआई (एम) और बीएसपी जैसी देशव्यापी उपस्थिति वाले कुछ दलों की तुलना में नोटा को ज्यादा वोट मिले. 2018 में हुए मध्य प्रदेश विधानसभा चुनावों में, जीतने वाली कांग्रेस और भाजपा के वोट शेयर के बीच का अंतर केवल 0.1 प्रतिशत था, जबकि नोटा का मतदान शेयर 1.4 प्रतिशत था.

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चुनाव सुधार की दिशा में चल रही बहस को मिला नया मुकाम

महाराष्ट्र राज्य निर्वाचन आयोग ने नोटा को प्रभावी बना कर राजनीतिक और चुनाव सुधार की दिशा में चल रही बहस को एक मुकाम पर पहुंचा दिया है. मालूम हो कि 2016 और 2017 में नोटा के प्रभाव को ‘मजबूत’ करने के लिए पीआईएल दायर की गई थी. दायर पीआईएल में मांग की गयी थी कि नोटा बहुमत से जीतता है और अस्वीकृत उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने से रोकने का प्रावधान हो.

हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय इस पर सहमत नहीं है. सर्वोच्च न्यायालय की मान्यता है कि इस तरह का एक समाधान ‘असाध्य’ है.
2013 में नोटा के फैसले को पारित करते समय, भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश पी. सदाशिवम को यह कहते हुए उद्धृत किया गया था कि “मतदाता को किसी भी उम्मीदवार को वोट न देने का अधिकार देते हुए, लोकतंत्र में उसके अधिकार की रक्षा करना अत्यंत महत्वपूर्ण है. इस तरह का एक विकल्प मतदाता को पार्टियों द्वारा उपलब्ध कराये गए उम्मीदवारों को अस्वीकृत करने का अधिकार देता है. धीरे-धीरे, एक प्रणाली गत बदलाव होगा और पार्टियों को मतदाताओं की इच्छा और निष्ठा को स्वीकार करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा. ”

(लेखक झारखण्ड के वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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