Opinion

बिहार में शिक्षकों का दरद न जाने कोई

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Vijay Deo Jha

बिहार के सरकारी स्कूल के शिक्षकों से बच्चों को पढ़ाने का काम छोड़ कर शेष सारे काम लिये जाते हैं. क्योंकि अपने चमत्कृत करनेवाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उनके खुशामदी नौकरशाह यह मानते हैं कि बिहार में शिक्षा और शिक्षकों का सम्मान इतना अधिक महत्वपूर्ण नहीं है. जितना की स्कूली शिक्षा नामक इस भद्र संस्थागत पेशे से जुड़े लोगों का दोहन और समय-समय पर मानमर्दन करना.

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शिक्षक रसोइया हैं. शिक्षक आया हैं. शिक्षक जनगणनाकर्मी हैं. शिक्षक चुनावकर्मी हैं. शिक्षक दर्जी भी हैं. शिक्षक ही बाढ़ राहतकर्मी हैं. शिक्षकों आदमी गिन लिया तो आज से गदहा गणना पर लग जाओ. और अगर इन सबसे कुछ समय बचे तो शिक्षक थोड़ी देर स्कूल में बच्चों को पढ़ा कर शिक्षक होने का अपना भ्रम कायम रख सकें. जन प्रतिनिधियों से लेकर विभाग के अधिकारी तक, शिक्षकों के दर्जनों मालिक होते हैं, जो शिक्षकों को प्रताड़ित, अपमानित करने से लेकर निलंबन और कारणपृच्छा का हनक रखते हैं.

सरकार जितने तरह के काम शिक्षकों से लेती है, वह शिक्षकों को भी ठीक से याद नहीं रहता होगा. कोई एक काम हो तब तो बतायें.  नीतीश कुमार और उनके नौकरशाह भी किसी शिक्षक से ही पढ़ कर इतने काबिल बने कि आज वह हमारे राजा हैं. नीतीश और उनके नौकरशाह अच्छी गुरुदक्षिणा दे रहे हैं.

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इतना सब कुछ करने के बाद भी शिक्षकों को थकना और हांफना नहीं है. क्योंकि थकने और हांफने का स्वांग करने की महती भूमिका नौकरशाहों, नीतीश कुमार और उनके मंत्रियों के जिम्मे है.

अब जबकि कोरोना महामारी बिहार में बेकाबू हो चुकी है और ऊपर से बाढ़ का कहर. नीतीश कुमार खुद को अपने 15 वर्षों के शासनकाल का हिसाब नहीं दे पा रहे हैं और पिछले चार महीने से एकांतवास में हैं. नीतीश कुमार और उनके नौकरशाहों ने शिक्षकों को फरमान भेज दिया है कि कोरोना और बाढ़ दोनों से लड़ो.

इतना सब कुछ बता देना इसलिए जरूरी था, ताकि आगे लिखे ‘नीतीश वाक्यं प्रमाणम’ को पढ़ कर आप आवेश में अपना सर पीट कर खुद को चोटिल न कर लें.

आज उत्तर बिहार के बाढ़ग्रस्त जिलों के शिक्षकों को आदेश भेजा दिया गया है कि वह कल से तत्काल प्रभाव से बाढ़ पीड़ितों के लिए विहित स्थानों पर सामुदायिक किचन प्रारंभ कर दें. जैसा कि ऐसे आदेशों के साथ होता है कि इसे अत्यावश्यक मानें ‘वरना’ और इस चेतावनी युक्त लहजे के बाद शिक्षक यह पूछने का हिम्मत नहीं जुटा पायेंगे कि आखिर वह कौन से सुपर ह्यूमन हैं जो अकेले के दम पर हजारों लोगों को कम्युनिटी किचन में खाना खिलायेंगे. शिक्षक सामुदायिक किचन कैसे चलायेंगे, इस पर परिपत्र मौन है. बस इसे चलाना है. कैसे चलाना है. शिक्षक जानें. वरना बकरे को जिबह करने में कसाई को जितना समय लगता है. उससे कम समय में शिक्षक सस्पेंड हो जाते हैं.

