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जमशेदपुरः बदहाली में जी रही सबर आदिम जनजाति को किसी दल ने नहीं बनाया चुनाव का मुद्दा

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  • सीएम रघुवर दास और मंत्री सरयू राय का क्षेत्र के रूप में है इलाके की पहचान
  • चार गांवों के 106 सबर परिवारों में से 45 परिवार राशन और पेंशन से वंचित हैं

Ranchi:  राज्य में विकास विज्ञापनों में ही दिखता है. जनता के सवालों को लेकर हल करने के लिए न ही सत्ता पक्ष आगे आ रहा न ही विपक्ष ने चुनावी माहौल में इसे मुद्दा बनाया है.

जमशेदपुर लोकसभा क्षेत्र से जिसे  राज्य के सीएम और सरयू राय जैसे दिग्गज नेता का क्षेत्र के रूप में जाना जाता है, वहीं कांग्रेस अध्यक्ष डा. अजय भी सांसद रह चुके है.

यहां से वर्तमान विधायक भी भाजपा से है. झामुमो की भी इलाके में पकड़ मजबूत है. इसके बावजूद आमजनों के सरोकर को राजनीतिक दल तरजीह नही देते. सरकारी योजना गांव में पहुंचने से पहले ही दम तोड़ देती है. रघुवार सरकार के दावे भी उनके गृह जिला में दम तोड़ते नजर आते हैं.

कुपोषण का शिकार एक सबर परिवार.

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जमशेदपुर लोकसभा क्षेत्र के घाटशिला प्रखंड के आदिम जनजाति वाले गांव में विकास के दावे खोखले साबित हो रहे हैं. घाटशिला प्रखंड के चार गांव बाससडोरा, होलुदबोनी, छोटोडांगा और रामचन्द्रपुर में 106 सबर परिवारों में से कम-से-कम 45 परिवार आदिम जनजाति राशन और पेंशन से वंचित हैं.

बाससडोरा, होलुदबोनी, छोटोडांगा और रामचन्द्रपुर की आदिम जनजाति सबर का हाल

बासाडोरा गांव की आदिम जनजाति सबरों की आजीविका आज भी वन उपज और मज़दूरी पर निर्भर है. दिन भर की कमरतोड़ मज़दूरी के बाद 200 रुपया भी एक परिवार नहीं कमा पाता है.

गांव का एक सबर परिवार  जोबा और बनावली दोनों मिलकर 200 रुपया अगर मजदूरी मिल जाये तो भी काम करने के लिए तैयार हो जाते हैं. वो ऐसा नहीं करें तो भूखे रहने की भी आ जाती है.

गांव के अन्य सबर परिवार भी जोबा और बनावली की तरह नमक-भात पर ही जीते हैं. जिनके पास आधार कार्ड नही है उन्हें सरकारी योजना का भी लाभ नहीं मिल रहा.

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कई परिवारों का नहीं बना है आधार कार्ड

होलुदबोनी गांव के सोमबारी व भूशेन सबर का आधार कार्ड नही है. इस कारण वह राशन व पेंशन के अपने आधिकार से वंचित है. सोमबारी पिछले एक महीने से बीमार है. प्रखंड स्तरीय सरकारी अस्पताल ने उनकी कोई जांच न कर उन्हें केवल विटामिन सप्लीमेंट दे दिया.

उन्हें अभी भी कंपकंपी होती है, बुखार से ग्रस्त रहती हैं. लगातार कमज़ोर होती जा रही है. होलुदबोनी के किशोरी और मालती सबर भी आधार न होने के कारण पेंशन से वंचित हैं. उसी गांव की वृद्धा फुलमनी सबर अकेली रहती हैं. न ही उनके पास राशन कार्ड है और न उन्हें पेंशन मिलती है.

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गरीबी और कुपोषण का दंश झेल रहे सबर परिवार

सबर परिवार सरकार द्वारा वर्षों पहले निर्मित एक कमरे के जीर्ण घरों में रहते हैं. अधिकांश सबर कुपोषित हैं. झारखंड में बच्चों को आंगनवाड़ी में तीन अंडे प्रति सप्ताह एवं विद्यालयों के मध्याह्न भोजन में दो अंडे प्रति सप्ताह मिलने हैं.

लेकिन बासाडोरा की आंगनवाड़ी में अंडे नहीं मिलते. मध्याह्न भोजन में केवल एक अंडा प्रति सप्ताह मिलता है.

नवजात बच्ची हुई कुपोषण का शिकार

छोटोडांगा में मालती सबर की 23 दिनों की बच्ची का वज़न केवल 1.8 किलो है. उसे जन्म के बाद प्रखंड अस्पताल में अस्वस्थ बच्चों के लिए बनी सुविधा में पांच दिन रखा गया.

उसके बाद विटामिन सिरप के साथ वापस भेज दिया गया. आंगनवाड़ी सेविका एवं अस्पताल के डॉक्टर की देखभाल में कुपोषित बच्ची की जान तो शायद बच जायेगी. लेकिन उसकी स्थिति उसकी उसकी मां की भूख व कुपोषण की स्थिति भी उजागर करती है.

यह परिवार अनाज के चंद दानों के लिए मोहताज है. अधिकतर परिवारों को पिछले एक साल में नरेगा में काम नहीं मिला. मज़दूरी भुगतान में विलम्ब के कारण कई लोग नरेगा में काम भी नहीं करना चाहते हैं.

शायद ही कोई व्यस्क शिक्षित है

इन गांवों में शायद ही कोई व्यस्क शिक्षित है. 2011 की जनगणना के अनुसार झारखंड के सबर वयस्कों में केवल 21% ही शिक्षित थे.

सबर परिवारों में शिक्षा की स्थिति को सुधारने के लिए सरकार की ओर से किसी प्रकार की विशेष पहल नहीं की गयी है. छोटाडांगा के गोवर्धन सबर और रवि सबर ने प्राथमिक विद्यालय से पढ़ाई छोड़ दी, क्योंकि उन्हें गैर-आदिम जनजाति बच्चे परेशान करते थे.

क्या है सरकार की योजना और सर्वोच्च न्यायालय के आदेश

सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के अनुसार सभी आदिम जनजाति परिवारों को अंत्योदय राशन कार्ड का अधिकार है. जिसके माध्यम से उन्हें प्रति माह 35 किलो मुफ्त अनाज मिलना है.

झारखंड में आदिम जनजाति परिवारों को 600 रुपया की मासिक पेंशन भी मिलनी है. (राज्य सरकार के हाल के निर्णय के अनुसार अब 1000 रुपया  प्रति माह मिलना है)

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