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संतान वियोग से बड़ा कोई दुख नहीं!!

2013 से 2015 के बीच गुम होते बच्चों की संख्या 84% बढ़ी

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Rajesh Kumar Das

तीर्थ यात्रा के क्रम में राजा दशरथ से अनजाने में हुई ग़लती के कारण श्रवण कुमार को तीर लग जाता है, और उसकी मृत्यु हो जाती है. बेटे की मृत्यु के बाद उनके माता-पिता बेटे का नाम लेकर रोने लगते हैं. श्रवण कुमार के माता और पिता पुत्र के वियोग में प्राण त्याग देते हैं. राजा दशरथ की रानी कैकेयी की हठधर्मिता के कारण ही मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम को पत्नी सीता और अनुज लक्ष्मण सहित वन में जाना पड़ा था और पुत्र के वियोग में ही राजा दशरथ ने अपने प्राण त्याग दिए थे. महाभारत युद्ध की समाप्ति के पश्चात कौरवों की माता गंधारी जो अपने 100 पुत्रों की मौत के वियोग में शोक-संतप्त थी, ने श्री कृष्ण को उनके वंश की समाप्ति तक का शाप दे दिया था. इसी प्रकार ग़ज़ल की दुनिया के जादूगर श्रीमान जगजीत सिंह जी ने भी अपने पुत्र विवेक की सड़क दुर्घटना में असमय मृत्यु के बाद पुत्र वियोग में कुछ ऐसे ग़ज़ल पेश किए जो इस विषय पर बहुत प्रासंगिक हैं. उनकी धर्मपत्नी और मशहूर ग़ज़ल गायिका चित्रा सिंह जी ने तो अपने पुत्र की मौत के पश्चात सक्रिय गायिकी से लगभग विदाई  ही ले ली. इसके अलावा बहुचर्चित निठारी कांड की दुख भरी याद, जिसने कई मां-बाप से उनके बच्चे सदा के लिए छीन लिए थे, अब तक हमारी जहन में बसी हुई है.

मुझे माफ़ करेंगे,  मेरे पास अन्य कोई उदाहरण नहीं थे, जिन्हें  मैं संतान-वियोग के दुःख के सन्दर्भ में आपके समक्ष रख पाता, और आपका ध्यान आकृष्ट करा पाता. हमारे देश में ऐसे लाखों उदाहरण होंगे, जिन्होनें अपने बच्चों को खोया होगा और या तो वे संतान-वियोग की असीम पीड़ा के साथ किसी तरह जी रहे होंगे या खुद ही ईश्वर के पास चले गए होंगे. हमारे देश में “गुम होते बच्चों” की संख्या बहुत तेज और खतरनाक तरीके से बढ़ रही है. 12 फ़रवरी 2017 के दैनिक हिंदुस्तान की एक खबर ने मुझे बुरी तरह से झकझोर दिया था, खबर का शीर्षक था “कहाँ गायब हो रहे हैं हमारे मासूम”. इस खबर ने माता-पिता की पीड़ा, उनके दर्द की इन्तेहां और उन बच्चों की तलाश में मिल रही नाकामयाबी की वजह ने ही मुझे इस विषय पर आपके और भारत के महामान्य प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी तक पहुंचने की प्रेरणा दी और मैं इस विषय पर आप तक कुछ बेहद जरूरी जानकारी और सुझाव प्रेषित कर रहा हूं. पूर्ण विश्वास है कि भारत के महामान्य प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी, गुम होते और फिर से मिल नहीं पा रहे बच्चों के पिता के रूप में ही उनकी भावना को दिल से समझते हुए कुछ ऐसी कार्रवाई जरूर करेंगे जो मील के पत्थर साबित होंगे.

2013 से 2015 के बीच गृह मंत्रालय के एक आंकड़ों के अनुसार गुम होते बच्चों की संख्या 84% तक बढ़ गयी है. जहां वर्ष 2013 में कुल 34,244 बच्चे गुम हुए थे वहीं 2015 में यह संख्या 62,988 की रही, जो एक बेहद डरावनी संख्या है. Child  Relief  & You  (CRY) के अनुसार प्रतिदिन 180 बच्चे भारत के विभिन्न स्थानों से गुम हो जा रहे हैं. 2010-2014 के बीच के आंकड़ों पर अगर गौर किया जाय तो इन गुम होने वाले बच्चों में 61% बच्चियाँ हैं. पूरे देश में अकेले सिर्फ पश्चिम बंगाल से प्रत्येक गायब हो रहे 5 बच्चों में 1 बच्चा गायब हो रहा है. कई राज्यों में पुलिस,  प्रशासन और स्वयंसेवी संस्थाओं के इस विषय पर परियोजनाएं चल रहीं है,  हर वर्ष 25 मई को अंतरराष्ट्रीय मिसिंग चिल्ड्रन डे जैसा विश्व-व्यापी ऑब्जर्वेंस आहूत किया जाता है, और फिर भी हम अभी भी हमारे बच्चों को गुम होने और उन्हें खोज नहीं पाने के बोझ तले दबे हुए हैं.

आख़िर ये बच्चे कहां गुम हो जा रहे है कि हम उन्हें ढूंढ ही नहीं पा रहे हैं, ये बच्चे किन परिस्थिति में गुम हो रहे हैं, क्या बच्चों को गुम होने से बचाने की ओर हमारा ध्यान कम है या फिर हमारे बच्चों के गुम हो जाने के बाद तुरंत उन्हें ढूंढने में प्रशासन की सक्रियता कम पड़ जा रही है, क्या कोई संगठित गिरोह उनका अपहरण कर उन्हें देह व्यापार की तरफ धकेल देता है या फिर उनके अंगों का व्यापार करता है या फिर बाल-श्रम के रूप में उनका इस्तेमाल किया जाता है या सड़कों पर भीख मांगने के लिए उनका इस्तेमाल किया जाता है या उन्हें नशे के धंधे में डाल दिया जाता है, हथियारों की ढुलाई करवाई जाती है आदि ऐसी अनेक डरावनी बातें हैं, जिनपर जितनी जल्द विराम लगे उतना ही अच्छा है.  इस विषय पर बहुत ही संजीदगी के साथ असहाय अभिभावकों के साथ सहयोग करते हुए आगे बढ़ने की जरूरत है ताकि उनके खोज-बीन और बरामदगी के लिए एक ऐसा सिस्टम तैयार हो सके जो तेज, प्रभावी और कारगर हो.

सरकारी स्तर पर क्या किया जा सकता है

सबसे पहले उपलब्ध तकनीक का इस्तेमाल करते हुए हुए कम से कम उन स्कूलों में जहां सम्भव हों, GPS /RFID (Radio Frequency Based  ID) आधारित बाल-ट्रैकिंग प्रणालियां स्थापित की जा सकती है ताकि बच्चों को उनके घर से स्कूलों तक और फिर वापस उनके घर तक जरूरत के अनुसार मोबाइल के जरिये ट्रैक किया जा सके. धीरे-धीरे इन प्रणालियों को डिजिटल इंडिया की अवधारणा के अनुसार ग्रामीण इलाकों और शहरी बस्तियों में भी प्राथमिकता के आधार पर बढ़ाया जा सकता है और इन कार्यों के लिए स्थानीय कार्पोरेट्स का सहयोग भी CSR (Corporate  Social  Responsibility)  के तहत लिया जा सकता है.

बच्चों के गुम होने के केसों में “जीरो टोलरेंस और गोल्डन आवर सिस्टम” की प्रणालियां विकसित की जानी चाहिए, जैसे अगर किसी का बच्चा गुम हो जाता है तो FIR के 2 घंटे के अंदर सम्बंधित अनुसंधान पदाधिकारी को अपने मुख्य पदाधिकारी के जरिये जिला पुलिस कप्तान साहब को कृत-कार्य प्रतिवेदन देना जरूरी हो और साप्ताहिक स्तर पर जिला पुलिस कप्तान साहब भी इसी प्रकार का अनिवार्य प्रतिवेदन सेंट्रल पोर्टल में डालें तो इस विषय पर एक तेज रेस्पॉन्स सिस्टम के साथ बड़ी सहूलियत हो जाएगी. इस प्रकार की प्रणालियों से ज्यादा जिम्मेदार और संवेदनशील ढंग से बच्चों को ढूंढने की कार्रवाई शुरू हो सकेगी और उन्हें जल्द ढूंढा भी जा सकेगा. अभिभावक गणों की बेचैनी भी कम हो सकेगी, उनका सिस्टम पर विश्वास भी बढ़ेगा.

