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NEWSWING SPECIAL : मिलिये सिंहभूम की ‘शिवगामी देवी’ से, जिनका वचन ही है शासन

सोमवारी चातर 30 साल से विलिकिंसन रूल के तहत संभाल रही हैं बेताजुड़ी गांव की व्यवस्था, जिम्मेदारी के प्रति इतनी संजीदा कि जीवनसाथी चुनने का वक्त ही नहीं मिला

Aman Verma

Chaibasa : अगर आपने बाहुबली फिल्म देखी होगी, तो शिवगामी देवी से जरूर परिचित होंगे, जिनका वचन ही उनका शासन था. लेकिन झारखंड के सबसे बड़े आदिवासी बहुत जिले पश्चिमी सिंहभूम में भी एक शिवगामी देवी है, जो पिछले 30 साल से  गांव पर हुकूमत कर रही हैं. जिले के मझगांव प्रखंड के ओडिशा से सटा एक राजस्व गांव है बेताजुड़ी. यहां प्रवेश करने के लिए यहां की मालकिन लगभग 57 वर्षीय सोमवारी चातर की इजाजत जरूरी है. सोमवारी चातर इस राजस्व गांव की महिला ग्रामीण मुंडा है, जो  विल्किंसन रूल (पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था) के तहत  लगभग 30 साल से राज चला रही है. सातवीं पास सोमवारी चातर धाराप्रवाह हिंदी एवं हो भाषा बोलती है, ओड़िया भाषा पर भी इनकी अच्छी पकड़ है. गांव में किसी के बीच का जमीन का विवाद हो या पैसे के लेनदेन का झगड़ा, सोमवारी का फैसला अंतिम होता है.

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प्रखंड और थाना प्रशासन पर है अच्छा प्रभाव

सोमवारी चातर बताती हैं कि प्रखंड,अंचल हो या थाना प्रशासन, मेरा कोई काम नहीं रुकता. मालगुजारी रसीद, जमीन-विवाद का खुद ही  निपटारा करती हूं. किसी भी तरह का मामला आये,दो-चार महिलाओं के साथ पैदल ही पहुंच जाती हूं और विवाद का समाधान कर वापस लौटती हूं, सोमवारी बताती हैं कि जब में मैट्रिक की परीक्षा देनेवाली थीं, तो उनकी तबीयत बहुत ज्यादा खराब हो गयी थी. इस कारण वह मैट्रिक की परीक्षा नहीं दे सकींं. इसके बावजूद वे गांव को संभालने में कोई कसर नहीं छोड़ती हैं.

कुवांरी महिला ग्रामीण मुंडा के रूप में रिकॉर्ड बना चुकी हैं

मझगांव अंचल के आवला पीढ़ अंतर्गत सन 1992 में  ग्रामीण मुंडा के रूप में सोमवारी चातर की नियुक्ति हुई थी.अब इन्हें सरकार से दो हजार रुपये मानदेय मिलता है, ग्रामीण मुंडा होने के चलते सरकार की ओर से इन्हें एक टैबलेट भी दिया गया है, लेकिन सोमवारी को इसे चलाना नहीं आता.

दीदी के बेटा-बेटी के सहारे रहती हैं सोमवारी चातर

सोमवारी के परिजन ओडिशा राज्य के किंजरी में रहते हैं. ये लोग ही सोमवारी का सहारा हैं. उनके बड़े भाई भी निसंतान हैं. सोमवारी बताती हैं कि भविष्य में इनके वंशज से ही कोई  ग्रामीण मुंडा बनेगा. इस पद से जुड़ी जिम्मेदारियों की वजह से उसे अपना जीवनसाथी चुनने का भी वक्त नहीं मिल पाया.

समाज में महिला ग्रामीण मुंडा का होना भी जरूरी है

सोमवारी ने बताया कि वे ग्राम सभा का सफलता से संचालन करती हैं.  गांव में 120 से अधिक घर हैं. गांव की वर्तमान आबादी की वास्तविक जानकारी उपलब्ध नहीं है, इसके अतिरिक्त गांव में एक टोला भी है, जो बासिका टोला के नाम से जाना जाता है. सोमवारी कहती हैं कि महिलाओं की सहभागिता से ही गांव का विकास किया जा सकता है. इसलिए गांव में भी ग्रामीण मुंडा के रूप में महिलाओं को प्राथमिकता मिलनी चाहिए.

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