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हर डॉक्टर भगवान नहीं होता, कुछ नवीन कुमार भी होते हैं

Kumar Saurav

कैसे एक खुशहाल परिवार एक महीने के अंदर तबाह हो सकता है, यह मैंने पिछले दिनों बड़ी नजदीक से महसूस किया. 19 अप्रैल को जीजाजी (रंजन वर्मा)  और 20 अप्रैल को दीदी (सुरभि वर्मा) को खो दिया. जब तक वे अस्पताल में रहे, रात भर इस आशंका में नींद नहीं आती थी कि कब अस्पताल से फोन आ जाये, कब किस चीज की जरूरत पड़ जाये.

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8 मार्च के पहले मेरी बहन और बहनोई एक सामान्य सी जिंदगी गुजार रहे थे. अचानक बहनोई को पेट दर्द की शिकायत हुई. दर्द तेज था. घर के पास ही पल्स सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल है, वे लोग वहीं गये. डॉक्टर ने देखा और कुछ दवाएं देकर एडमिट कर लिया. कहा घबराने की जरूरत नहीं, कल जांच के बाद आगे का देखा जायेगा.

अगले दिन डॉ नवीन कुमार ने दीदी को बताया कि उनकी छोटी आंत में कुछ परेशानी है. रात भर में दवाओं से सुधार हुआ तो ठीक, नहीं तो ऑपरेशन करना पड़ेगा. रात में उन्हें आराम हो गया, पर अगले दिन डॉक्टर ने ऑपरेशन की तैयारी कर ली. बिना कुछ खास जानकारी दिये. जब तक मैं पहुंचा, उन्हें ऑपरेशन थियेटर में ले जाने की तैयारी चल रही थी. डॉक्टर ने पहले कहा कि लेप्रोस्कोपी से ऑपरेशन करेंगे. उसके बाद जब लगभग चार-पांच घंटे बीत गये तो बताया गया कि वह नहीं हो पा रहा था, इसलिए ऑपरेशन करना पड़ा. कई फॉर्मों पर दस्तखत तो उन्होंने पहले ही ले लिये थे. ऑपरेशन के बाद उन्होंने दीदी को बताया कि घबराने की कोई बात नहीं है, दो-तीन दिनों में ठीक हो जायेगा और फिर घर जा सकेंगे. हम लोग भी उनकी बातों में थे कि ज्यादा से ज्यादा चार-पांच दिन लगेंगे. तब तक उस अस्पताल में कोरोना के मरीज नहीं थे औऱ शहर में इतना आतंक भी नहीं था. सब कुछ सामान्य सा था.

लेकिन दो-तीन दिन के बाद उनके ऑपरेशनवाले स्थान से पस आने लगा, उन्हें बुखार आने लगा. तब उन्होंने कहा कि कई बार ऐसा होता है. फिर उन्हें कुछ भी खाने-पीने को नहीं दिया जाने लगा. लेकिन हालत बिगड़ती ही चली गयी. अब हमारे सब्र का बांध टूटने लगा था, लेकिन मरता क्या न करता… हमारे पास और कोई चारा नहीं था, उनकी बातों को मानने के अलावा. करीब 15 दिनों तक यही सिलसिला चलता रहा. इस बीच डॉक्टर नवीन कुमार ने यह कोशिश भी कि उन्हें डिस्चार्ज कर दें. वे बार-बार हमसे कहते कि एंटीबायोटिक्स लिख देता हूं, आप घर ले जाइये, वे ठीक हो जायेंगे. पर हम उन्हें ऐसी हालत में घर ले जाने की स्थिति में नहीं थे. आखिरकार उन्होंने कहा कि एक बार फिर से ऑपरेशन करना पड़ेगा. आखिर जो ऑपरेशन पांच दिनों में पूरी तरह से ठीक हो सकता था, वह 15 दिनों के बाद ऐसी स्थिति में था कि एक बार फिर से ऑपरेशन करना पड़े. इस बात का उनके पास कोई जवाब नहीं था. वो सिर्फ इतना कहते कि बहुत अनफॉर्चुनेट है. आमतौर पर ऐसा नहीं होता है. सवाल यह उठता है कि एक सामान्य मरीज आखिर इस स्थिति तक पहुंचा कैसे? किसकी लापरवाही थी?

अगली कड़ी में पढ़िये- दूसरे ऑपरेशन ने कैसे ले ली दो जानें…

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