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NEWSWING EXCLUSIVE: झारखंड की बेदाग सरकार में हुआ 18 करोड़ का कंबल घोटाला, न सखी मंडल ने कंबल बनाये, न ही महिलाओं को रोजगार मिला

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Akshay Kumar Jha
Ranchi:
झारखंड सरकार करोड़ों रुपये इस बात का प्रचार करने पर खर्च कर रही है कि झारखंड में पहली बार “बेदाग सरकार” है. मुख्यमंत्री यह कहते रहें है कि उनकी सरकार पर कोई दाग नहीं है. लेकिन यह सच नहीं है. सरकार में कई दाग लगे. ताजा दाग कंबल घोटाला का है. इसमें गरीबों को ठगा गया, सखी मंडल को अंधेरे में रखा गया और फर्जी तरीके से बताया गया कि महिलाओं को रोजगार दिया गया.

मौका सरकार के एक हजार दिन पूरा करने का हो, सरकार के तीन साल पूरा होने का हो या  माननीय राष्ट्रपति के साथ मंच साझा करने का हो. ठंड से पहले हर मौके पर झारखंड के मुखिया रघुवर दास को बोलता देखा गया है कि “इस बार झारखंड की गरीब महिलाओं से कंबल बनवा कर राज्य में जरूरतमंदों को दिया जाएगा. इससे महिलाओं को रोजगार मिलेगा. राज्य का पैसा राज्य में ही रहेगा.” लेकिन, अफसोस ऐसा नहीं हुआ. ना ही सखी मंडल ने कंबल बनाए और ना ही सखी मंडल को राज्य में रोजगार मिला. बिना टेंडर के ही बाजार से कंबल खरीदे गए और लोगों के बीच बांटे गए. झारखंड की जनता यह समझती रही कि कंबल झारखंड का ही बना हुआ है और सीएम के इस योजना की तारीफ करते रहे. इसके उलट सरकार के बड़े अधिकारियों और बिचौलियों ने मिलकर सरकार को 18 करोड़ का चूना लगा दिया. न्यूज विंग के पास पक्की सूचना है कि राज्य में कंबल खरीदने और लोगों के बीच बांटे जाने के नाम पर 18 करोड़ का घोटाला हुआ है.

“मुख्यमंत्री रघुवर दास ने कहा था इस बार झारखंड की गरीब महिलाओं से कंबल बनवा कर राज्य में जरूरतमंदों को दिया जाएगा. इससे महिलाओं को रोजगार मिलेगा. राज्य का पैसा राज्य में ही रहेगा.”

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नौ लाख कंबल बनाने का था टार्गेट, कागज पर दिए गये सखी मंडल व बुनकर समिति को काम 
हर ठंड से पहले सरकार टेंडर के जरिए कंबल खरीदा करती थी. टेंडर में एल-1 होने वाली कंपनी ही झारखंड में कंबल की सप्लाई करती थी. हालांकि इस प्रक्रिया पर भी कई बार सवाल उठे. लेकिन, इस बार तो सरकार ने हद ही कर दी. मुख्यमंत्री ने घोषणा की कि कंबल सखी मंडल बनायेगी. और सखी मंडल की आड़ में सरकार ने टेंडर नहीं किया. टेंडर नहीं किए जाने से सरकार की यह बाध्यता खत्म हो गयी कि कंबल एक ही तय जगह या कंपनी से खरीदनी है.  पब्लिक के बीच विज्ञापन के जरिये सरकार ने यह संदेश दिया कि कंबल सखी मंडल बना रही है. करीब नौ लाख कंबल बनने और बंटने थे. सरकार की घोषणा के मुताबिक सखी मंडल इन सभी नौ लाख कंबलों को बनाने वाली थी. इस काम के लिए कागज पर 63 सखी मंडल और बुनकर समिति को काम दिया गया. लेकिन यह एक तरह से सिर्फ आईवॉश था. टेंडर नहीं किए जाने की वजह से सरकारी बिचौलियों ने मनमाने तरीके से और मनमाने दर पर कंबल खरीदे और लोगों के बीच कथित रुप से बांट दिया. सरकार ने यह पता करने की कोशिश ही नहीं की कि कंबल बने भी या नहीं. बने, तो बांटे कहां पर गए.

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धागा बेचने और फिनिशिंग करने वालों को पहुंचाया गया फायदा
इस पूरे घोटाले में सबसे ज्यादा फायदा धागा बेचने और फिनिशिंग करने वाली कंपनियों को पहुंंचाया गया.  दरअसल, कंबल बनाने के लिए सखी मंडलों और बुनकर समितियों को धागा उपलब्ध कराया जाना था. इन धागों से सखी मंडल से जुड़ी महिलाएं और बुनकर समिति के बुनकर कंबल बनाते. कंबल हस्त करघा से बनाया जाना था. रफ तरीके से कंबल तैयार होने के बाद  कंबलों को फिनिशिंग के लिए कंपनी के पास भेजा जाना था. जहां कंबलों को आखिरी फिनिशिंग दी जानी थी. लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. धागा कंपनियों से नाम मात्र के धागे खरीदे गए. लेकिन भूगतान पूरा कर दिया गया.  वहीं नाम मात्र के कंबल फिनिशिंग करने वाली कंपनी के फिनिशिंग के लिए पहुंचे, लेकिन भुगतान पूरा किया गया. इस घोटाले में सरकार के शीर्ष अफसर आश्चर्यजनक तरीके से चुप हैं. उनकी यह चुप्पी भविष्य में उनके लिए ही गले की फांस बन सकती है.

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कल पढ़े,  एक ही गाड़ी से कैसे ढोया गया कंबल…….

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