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NEWSWING EXCLUSIVE : फर्जी डिग्री मामले में फंसे कोल्हान विवि के वीसी की अपनी डिग्री भी सवालों में, एक ही सत्र में दो यूनिवर्सिटी से ली डिग्रियां

जगन्नाथ संस्कृत विवि, पुरी से 1986 में आचार्य और इसी साल राष्ट्रीय संस्कृत विवि, नयी दिल्ली से पीएचडी की उपाधि ली

Sanjay Prasad

Jamshedpur : फर्जी डिग्री मामले में आरोपी कोल्हान यूनिवर्सिटी के कुलपति गंगाधर पंडा के खिलाफ यूपी एसआईटी द्वारा प्राथमिकी दर्ज करने के बाद पंडा की अपनी डिग्रियां भी सवालों के घेरे में आ गयी हैं. सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार गंगाधर पंडा ने संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी में रहते हुए कई डिग्रियां हासिल कीं. पंडा ने 1978 में संस्कृत में स्नातकोत्तर (एमए) किया. इसके 7 साल बाद जगन्नाथ संस्कृत विश्वविद्यालय, पुरी से 1985 में आचार्य (पुराना) और इसी विश्वविद्यालय से 1986 में आचार्य (धर्मशास्त्र) की उपाधि ली. उन्होंने जगन्नाथ संस्कृत विश्वविद्यालय, पुरी से ही 1987 में आचार्य (सांख्य योग) की उपाधि ली. जिस वक्त 1986 में पंडा ने आचार्या की उपाधि ली, उसी साल 1986 में उन्हें राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान नयी दिल्ली से पीएचडी मिली. अब सवाल है कि एक ही सत्र में गंगाधर पंडा ने दो डिग्रियां कैसे ले लीं. वह भी संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में काम करते हुए. 1991 में दरभंगा विश्वविद्यालय दरभंगा से पंडा ने डी-लिट की उपाधि ली. उनका शैक्षणिक बायोडाटा पहले इंटरनेट पर उपलब्ध था, मगर अब उसे हटा लिया गया है.

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जब पटना यूनिवर्सिटी ने पंडा को 5 साल के लिए कर दिया था ब्लैकलिस्टेट

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पटना यूनिवर्सिटी में 2011 में पीएचडी के एक इंटरव्यू में गड़बड़ी पाये जाने के बाद विवि प्रशासन ने गंगाधर पंडा को पांच साल के लिए ब्लैक लिस्टेट कर दिया था. साथ ही संस्कृत स्नातकोत्तर विभाग के तत्कालीन अध्यक्ष डॉ राम गुलाम मिश्रा को भी हटा दिया गया था. यही नहीं, इसी मामले में पटना विवि प्रशासन ने विभाग की एक शिक्षिका डॉ सुधा मिश्रा को पांच साल के लिए पीएचडी कार्य से अलग कर दिया गया था. सुधा मिश्रा ने विवि को पत्र भेजकर सूचना दी थी कि उनके अंदर शोध करने वाली छात्रा मधुमिता मिश्रा का 16 नवबंर 2011 को पीएचडी का इंटरव्यू कराना है. इसके लिए संपूर्णानंद संस्कृत विवि के गंगाधर पंडा को एक्सटर्नल के रूप में बुलाया गया था. डॉ सुधा मिश्रा पर आरोप लगा कि उन्होंने विवि की अनुमति लिये बगैर एक दिन पहले 15 नवबंर 2011 को ही इंटररव्यू करा दिया. इसके बाद विवि को रिपोर्ट भेजी. जब इस मामले में गड़बड़ी सामने आयी, तो तत्कालीन प्रतिकुलपति डॉ जेपी सिंह ने जांच की. उन्होंने पाया कि इंटररव्यू में बड़े स्तर पर अनियनितता बरती गयी है. उन्होंने छात्रा का इंटररव्यू रद्द करते हुए गंगाधर पंडा को पांच साल के लिए पीएचडी का इंटरव्यू लेने से ब्लैकलिस्ट कर दिया.

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