शिक्षकों को मौखिक रूप से बता दिया है कि वह स्कूल के फंड से पैसा निकाल सकते हैं. लेकिन इसके लिए कोई निर्देश नहीं जारी किया गया है कि पैसा कैसे निकाला जा सकता है. किसके आदेश से और कितना.

क्या किसी स्कूल के बैंक एकाउंट से पैसा निकासी करने के लिए अधिकृत हस्ताक्षरकर्ताओं (एकाउंट होल्डर) को कोई आदेश दिया गया? जो बिहार की हालत है, उसमें क्या गारंटी है कि कल इन बेचारे शिक्षकों को पैसा गबन करने के लिए आरोपित नहीं किया जायेगा.

अगर कोई दिक्कत है तो शिक्षक अपनी जेब से खर्च करें बाद में भुगतान हो जायेगा. ऐसा ही पिछली बाढ़ के दौरान चलाये जा रहे सामुदायिक किचन में हुआ था. विभाग ने उस समय भी शिक्षकों के ऊपर सब कुछ छोड़ कर अपनी जिम्मेदारी से मुक्ति पा ली थी. शिक्षकों को अपनी जेब से कम्युनिटी किचन चलाने के लिए पैसे देने पड़े थे. जिसका भुगतान प्राप्त करने के लिए शिक्षकों को नाको चने चबाने पड़े थे.

अव्वल यह कि सरकारी स्कूल के शिक्षक पिछले 2 महीने से वेतन का इंतजार कर रहे हैं. शिक्षक अपना घर कैसे चलायें, यह उनका सरदर्द है. लेकिन उन्हें सरकार के फरमान को पूरा करना है.

सरकार मानो कि ऐसा मानती है कि शिक्षकों को कोरोना नहीं हो सकता है. इसलिए उन्हें ऐसे-ऐसे इलाकों में कम्युनिटी किचन चलाने के लिए कहा गया है जहां कोरोना की स्थिति बेकाबू है.

शिक्षक अपने सर पर राशन, पानी, गैस का चूल्हा लाद कर सुदूर जगहों पर पहुंचें. अगर सहायता करने के लिए कोई मजदूर, रसोईया मिलता है तो ठीक है वरना यह काम वह अपने बाल बच्चों पति-पत्नी से करवायें. उन्हें दो वक्त का भोजन बाढ़ पीड़ितों को कराना सुनिश्चित करना है.

मान लिया जाये कि शिक्षक स्कूल के फंड से पैसे निकाल पाने में सक्षम होते हैं, जिसकी संभावना कम है, तो क्या इस बात का कोई अता-पता है कि उस अकाउंट में कितने पैसे हैं और क्या यह पैसे कम्युनिटी किचन चलाने के लिए पर्याप्त हैं.

जैसा कि होता है सरकार और नौकरशाहों का काम होता है आदेश निकालना इस मामले में भी आदेश निकाल दिया गया है.

बाढ़ पीड़ित किसे कहेंगे. विभाग ने यह परिभाषित नहीं किया है. शिक्षकों को ही सर्वे करना है कि बाढ़ पीड़ित कौन-कौन से लोग हैं और वह किस इलाके से हैं. और किसे खाना खिलाया जा सकता है. अगर कुछ गलत हुआ तो शिक्षक सूली पर चढ़ने के लिए तैयार रहें.

आज सबके पास एक मोबाइल फोन और सस्ता डेटा है. लोग भी अपने अधिकारों (कर्तव्य नहीं) के लिए इतने जागरूक होते हैं कि सीधे जिला के कलेक्टर को फोन कर देते हैं कि फलाने जगह गड़बड़ी हो रही है. गड़बड़ी हुई कि नहीं यह जांच का विषय है. लेकिन निलंबन तो तत्काल होता है. क्योंकि जनता का विश्वास जीतने के लिए ऐसा करना जरूरी है. ताकि प्रशासन का इकबाल कायम रहे.

ऐसे ही एक शिक्षक को पिछली बाढ़ में इसलिए कारणपृच्छा नोटिस किया गया था क्योंकि किसी ने कलेक्टर को फोन कर शिकायत की थी कि बाढ़ राहत के लिए बने उक्त कम्युनिटी किचन पर खाना देर से बना. तो शिक्षक कारणपृच्छा और निलंबन के लिए तैयार रहें, आपके द्वारा परोसी गयी दाल और सब्जी में नमक कम था, पापड़ कुरकुरे नहीं थे, छौंक ठीक से नहीं लगाया गया, चावल में एक कंकड़ क्यों निकला.

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जब सरकार, नौकरशाह और पदाधिकारी ढीठ, निरंकुश और बेलज्ज हो जाते हैं तो उनके जबाब भी लाजवाब किस्म के होते हैं.

शिक्षा विभाग के एक अधिकारी संजय कुमार देव बड़े मासूमियत से कहते हैं कि “यह तो सेवा कार्य है. पुण्य का काम है.”

तो यह पुण्य का काम नौकरशाह क्यों नहीं करते? सारे पुण्य का काम शिक्षक ही क्यों करें? आपको तो परलोक संवारने के लिए पुण्य कमाने की अधिक आवश्यकता है. आप नौकरशाह तो बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं के राहत कार्य में भी मौका खोज लेते हैं. तो अभी घर में क्यों दुबके हुए हैं?

शिक्षक यह काम बड़ी निपुणता से करते हैं और उनकी काफी प्रशंसा भी होती है. उनका सोशल नेटवर्क काफी बड़ा होता है. इसलिए वह अधिक से अधिक लोगों तक पहुंच सकते हैं. पिछली बार बाढ़ के समय भी शिक्षकों के द्वारा कम्युनिटी किचन का बहुत सफलतापूर्वक संचालन हुआ था.

तो यही काम आप निपुणता से क्यों नहीं कर सकते हैं? क्या आपको तारीफ पसंद नहीं है? शिक्षकों का सोशल नेटवर्क काफी बड़ा होता है तो आपका नेटवर्क बड़ा क्यों नहीं होता है? मतलब कि आप लोग आम जनता से कटे हुए हैं?

“आपदा प्रबंधन विभाग एक-एक पैसे का भुगतान कर देगा. इसलिए चिंता की बात नहीं है.”

अगर चिंता की बात नहीं है, तो आप अपनी सैलरी से ऐसे शिक्षकों को कम्युनिटी किचन चलाने के लिए क्यों नहीं दे देते हैं?

“बिहार में शिक्षकों की संख्या सबसे अधिक है. इसलिए उन्हें इन सब काम में लगाया जाता है?”

शिक्षकों का काम पढ़ाना है या आपकी जिम्मेदारियों को अपने सर पर ढोना? आप काहिल हैं, इसलिए शिक्षकों को यह काम करने चाहिए? तो कल को नगरपालिका के सफाई कर्मचारी हड़ताल पर चले जायेंगे तो शिक्षकों के हाथ आप झाड़ू और कुदाल पकड़ा देंगे, क्योंकि उनकी संख्या अधिक है?

“देखिये यह तो आपदा का समय है इसलिए इसमें क्या कहा जा सकता है.”

तो शिक्षकों से आप पशुगणना तक करवाते हैं. वह भी किसी आपदा की वजह से क्या?

यह समझा जा सकता है कि बिहार में इस साल चुनाव होने हैं और नीतीश कुमार अपने राजनीतिक करियर का अंतिम चुनाव लड़ रहे हैं. बिहार में चुनाव रिलीफ़ और अनुदान की मदद से जीता जाता है. इसलिए बाढ़ राहत का स्वांग रचना जरूरी है. बेहतर होता कि नीतीशजी अपनी पार्टी की इकाई को इस काम में लगाते, इसी बहाने पुण्य और जनसंपर्क दोनों का काम हो जाता.

नीतीश कुमार ने इन 15 सालों में ढंग का एक काम किया हो या नहीं, लेकिन उन्होंने और उनकी प्रशासनिक मशीनरी ने बहुतेरों को नाहक त्रस्त कर दिया. जिसमें से शिक्षक वर्ग भी एक है. जंगलराज का खौफ अधिक दिनों तक नहीं चल सकता है, यह बात नीतीश भी समझते हैं.

डिस्क्लेमरः ये लेखक के निजी विचार हैं.

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