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भाजपा से सही कीमत नहीं वसूल कर पाने के कारण राजद के पाले में गये नीतीश कुमार

Rakesh Kumar

बिहार में एक बार फिर सरकार बदल गयी, मगर नेतृत्व नहीं बदला. 2005 से लगातार बिहार का नेतृत्व सुशासन बाबू नीतीश कुमार के हाथ में ही है. बीच में कुछ महीने के लिए जीतन राम मांझी जरूर बिहार के मुख्यमंत्री बने थे. यानी पिछले 15 वर्ष से ज्यादा समय से बिहार का शासन नीतीश कुमार के पास है. बिहार के मुख्यमंत्री रहते नीतीश कुमार ने अति पिछड़ा वर्ग बनाया. बिहार में सांसद-विधायक के संख्या बल में पिछड़ने के बाद भी हमेशा भाजपा के बराबर या ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ते रहे हैं. पिछले 2020 के विधानसभा चुनाव में जदयू 115 सीटों पर लड़ा और 43 पर सिमट गया.  भाजपा 110 सीटों पर लड़ी और 75 सीटें जीती.

नीतीश कुमार भाजपा के साथ सरकार बनाने की पूरी कीमत वसूलते रहे हैं. राजनीतिक जानकारों के अनुसार इस बार वह उपराष्ट्रपति बनना चाहते थे, मगर भाजपा उनकी इस इच्छा को पूरा नहीं कर पायी. भाजपा की इस बेरुखी के बाद नीतीश ने  प्रतिशोध में आरजेडी के साथ जाकर सरकार बनायी है. वैसे भाजपा नेतृत्व पर दबाव बनाने का प्रयास वह काफी पहले से कर रहे हैं. इसी कड़ी में जातीय जनगणना भी शामिल है. उन्हें लगा कि भाजपा इस पर सहमत नहीं होगी, मगर भाजपा ने जातीय जनगणना पर सहमति देकर उनसे अलग होने का बहाना छीन लिया. 1995 में जब समता पार्टी बिहार में लालू यादव की पार्टी से अलग होकर चुनाव लड़ी थी, तो उसे मात्र 5 सीटें मिली थीं. भाजपा तब भी विपक्षी पार्टी बनी थी. मगर कालांतर में भाजपा जदयू की बी टीम बनकर रह गयी और भाजपा नेतृत्व को कई मौकों पर अपमानित होना पड़ा. चाहे राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक के वक्त भोज का रद्द होना हो अथवा 2014 के चुनाव का विरोध. अब देखना यह होगा कि अब बिहार में भाजपा कौन सा अगला कदम उठाती है.
नोट – ये लेखक के निजी विचार हैं. 

Sanjeevani

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