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आरक्षित सीटों में नोटा आदिवासी आक्रोश की अभिव्यक्ति, जल, जंगल, जमीन संबंधी आंदोलनों की अनदेखी बड़ा कारण

लोकसभा चुनाव 2014 : 240 उम्मीदवारों ने चुनाव में ठोंकी थी ताल, 128 ने नोटा से भी कम लाये वोट, सिर्फ 31 बचा पाये थे जमानत

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Ranchi:  सुरक्षित सीटों पर नोटा के बढ़ते प्रभाव से छोटे राजनीतिक दलों के अस्तित्व के लिए चुनौती खडी हो गयी है. वहीं बड़े राजनीतिक दलों के लिए भी जीत-हार के कड़े मुकाबले में उनकी भूमिका प्रभावी होने के संदेश साफ सुनायी पड रहे हैं.

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राजनीतिक दलों के क्रियाकलाप और चुनाव में धनबल की बहुलता एवं आदिवासी आधिकार को लेकर चले आंदोलन में राजनीतिक दल की भगीदारी नही होना इसका एक बड़ा कारण हो सकता है. चुनाव आते ही जन संगठनों और आंदोलनों को राजनीतिक दल अपने पाले में करने का प्रयास करते हैं.

इस पर आमजन भरोसा नहीं कर पाते. ऐसे में झारखंड के एसटी आरक्षित सीटों पर नोटा मतों की संख्या अधिक होना राजनीतिक दलो के प्रति आक्रोश को दिखाता है. पिछले लोकसभा चुनाव में झारखंड की 14 सीटों पर 240 उम्मीदवार चुनाव मैदान में थे.

राज्य की 14 सीटो पर चुनाव में मैदान खड़े उम्मीदवारों में से 240 में सिर्फ 31 उम्मीदवार जमानत बचा सके. कुल 209 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गयी थी. वही 128 उम्मीदवारों ने नोटा से भी कम मत लाये थे. सबसे अधिक नोटा सिंहभूम सीट पर पड़े.

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आरक्षित सीटों पर कितने नोटा मत पड़े

सिंहभूम

सिंहभूम लोकसभा सीट में सबसे अधिक नोटा मत पड़े. इस सीट पर 12 उम्मीदवार खड़े थे. इसमें चार उम्मीदवार ही नोटा मतों से अधिक मत ला सके. राज्य में सबसे अधिक 27037 नोटा इस सीट पर पड़े. इलाके में इंचा खरकाई बांध विरोधी आंदोलन के साथ-साथ विकास योजना भी बड़ा मुद्दा रहा था.

खूंटी

खूंटी लोकसभा सीट नोटा के मतों के मामले में राज्य में दूसरे सथान पर रहा. इस सीट से कुल 14 उम्मीदवार चुनाव में खड़े थे. चार उम्मीदवार छोड़ किसी उम्मीदवार ने नोटा मतों से अधिक मत नहीं लाया. नोटा मतों की संख्या 23816 थी.

राजमहल

राजमहल लोकसभा सीट पर चुनाव में 11 उम्मीदवार खड़े थे इस सीट पर 19875 नोटा मत पड़े थे. 4 उम्मीदवारों ने ही नोटा से अधिक मत लाये. इलाके में विस्थापन, कुपोषण जैसे बड़े मुद्दे हैं जो आज तक हल नही नहीं हो सके. पेयजल की भी समस्या गंभीर बनी हुई है. रोजगार की बात भी दूर की कौड़ी बन चुकी है.

दुमका

दुमका लोकसभा सीट पर गत चुनाव में 18325 मत नोटा में पड़े थे. कुल 11 उम्मीदवार चुनाव मैदान में खड़े  थे. 4 उम्मीदवार को छोड़ अन्य किसी ने नोटा वोटों से ज्यादा मत नहीं लाये. इलाके में पेयजल की गंभीर समस्या है. 2014 के चुनाव के पूर्व विस्थापन के खिलाफ यहां तेज आंदोलन हुआ था. विस्थापन आंदोलन को दबाने के लिए काठीकुंड गोली कांड की घटना भी हो चुकी थी. कई स्थानों में विस्थापन का संकट आज भी मंडरा रहा है.

लोहरदगा

लोहरदगा लोकसभा सीट में नोटा मतों की संख्या 16764 थी. पिछले चुनाव में कुल 11 प्रत्याशी चुनाव लड़े. जिसमें से 4 प्रत्याशी ही नोटा से अधिक मत ला सके. इलाके में बॉक्साइट खनन, नेतरहाट फील्ड फायरिंग के विरुद्ध आंदोलन की आवाज इलाके में मौजूद रही. आज भी कई अन्य इलाकों में आंदोलन के स्वर सुनायी दे रहे हैं.

पलामू

पलामू लोकसभा सीट राज्य का एकमात्र एससी आरक्षित सीट है. आदिवासी सीटो की तरह एससी अरक्षित सीट पर भी नोटा वोटो की सख्यां समान्य सीट से अधिक रही. इस सीट पर कुल 13 उम्मीदवार गत चुनाव में खड़े हुए थे. इनमें से मात्र 5 उमीदवार ही नोटा से अधिक मत ला सके थे. नोटा मतों की संख्या 18287 रही थी.

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सामान्य लोकसभा सीटों पर कितने नोटा मत पड़े

गोड्डा12410
चतरा5791
कोडरमा6712
गिरिडीह4879
धनबाद7675
रांची6900
जमशेदपुर15629
हजारीबाग6827

 

क्या कारण है नोटा मतों के अधिक होने का

आरक्षित सीटो पर नोटा वोटो की संख्या समान्य सीट से अधिक होने के काई कारण हो सकते हैं. जिसमें एक बडा कारण आम लोगों की वह नारजगी थी जो यूपीए2 सरकार के कारण पैदा हुई थी.

पिछले चुनाव में विकास का एजेंडा और अनेक दूसरे एजेंडों के साथ वोटरों पर यह मानसिकता हावी थी. झारखंड के ही सामान्य सीटों पर यह रूझान आदिवासी इलाकों की तुलना में कम है.

आदिवासी इलाकों में जल, जंगल, जमीन के सवाल पर लोगों के भीतर आक्रोश है. नोटा आदिवासी आक्रोश की अभिव्यक्ति के के रूप में उभरा है. 2014  का आम चुनाव इसका संकेत दे चुका है.

2019 के आम चुनाव में इसके और ज्यादा अधिक होने की संभावना है. आदिवासी जनांदोलनों के प्रभाव वाले इलाकों में यह बात गहराती जा रही है कि तमाम राजनीतिक दलों पर कारपोरेट ताकतों का वर्चस्व बढता जा रहा है.

चुनाव जीतने के बाद राजनीतिक दल उनके एजेंट की तरह काम करने लग जाते हैं. आर्थिक सवालों पर राजनीतिक दलों की आम समहति को इसी रूप में आदिवासी इलाकों में देखा और समझा जाने लगा है.

आदिवासी इलाकों के प्रकृतिक संसाधनों की लूट के सवाल पर राजनीतिक दलों में आम सहमति जैसी स्थिति है.

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