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किसी भी भुईंहरी जमीन का पूर्ण अधिकार का पट्टा नहीं हो सकता, न ही जमीन का स्वामित्व बदला जा सकता हैः रश्मि कात्यायन

  • भुईंहरी जमीन का हस्तांतरण आदिवासियों के बीच भी नहीं हो सकता

Ranchi: झारखंड में अलग-अलग तरह की जमीन की प्रकृति है. आदिवासियों की जमीन संरक्षित करने के लिए कई कानून भी मौजूद हैं. इसके बाद भी आदिवासी परिवारों के हाथ से जमीन का हस्तांतरण एवं गैरकानूनी कब्जा होता रहा है.

इसके कई उदहारण रांची में देखने को मिलते हैं. रांची शहर में इन दिनों कुछ बड़े निर्माणाधीन और तैयार हो चुके भवन विवादों में घिरते नजर जा रहे हैं. बरियातू रोड स्थित प्रेमसंस बल्डिंग अपार्टमेंट, राम प्यारी अस्पताल और निर्माणाधीन पल्स अस्पताल पर सवाल उठ रहे हैं.

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आरोप लग रहे हैं कि इन भवनों का निर्माण भुईंहरी जमीन पर किया जा रहा है. आरोप लगने के बाद सीएम हेमंत सोरेन ने पल्स अस्पताल के निर्माण की जांच रांची डीसी को करने को कहा है.

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भुईंहरी जमीन आदिवासी लैंड की श्रेणी में आती है. भुईंहरी नेचर की जमीन क्या है, उसकी खरीद-बिक्री किन शर्तों पर आधारित है, इन बातों की जानकारी कम ही लोगों को है. न्यूज विंग ने भुईंहरी जमीन के बारे में जानने की कोशिश की. इस संदर्भ में राजस्व मामलों के विशेषज्ञ और वरिष्ठ अधिवक्ता रश्मि कात्यायन ने न्यूज विंग से बात की. जानते हैं उन्होंने भुईंहरी जमीन के बारे में क्या कहा.

रश्मि कात्यायन ने कहा कि भुईंहरी जमीन का हस्तांतरण आदिवासियों के बीच भी नहीं हो सकता, न ही हस्तांतरण की कोई नियमावली बनी हुई है. सीएनटी एक्ट की धारा 48 में भुईंहरी जमीन की बिक्री पर रोक लगी हुई है.

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भुईंहरी जमीन पर अगर किसी व्यक्ति उपायुक्त की स्वीकृति के बाद विशेष प्रयोजन से लेता भी है, तो इसके बाद भी भुईंहरी जमीन की प्रजा का उस जमीन पर सीमित अधिकार है. इस जमीन का वह (उपायुक्त के परमिशन से जिसे मिला है- प्रजा) खरीद बिक्री नहीं कर सकता. चूंकि उपायुक्त के परमिशन से विशेष कार्य के लिए भुईंहरी जमीन ली गयी है ऐसे में अगर वह उस कार्य को नहीं करता, तब उस व्यक्ति का अधिकार स्वत: खत्म हो जाता है. इस जमीन की किसी भी सूरत में खरीद बिक्री नहीं की जा सकती.

क्या है भुईंहरी जमीन का इतिहास

भुईंहरी जमीन वह जमीन है जो झारखंड के दक्षिणी छोटानागपुर प्रमंडल में 2482 मौजा में स्थित है. यह जमीन जहां है उसे भुईंहरी मौजा कहते हैं. भुईंहरी जमीन के मालिक वे परिवार हैं जिनके पूर्वजों ने जंगल साफ कर जमीन को आबाद किया और खेती लायक बनाया. साथ ही गांव को बसाया है.

जब अंग्रेज इन इलाकों में आये तब उन्होंने यहां की सभी जमीन को जमींदारों की जमीन समझने की भूल की. इसके विरुद्ध भुईंहरी गांवों में संघर्ष और विद्रोह तेज हो गया. यह संघर्ष जमींदारों, अंग्रेजों और भुईंहरी परिवारों के बीच चलने लगा. इलाका अंशात हो गया.

इसके उपरांत अंग्रेजों ने सन् 1869 में एक कानून बनाया, जिसे छोटानागपुर टेनयोर एक्ट के रूप में जाना जाता है. और यह कानून 1869 में 2482 भुईंहरी मौजा के लिए लागू किया गया. छोटानागपुर टेनेंसी एक्ट 1908 में भी भुईंहरी अधिकार को बनाये रखा गया. और इस जमीन की खरीद बिक्री पर लोग रोक लगायी गयी है.

इस जमीन पर भुईंहरी परिवार सिर्फ अपने संगे सबंधियों को बसा सकते थे, लेकिन उनका भी सीमित अधिकार ही था.

भूमि सुधार कानून 1954 आने के समय भी विद्रोह सुलगा

भूमि सुधार कानून 1954 लागू करने के समय भी इलाके में विद्रोह की स्थिती बनी. इसके बाद भुईंहरी जमीन को भूमि सुधार कानून से अलग रखा गया.

यह जमीन सरकार में निहित नहीं है. सरकार इस जमीन का दाखिल-खारिज नहीं कर सकती और न ही रसीद काट सकती है.

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कैसे होता रहा भुईंहरी जमीन का अलग-अलग मकसद से उपयोग

भुईंहरी जमीन का विशेष प्रयोजन के लिए उपायुक्त के परमिशन से स्कूल, कॉलेज, उद्योग के लिए जो सार्वजानिक उपयोग के कार्य हों के लिए अनुमति मिलती रही. लेकिन उपायुक्त के परमिशन से जो जमीन का पट्टा तैयार होता था, उसमें जमीन के उपयोग के टर्म और कंडीशन स्पष्ट रूप से लिखने की बाध्यता रही थी.

मान लें कि किसी भुईंहरी जमीन पर स्कूल बनाने की स्वीकृति उपायुक्त के द्वारा ली गयी है. अगर स्कूल बंद हो जाता है तो जिस व्यक्ति को स्वीकृति मिली है, वह उस जमीन को दूसरे कामों में उपयोग में नहीं ला सकता. न ही वह व्यक्ति भुईंहरी जमीन को बेच सकता है. स्कूल बंद होने की स्थिति में मूल भूस्वामी को यह जमीन स्वतः वापस हो जानी चाहिए.

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