Education & Career

नौ भाषाएं, टीचर सिर्फ दो…दावा सेंटर ऑफ एक्सीलेंस बनाने का

♦हाल रांची विश्वविद्यालय के जनजातीय विभाग का

Jharkhand Rai

Ranchi : पिछले कई सालों से मोरहाबादी स्थित जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग में सरहुल और करमा जैसे त्योहारों के अवसर पर एक ही बाजा बजता रहा है. वह है विभाग को सेंटर ऑफ एक्सीलेंस बनाने का. दरअसल, इन दोनों ही त्योहारों पर राज्यपाल, मुख्यमंत्री सहित विश्वविद्यालय के कुलपति व अन्य बड़े पदाधिकारी कार्यक्रम में शिरकत करते हैं. ऐसे कार्यक्रमों में कुलपति हर बार कहते रहे हैं कि विभाग को सेंटर ऑफ एक्सीलेंस के रूप में विकसित किया जायेगा. आज तक यह काम नहीं हो पाया है. विभाग की हालत क्या है इसे बताने के लिए इतना ही काफी है कि नौ भाषाओंवाले इस विभाग में सालों से महज दो ही स्थायी शिक्षक हैं. बाकी भाषाओं की पढ़ाई अनुबंधित शिक्षकों के जरिये करायी जा रही है. हालत यह है कि जैसे तैसे शिक्षण का काम किया जा रहा है.

इसे भी पढ़ें – झारखंड के हर जिले में खुलेगा मसाला बागान, हजारीबाग से हो रही इसकी शुरुआत

इन भाषाओं की पढ़ाई होती है विभाग में

कुडुख, मुंडारी, नागपुरी, पंचपरगनिया, कुरमाली, खोरठा, खड़िया, संताली और हो.

Samford

लैंग्वेज लैब भी नहीं है विभाग में

यह भाषा का विभाग है पर स्थापना के बाद से अभी तक लैंग्वेज लैब नहीं बन पाया. इसकी वजह से पढ़ाई बाधित हो रही है.

जर्मनी के कील स्थित क्रिश्चीयन अल्ब्रेच्टस यूनिवर्सिटी में लिंग्वेस्टिक विभाग के प्रोफेसर और अध्यक्ष डॉ जॉन पीटरसन ने कई बार विभाग का दौरा किया. उन्होंने कहा भी कि वे विभाग को लैंग्वेज लैब उपलब्ध कराना चाहते हैं. पर विभाग की ओर से इस संबंध में कोई भी पहल नहीं की गयी इसकी वजह से यहां लैब स्थापित नहीं हो पाया.

कुड़ुख में सबसे ज्यादा विद्यार्थी, संताली में सबसे कम

विभाग के शिक्षक बताते हैं कि पहले जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं की पढ़ाई के लिए एकमात्र जगह यही थी जिसमें विद्यार्थियों की अच्छी संख्या होती थी पर अब राज्य में कुछ और जिलों में भी जनजातीय और क्षेत्रीय भाषा की पढ़ाई होने लगी है. इधर विभाग की उपेक्षा और सुविधाओं की कमी की वजह से विद्यार्थियों की संख्या काफी कम होने लगी है. सत्र 2018-20 में 204 विदायर्थियों ने विभाग में एडमिशन लिया. इनमें सबसे ज्यादा 66 विद्यार्थी कुड़ुख भाषा से थे, जबकि संताली भाषा में एक भी विद्यार्थी नहीं था. इसके अलावा मुंडारी में 43, नागपुरी में 29, पंचपरगनिया में 42, कुरमाली में 13, खोरठा में 08, खड़िया में 01 और हो भाषा में मात्र 02 विद्यार्थी थे.

इसी तरह सत्र 2019-21 में कुड़ुख भाषा विभाग में 63, मुंडारी में 62, नागपुरी में 34, पंचपरगनिया में 41, कुरमाली में 18, खोरठा में 07, खड़िया में 4, संताली में 4 और हो में 7 विद्यार्थी थे.

अभी विभाग में कुल 36 शिक्षक हैं. लेकिन स्थायी शिक्षक सिर्फ दो ही हैं. कुड़ुख भाषा के लिए डॉ हरि उरांव और नागपुरी भाषा में डॉ उमेशनंद तिवारी स्थायी शिक्षक के तौर पर पढ़ा रहे हैं. डॉ हरि उरांव यहां विभागाध्यक्ष भी हैं.

इसे भी पढ़ें – पलामू : एनएच 39 और 98 पर दर्दनाक सड़क हादसे, दो सगी बहनों सहित तीन की मौत

1981 में विभाग की स्थापना हुई थी

1980 में दक्षिण छोटानागपुर प्रमंडल के आयुक्त डॉ कुमार सुरेश सिंह कुछ दिनों के लिए रांची विश्वविद्यालय के कुलपति पद के प्रभार में भी रहे थे. उनसे झारखंडी भाषाओं के अध्ययन, अध्यापन के लिए विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर विभाग की स्थापना की मांग की गयी थी. उनके प्रयासों और आदेश के बाद रांची विश्वविद्यालय में इस विभाग की स्थापना की गयी. डॉ रामदयाम मुंडा की अध्यक्षता में नवंबर 1981 से विभाग का सत्र आरंभ हुआ था.

इसे भी पढ़ें – लोहरदगा: नक्सलियों ने किया आइईडी ब्लास्ट, तीन जवान घायल

Advertisement

Related Articles

Back to top button
%d bloggers like this: