न्यूज़ विंग
कल का इंतज़ार क्यों, आज की खबर अभी पढ़ें

झारखंड की कोई भी सरकार पर्यटन को लेकर कभी गंभीर दिखाई नहीं पड़ी

सरकार के विभागों की सुस्ती की वजह से झारखंड में पर्यटन उतना विकसित नहीं हो पाया जितना होना चाहिए था.

76

Rajesh Kumar Das

वैसे तो झारखंड कुदरत की मेहरबानियों से भरा हुआ है, परंतु सरकार के विभागों की सुस्ती की वजह से झारखंड में पर्यटन उतना विकसित नहीं हो पाया जितना होना चाहिए था. अब तक की कोई भी सरकार पर्यटन को लेकर इतनी गंभीर भी दिखाई नहीं पड़ी है. यहां तक कि मुख्यधारा मीडिया, जिन्हें पर्यटन स्थल-वार विस्तृत फीचर्स प्रकाशित कर, उन पर्यटन स्थलों की खूबियों और कमियों के बारे सरकार और जनता दोनों का ध्यान आकर्षित करना चाहिए था, वे भी इस जरूरी मुद्दे पर चूक रहे हैं.

मैं पिछले दिनों नेतरहाट गया था, बेहतरीन जगह है, खूबसूरत और रमणीक, एक परफेक्ट वीकेंड डेस्टिनेशन, इसे झारखंड की क्वीनऑफ हिल्स भी कहा जाता है, आप वहां के सूर्यास्त और सूर्योदय को देखकर खुश हो जाएंगे, और भी कई जगह हैं घूमने के लिए जैसे- नेतरहाट विद्यालय, कोयल व्यू पॉइंट, अपर और लोअर घघारी, लोध वाटर फॉल (जो वहां से 65 किमी की दूरी पर अवस्थित है और अद्भुत है), परंतु रांची से 160 किमी तक नेतरहाट की दूरी तय करने में आपको कहीं भी ऐसा नहीं लगेगा कि झारखंड का पर्यटन विभाग एक्सिस्ट भी करता है. अब जो भी है वह स्वतः स्फूर्त है, लोगों की वजह से है, इसमें कोई विशेष सरकारी योगदान नहीं दिखता है और ऐसा सिर्फ नेतरहाट के साथ नहीं है, झारखंड में सब तरफ लगभग ऐसा ही है.

एक विवरण और देना चाहूंगा, मेरे एक डॉक्टर मित्र बतलाते हैं कि रांची में डॉक्टरों की फीस बहुत ऊंची है, जबकि पटना जैसे शहर में काफी बड़े और अच्छे डॉक्टरों से मात्र रु 100 में परामर्श लिया जा सकता है. उसी प्रकार नेतरहाट में बेहद कम सुविधाओं के साथ उपलब्ध सरकारी अरुणोदय होटल का किराया इस वक़्त पीक रेट में 3000, 3500 और 4500 रुपये (सुईट) है, जहां रूम चार्ज के हिसाब से दी जा रही सुविधाओं में बड़ा गैप है. रूम हीटर नहीं है, एक डबल बेड रूम में सिर्फ एक तैलिया है, कम्बल की ताकत नेतरहाट के हिसाब से नाकाफी है, अतिरिक्त बेड के बजाय गद्दा उपलब्ध है पर कम्बल नहीं है, रूम में डस्टबिन तक नहीं है, साथ ही बताये गए सोफा कम बेड के स्थान पर रूम में सिंगल सोफा है और तो और आउटसोर्सड रेस्टॉरेंट में नाश्ते के लिए ब्रेड तो है परंतु बटर नहीं है. ये विवरण मेरे एक परिचित और सामाजिक रूप से अतिसक्रिय आदरणीय वरिष्ठ नागरिक श्री के. के. साबू जी जो अभी हाल ही में नेतरहाट से लौटे हैं, उन्होंने हमारे ग्रुप के साथ साझा किया है.

अब क्या होना चाहिए- अगर सरकार चाहे तो इन स्थानों में आवश्यक सुविधाएं दे सकती है, स्थानीय बिजनेस कम्युनिटी वहां निवेश कर लिए रुख कर सकते हैं, यहां के लोगों को पर्यटन के लिए पेशेवर तरीके से तैयार किया जा सकता है, और भी बहुत कुछ हो सकता है, मगर साफ नीयत और इक्षा शक्ति सर्वाधिक आवश्यक है, तब तक अखबारों को पढ़िए, आस-पास घूमिये और दोस्तों के साथ देश और राज्य को बदलने की चर्चाएं कीजिये, नए साल के स्वागत की तैयारी कीजिये!!

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

इसे भी पढ़ें – लोकसभा चुनाव: कहीं महागठबंधन का नया प्लॉट तो नहीं हो रहा तैयार

इसे भी पढ़ेंः सीएम से शिकायत की वजह कहीं बीजेपी नेता को जमीन कब्जाने में सीओ का रोड़ा तो नहीं !

 

हमें सपोर्ट करें, ताकि हम करते रहें स्वतंत्र और जनपक्षधर पत्रकारिता...

Comments are closed.

%d bloggers like this: