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आपके सवालों को इन बहुआयामी कोलाहलों में कोई नहीं सुननेवाला, जवाब की तो बात ही बेमानी है…

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Hemant Kumar Jha

हितों के अलग-अलग द्वीपों पर लड़ रहे जो लोग लड़ाई का पहला चरण हार चुके हैं. वे दूसरे चरण में भी हारने को अभिशप्त हैं. जब अपनी हार की पटकथा आप स्वयं लिखते हैं तो फिर…हारने और लगातार हारने के सिवा और कोई विकल्प रह भी नहीं जाता.

लड़ाई का पहला चरण था अपनी संस्थाओं को निजीकरण के दलदल से बचाना और दूसरा चरण है निजीकृत होने के बाद संस्था के कर्मचारी के तौर पर आपके अधिकारों का संरक्षण.

जितनी आसानी से, बिना किसी प्रभावी प्रतिरोध के लड़ाई का पहला चरण लोग हारते जा रहे हैं, उसमें ही अगले चरण की हार के संकेत स्पष्ट हैं. हार भी ऐसी, जिसे कारुणिक कहें कि हास्यास्पद, समझ नहीं आ रहा.

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जैसे पहली निजी ट्रेन ‘तेजस‘ के चलाये जाने का विरोध रेल कर्मचारियों ने किया. तेजस की यात्रा को बाधित करने के लिए वे कहीं पटरी पर लेटे तो कहीं प्लेटफार्म पर नारेबाजी की. बतौर रेल कर्मचारी यूनियन, देश के अनेक शहरों में उन्होंने रेलवे के निजीकरण के खिलाफ प्रतिरोध की हुंकार भरी.

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“हर जोर-जुलुम के टक्कर में, संघर्ष हमारा नारा है” टाइप के नारों से आसमान सिर पर उठा लिया उन्होंने.

नतीजा…?

सरकार ने घोषणा की कि तेजस के बाद वह 150 और निजी ट्रेन चलाने की तैयारी कर रही है, साथ ही 50 बड़े रेलवे स्टेशन का निजीकरण भी करने जा रही है.

आप नारे लगाते रहिये. सरकार को पता है कि कंठ फाड़-फाड़ कर नारे लगानेवाले इन समूहों में प्रतिरोध के चरित्र बल का घोर अभाव है और जो लड़ाइयां वे लड़ रहे हैं, उनकी हार की पटकथा खुद उन्होंने ही लिख रखी है.

जो पीढ़ी शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे संवेदनशील मसलों को निजीकरण की फांस से नहीं बचा पायी वह क्या खा कर रेलवे, ओएनजीसी, गेल, भेल, एयर इंडिया आदि पीएसयू इकाइयों को कारपोरेट की संपत्ति बनने से बचा सकेगी.

निजीकरण एक अभियान है, एक बड़ी साजिश का हिस्सा है.

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साजिश…पूरी मानवता को अपना गुलाम बनाने की, तमाम सार्वजनिक संपत्तियों पर काबिज होने की, भावी सभ्यता की धारा को अपने व्यावसायिक हितों के अनुकूल मोड़ने की.

श्रम कानूनों में एक के बाद एक संशोधनों से यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि एक कर्मचारी के रूप में किसी के अधिकार न्यूनतम भी न रह पायें, जबकि, एक नियोक्ता के रूप में कंपनियों के अधिकार ‘माई-बाप’ से भी अधिक…बल्कि असीमित हो जायें. वे चाहें तो महज दो दिनों की नोटिस पर अपने किसी भी स्थायी कर्मचारी को बाहर का रास्ता दिखा सकते हैं.

मुआवजा…???

यह किस चिड़िया का नाम है?  इसमें ‘यथोचित’ का विशेषण लगाना तो भूल ही जाइये.

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तो…लड़ाई का पहला चरण हार रहे आंदोलित समूह दूसरा चरण भी साथ-साथ ही हारते जा रहे हैं। उनकी संस्थाओं का निजीकरण, निगमीकरण, विनिवेशीकरण आदि तो हो ही रहा है, बतौर निजी संस्था के कर्मचारी, उनके न्यूनतम अधिकारों की भी बलि दी जा रही है.

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प्रतिरोध का अपना चरित्र होता है. इसके अभाव में यह कितना प्रभावी होगा, यह सामने नजर आ रहा है.

यह नहीं हो सकता कि बतौर नागरिक, बतौर मतदाता आप किसी अन्य विचार-भूमि पर विचरण करें और बतौर कर्मचारी आपके सरोकार किसी अन्य वैचारिकता से प्रेरित हों.

संघर्षों की राह में वैचारिक दोहरापन की कोई जगह नहीं होती.

यह नहीं हो सकता कि आप आबादी के निचले बड़े हिस्से के सरोकारों से नितांत असंपृक्त रहें और शोषणकारी व्यवस्था के खिलाफ किसी मुकम्मल संघर्ष की कल्पना भी करें.

यह नहीं हो सकता कि बतौर मतदाता आपके राजनीतिक सरोकार अलग हों और बतौर कर्मचारी अलग.

टुकड़ों-टुकड़ों में बंटा संघर्ष, हितों के अलग-अलग द्वीपों पर बिखरा संघर्ष पराजित होने के लिए ही अभिशप्त होता है.

यही कारण है कि जैसे-जैसे निजीकरण के खिलाफ कर्मचारियों का कोलाहल सघन होता जा रहा है उसी अनुपात में, बल्कि उससे भी अधिक सघनता से निजीकरण की प्रक्रियाएं आगे बढ़ती जा रही हैं.

सरकार को कोई भय नहीं, क्योंकि उसे प्रतिरोधी समूहों के चारित्रिक खोखलेपन का अंदाजा है.

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तभी तो…

सार्वजनिक क्षेत्र की पांच इकाइयों, जिसमें भारत पेट्रोलियम जैसी बड़ी संस्थाएं भी शामिल हैं, में विनिवेशीकरण की घोषणाओं के बाद सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र की 74 अन्य इकाइयों को भी इसके लिए चिह्नित कर लिया है. इनमें ओएनजीसी, इंडियन ऑयल कारपोरेशन, गेल, भेल आदि वैसी कंपनियां भी शामिल हैं, जिन्हें कभी ‘नवरत्न’ का दर्जा दिया गया था.

सरकारी या सार्वजनिक संपत्तियों की हिस्सेदारियों को बेचने की कीमतें क्या हैं, इनका निर्धारण कौन कर रहा है, कीमत निर्धारण की कसौटियां क्या हैं आदि जैसे सवाल करना बेमानी है. ऐसे ही सवालों के लिए हमारे पूर्वजों ने “नक्कारखाने में तूती की आवाज” जैसे मुहावरों का इजाद किया था.

जब कोलाहलों के विभिन्न आयाम हों, जब मनावैज्ञानिक स्तरों पर दिग्भ्रमित हो कर लोग बतौर नागरिक अपने हित-अहित सोचने की शक्ति खोने लगे हों, जब लोकतंत्र कारपोरेट शक्तियों के हितों के दायरे में सीमित होने लगा हो, जब संवैधानिक संस्थाएं अपनी अस्मिता के रक्षण में भी खुद को असहाय पाने लगी हों, जब जन सरोकार के सवाल नेपथ्य में जा चुके हों और डरावने नारे उनका स्थान लेने लगे हों…तो…बिकती जा रही सार्वजनिक संपत्तियों की कीमतें कैसे तय हो रही हैं जैसे सवालों का कोई मतलब नहीं रह जाता है.

और…अगर आप ये सवाल पूछते ही हैं तो आपकी आवाज इन बहुआयामी कोलाहलों में कोई नहीं सुननेवाला. जवाब की तो कोई उम्मीद ही बेमानी है.

हारे हुए लोग सवाल नहीं करते और अगर करते हैं तो उन सवालों का कोई असर नहीं होता. खास कर तब, जब हार की राह स्वयं तय की जाये.

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(हेमंत कुमार झा के फेसबुक वाल से)

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