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स्थानीय पुलिस के अपने इंटेलिजेंस सिस्टम को भी इस विषय पर प्रशिक्षण देकर ज्यादा जिम्मेदार बनाया जा सकता है. स्थानीय पुलिस इस विषय पर पुरुषों के अलावा महिलाओं की मदद भी ले सकती है और ख़ुफ़िया तरीके से उन्हें इस विषय पर सहायता हेतु तैयार भी कर सकती है. महिलाओं के जरिये खुफिया मदद लेने से बाल-श्रम पर रोक लगाने में भी ज्यादा अच्छी कामयाबी हासिल की जा सकती है. स्थानीय इंटेलिजेंस के प्रभावी होने की स्थिति में एक अच्छे नेटवर्क के जरिये और स्वतः स्फूर्त ढंग से जरूरी जानकारियां एक दूसरे के साथ साझा की जा सकेंगी और समय रहते कार्रवाई कर बच्चों को ढूंढ लिया जा सकेगा और साथ ही एक ऐसे वातावरण का निर्माण भी किया जा सकेगा जहां बच्चे ज्यादा सुरक्षित और स्वाभाविक रूप से अपने उन्मुक्त जीवन का आनंद भी ले सकें.

बच्चों को इस प्रकार से गायब करते समय मुख्य रूप से उनके अपहरणकर्ता बसों, ट्रेनों और निजी गाड़ियों का ज्यादा इस्तेमाल करते हैं अतः इनमें से किसी भी माध्यम के ट्रांसपोर्ट में बच्चों के अन्य लोगों के साथ बैठे पाए जाने की स्थिति में, (फिर वे उनके अभिभावक ही क्यों न हों) उनकी तसल्ली जरूर की जानी चाहिए कि ये बच्चे उनके ही अपने परिवार के ही हैं या नहीं. इस तरह के पहचान अभियान की सफलता के लिए संबधित लोगों जैसे टिकट संग्राहक या स्थानीय पुलिस को जरूरी तौर तरीकों से प्रशिक्षित भी किया जा सकता है.

प्रत्येक शहर में भीख मांग रहे या सड़कों पर किसी भी प्रकार का काम कर रहे बच्चों पर एक सेंट्रल इंटेलिजेंस के जरिये नज़र रखी जानी चाहिए कि आखिर ये बच्चे कौन हैं, ये कहां से आते हैं और रात को कहां चले जाते हैं. क्या इन्हें जबरन इन क्षेत्रों में भेज जाता है या इन्हें नशे का आदी बनाकर उनसे गैरकानूनी काम करवाये जातें है. किसी भी प्रकार की गड़बड़ी पाए जाने पर तुरंत इन्हें कब्जे में लेकर जरूरी पूछताछ की जानी चाहिए ताकि आगे की जानकारियां सुलभ हो सके. इस प्रकार के बच्चों पर विशेष कड़ी नज़र इसलिए भी रखी जानी चाहिए क्योंकि ये वो बच्चे भी हो सकते हैं जो दूसरे छोटे बच्चों को बहलाकर अपने साथ लेकर भाग भी सकते हैं और उन्हें हमेशा के लिए गुम भी कर सकते हैं.

राज्यों के बीच एक पारस्परिक सहयोग का सिस्टम तैयार करना भी इस विषय पर बेहद जरूरी रहेगा ताकि एक तेज रेस्पॉन्स सिस्टम के साथ त्वरित कार्रवाई संभव हो सके. हरेएक राज्यों में इस विषय पर नोडल अधिकारियों को प्राथमिक जिम्मेदारियां दी जा सकती है और आपस में सहयोग का वातावरण तैयार किया जा सकता है.

इस विषय पर हमारे नगर निकाय भी बड़ी जिम्मेदारी ले सकते हैं और अपनी नेबरहुड कमिटियों के मार्फ़त सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों से एक बाल- सुरक्षित वातावरण का निर्माण कर सकते हैं, बच्चों के गुम हो जाने की स्थिति में वे तुरंत संवाद के प्रसारण का माध्यम भी बन सकते हैं ताकि एक तेज रेस्पॉन्स सिस्टम की स्थापना सम्भव हो सके.

अगर उपरोक्त बिंदुओं पर सरकार कुछ जरूरी कदम उठा सके तो हमारे गुम होते बच्चों की संख्या में बड़ी गिरावट दर्ज की जा सकेगी, माता-पिता के संतान-वियोग से सम्बंधित असहनीय दुःख पर विराम लग सकेगा और वे बच्चे जो आज की तारीख में गुम हो जा रहे हैं वे राष्ट्र के निर्माण में अपनी महती भूमिका निभाने में अपनी बड़ी भागीदारी पेश कर सकेंगे. पूर्ण विश्वास है कि भारत के महामान्य प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी मेरे सुझावों पर गौर करते हुए इन संदर्भों के आधार पर जरूरी संज्ञान लेने की कृपा जरूर करेंगे!!

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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