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नीतीश मंत्रिमंडल विस्तार : महागठबंधन में ‘3’-तेरह मत हो जाए !

अशोक कुमार शर्मा

महागठबंधन के तीन नेता, चर्चा में तो खूब रहे लेकिन उन्हें नीतीश मंत्रिपरिषद में जगह नहीं मिली. माना जा रहा है कि बिहार की भावी राजनीति पर इसका असर जरूर पड़ेगा. राजद के प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह के पुत्र सुधाकर सिंह को तो मंत्री बनाया गया लेकिव शिवानंद तिवारी के पुत्र राहुल तिवारी को मौका नहीं मिला. भाई वीरेन्द्र राजद के प्रभावशाली और मुखर नेता हैं. वे तेजस्वी के करीबी भी हैं. लेकिन अंतिम समय में उनका पत्ता कट गया. जदयू संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष उपेन्द्र कुशवाहा को नीतीश कुमार का अत्यंत करीबी माना जाता है. वे भाजपा के खिलाफ मजबूत मोर्चा संभाले हुए थे. उनका मंत्री पद तय माना जा रहा था. लेकिन सोमवार को ही ये बात साफ हो गयी थी कि इस बार उन्हें मंत्री नहीं बनाया जाएगा.

 

 भाई वीरेन्द्र क्यों नहीं बने मंत्री ?

भाई वीरेन्द्र पटना से सटे मनेर के राजद विधायक हैं. पिछले कुछ वर्षों में उनका कद तेजी बढ़ा है. तेज-तर्रार वक्ता हैं. मजबूती से अपनी बात रखते हैं. लालू प्रसाद और तेजस्वी के करीबी हैं. लेकिन इसके बावजूद उनका नाम मंत्री की सूची से कट गया. राजद की राजनीति में यह बड़ा उलटफेर हैं. 2019 में चर्चा थी कि तेजस्वी, भाई वीरेन्द्र को पाटलिपुत्र लोकसभा सीट से टिकट देना चाहते थे. लेकिन तेजप्रताप यादव ने अपनी बहन मीसा भारती के लिए मोर्चाबंदी कर दी थी. इस दबाव की वजह से भाई वीरेन्द्र को टिकट नहीं मिला. उस समय तेजप्रताप और तेजस्वी के बीच राजनीतिक अधिकार की लड़ाई चल रही थी. भाई वीरेन्द्र, तेजस्वी के साथ खड़े थे. तेजस्वी के करीबी होने की वजह से भाई वीरेन्द्र ने कुछ साल पहले कहा था, मैं तेजप्रताप यादव नाम के किसी व्यक्ति को नहीं जानता. लालू प्रसाद के बड़े बेटे के खिलाफ इतना बड़ा बयान देना साहस की बात थी. चूंकि भाई वीरेन्द्र को तेजस्वी की सरपरस्ती हासिल थी, इसलिए वे इतनी बड़ी बात बोल गये. फिर वे क्यों नहीं बने मंत्री? क्या भाई वीरेन्द्र, राजद की अंदरूनी राजनीति का शिकार हो गये? भाई वीरेन्द्र का खेमा फिलहाल बहुत मायूस है.

Sanjeevani

 

इस बार भी राहुल तिवारी की आस पूरी नहीं

शिवानंद तिवारी, लालू प्रसाद के परम मित्र और राजद के वरिष्ठ नेता हैं. उनके पुत्र राहुल तिवारी भोजपुर के शाहपुर से राजद विधायक हैं. शिवानंद तिवारी राजद का सवर्ण चेहरा भी हैं. अपने दमदार तर्कों से वे राजद की मूल राजनीति का पक्षपोषण करते रहे हैं. चर्चा थी कि तेजस्वी राजद का चेहरा बदलने के लिए इस बार सवर्ण नेताओं को तरजीह देंगे. उन्होंने ऐसा किया भी. लेकिन राहुल तिवारी की किस्मत नहीं खुली. सवर्ण के नाम पर राजद प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह के पुत्र सुधाकर सिंह बाजी मार ले गये. ये वही सुधाकर सिंह हैं जिन्होंने 2010 में भाजपा के टिकट पर रामगढ़ (बिहार) से राजद के खिलाफ चुनाव लड़ा था. जगदानंद सिंह ने खुद अपने बेटे सुधाकर सिंह को हराने के लिए चुनाव प्रचार किया था. लेकिन वक्त बदला तो राजनीति भी बदल गयी. पांच साल पहले भाजपा ने सुधाकर सिंह निकाल दिया था. आज वे राजद विधायक के रूप में मंत्री बन चुके हैं.

 

शिवानंद तिवारी की अनदेखी क्यों ?

जब कि राहुल तिवारी निष्ठापूर्वक राजद के साथ जुड़े रहे. वे 2015 में भी विधायक चुने गये थे. उस समय भी उनके मंत्री बनने की चर्चा चली थी. लेकिन वे न तब मंत्री और न अब. सवर्ण कोटे से राजद ने एक भूमिहार एमएलसी कार्तिक कुमार को भी मंत्री बनाया है. कार्तिक कुमार पूर्व विधायक और बाहुबली नेता अनंत सिंह के करीबी हैं. अनंत सिंह के नजदीकी नेता को तो मंत्री बनाया गया लेकिन शिवानंद तिवारी जैसे दिग्गज नेता के पुत्र राहुल तिवारी को नजरअंदाज कर दिया गया. क्या वंशवाद का नियम सिर्फ शिवानंद तिवारी पर लागू होगा ? इस भेदभाव का असर राजद की राजनीति पर पड़ सकता है.

 

कुशवाहा नीतीश के करीबी लेकिन मंत्री पद नहीं

उपेन्द्र कुशवाहा 2021 में आठ साल बाद फिर नीतीश कुमार के पास आये थे. उन्होंने अपनी डूबती राजनीति को बचाने के लिए नीतीश का सहारा लिया था. यहां तक कि अपनी पार्टी रालोसपा का जदयू में विलय तक कर दिया था. कभी खुद को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार मानते थे. लेकिन लगातार चुनावी हार ने उनके मंसूबे मिट्टी में मिला दिये. पिछले साल जब वे जदयू में आये थे तो नीतीश कुमार ने उन्हें एमएलसी बनाया था. उन्हें जदयू संसदीय बोर्ड का अध्यक्ष बना कर अहम पद दिया गया था. वे भाजपा के खिलाफ हार्ड हिटिंग बैटिंग भी कर रहे थे. उनका मंत्री बनना पक्का माना जा रहा था. लेकिन एक हद के बाद उन पर नीतीश कुमार की इनायत कम हो गयी. चूंकि उपेन्द्र कुशवाहा दो बार (2005 और 2013) जदयू छोड़ चूके थे. नीतीश कुमार के खिलाफ कई कड़वे बयान भी दिये थे. इसलिए कोयरी समुदाय के अन्य नेता उनकी तरक्की से काफी नाखुश थे. इनके विरोध के चलते ही नीतीश कुमार ने उपेन्द्र कुशवाहा को मंत्री नहीं बनाया. जिन तीन प्रमुख नेताओं को मंत्री नही बनाया गया है उनके समर्थकों में असंतोष है. असंतोष की बुनियाद पर बने घर में कितने दिन शांति रहेगी ?

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