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News wing Interview: एक बड़ा संपादक आखिर क्यों पत्रकारिता को छोड़कर आना चाहता है पॉलिटिक्स में

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Ranchi: एक बहुत ही खास पत्रकार (संपादक) एसी रूम की पत्रकारिता छोड़, बिलकुल एक आम आदमी बनकर झारखंड की हक और हुकूक की लड़ाई लड़ना चाहता है. नाम है डॉ. संतोष मानव. इनके पास पत्रकारिता से जुड़ा एक शानदार करियर था. इन्होंने अपने करियर की शुरुआत 1989 से प्रभात खबर से की. 1992 से 2004 तक लोकमत समाचार नागपुर में उपसंपादक से मुख्य उपसंपादक तक का सफर तय किया. राज एक्सप्रेस, भोपाल में दिसंबर 2004 से सितंबर 2005 तक स्थानीय संपादक रहे.

फिर दैनिक भास्कर में अक्टूबर 2005 से मई 2010 तक समाचार संपादक और फिर जून 2010 से अगस्त 2013 तक स्थानीय संपादक रहे. इस दौरान संतोष मानव भोपाल, ग्वालियर, रांची और जमशेदपुर में रहे. 2013 अक्टूबर से 2015 अगस्त तक हरिभूमि में स्थानीय संपादक रहे. लेकिन अब वो पत्रकारिता की दुनिया से बाहर हैं. डॉ. संतोष मानव पूरी तरह से राजनीति में आ चुके हैं. फिलहाल आम आदमी पार्टी में प्रदेश उपाध्यक्ष हैं और कोडरमा के आस-पास की राजनीति में सक्रिय हैं.

आखिर ऐसा इन्हें राजनीति में क्या दिखा कि एक मोटी सैलेरी छोड़कर इन्होंने चुनाव लड़ने की तैयारी शुरु कर दी. इन्हीं सभी बातों पर संतोष मानव ने न्यूज विंग के ब्यूरो चीफ अक्षय कुमार झा से काफी लंबी बात की. पेश है मुख्य अंश.

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सवाल: अच्छी-भली पत्रकारिता को छोड़ अचानक राजनीति में कैसे आ गए? पत्रकारिता में शानदार कैरियर था.

जवाबः यह अचानक लिया गया फैसला नहीं है. इसके पीछे अनेक वर्ष का चिंतन है. मुझे हमेशा लगा कि पत्रकारिता में खुद को व्यक्त नहीं कर पा रहा. एक जकड़न, बंधन का अहसास रहा. दूसरी बात यह कि जहां कहीं अनाचार, अत्याचार, गड़बड़ी हो, वहां हस्तक्षेप की इच्छा हमेशा रही. बहुत कम उम्र से. कह सकते हैं, बचपन से. मीडिया में जहां रहा, यह कोशिश हमेशा रही. लेकिन, मीडिया की सीमा है. सोचा, राजनीति में ज्यादा गुंजाइश है, तो चला आया.

सवाल: लेकिन, लाखों की मासिक सेलरी वाली नौकरी छोड़ना कष्टकर रहा होगा? परिवार में विरोध भी हुआ होगा?

जवाबः एक निश्चित जिंदगी को छोड़कर अनिश्चितता की ओर जाना कौन पसंद करेगा? विरोध हुआ. इस विरोध को संभालने में समय लगा.

सवाल: इतनी शिक्षा है आपकी-एमए, एम फिल, पीएचडी. पत्रकारिता की भी डिग्री है. आप पठन-पाठन के क्षेत्र में भी जा सकते थे. फिर इधर?

जवाबः वह अवसर भी था, लेकिन मुझे प्रतिरोध की आवाज बनना था. जहां कुछ गलत हो, वहां खड़ा होना. कह सकते हैं कि मकसद बड़ा था.

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सवाल: लेकिन आम आदमी पार्टी ही क्यों?

जवाबः कांग्रेस पार्टी मुझे नहीं भाती. पता नहीं क्यों, पर यह मुझे दलालों, बिचौलियों, ठेकेदारों की पार्टी लगती है. भाजपा में जाना असंभव था. मेरा संस्कार मुझे हिंदू-मुस्लिम करने की इजाजत नहीं देता. मैं उन्हें बराबर का भारतीय मानता हूं. भाजपा उन्हें दोयम दर्जे का बनाने पर तुली है. आरजेडी जैसी पार्टियां उनका इस्तेमाल करती हैं. प्रादेशिक पार्टियां किसी न किसी परिवार की पार्टी हैं. मुझे आम आदमी पार्टी ठीक लगी. यह जाति-धर्म से परे व्यक्ति को व्यक्ति के रुप में देखती है.

सवाल :  पर आप भी बरी कहां हैं? आप मुसलमानों के सवाल उठाते हैं?

जवाबः इसे आप इस तरह देख सकते हैं कि उत्पीड़ित कौन है? दबाया किसे जा रहा है, तो मुझे खड़ा कहां होना चाहिए. और ऐसा भी नहीं है कि दूसरे सवाल नहीं उठाए. हर अनाचार के खिलाफ मेरी आवाज बुलंद रहेगी.

 

सवाल: लेकिन, इससे आप पर सवाल भी उठ रहे हैं?

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जवाबः मैंने साफ कहा है कि जो अपने धर्म में आस्था रखता है, वही दूसरे के धर्म का सम्मान कर सकता है. मैं तो लोगों से कहता हूं कि गर्व से कहो कि श्रीराम हमारे पूर्वज हैं. इससे हमारी धर्मनिरपेक्षता पर फर्क नहीं पड़ता. होना यह चाहिए कि अपने धर्म पर जोरदार आस्था रखिए, लेकिन दूसरे धर्मों का भी सम्मान कीजिए. तभी आप सच्चे हिंदुस्तानी हैं.

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सवालः क्या आप विधानसभा का चुनाव लड़ेगें?

जवाबः चुनाव लड़ना मेरी प्राथमिकता सूची में नहीं है. राजनीति में मैं प्रतिरोध की आवाज बनना चाहता हूं. जहां कहीं गलत हो, सीना अड़ा दूंगा. यह नहीं देखूंगा कि व्यक्ति या संस्था कितनी बड़ी है. सामाजिक जीवन, लड़ाकू सामाजिक जीवन मेरा टारगेट है. चुनाव-वुनाव मेरे निशाने पर नहीं हैं,  हां, हर गलत व्यक्ति मेरे टारगेट पर है. उनसे दो-दो हाथ करूंगा.

 

सवाल:  क्या हम यह मान लें कि आपका जीवन झारखंड, कोडरमा के लिए है?

जवाबः मान सकते हैं. मेरा इरादा पुन: पत्रकारिता की नौकरी में जाने का नहीं है. हां, स्वतंत्र पत्रकार बना रहूंगा.

 

सवाल: मान लीजिए कि अरविंद केजरीवाल आपसे चुनाव लड़ने के लिए कहें तो?

जवाबः मान लूंगा उनकी बात. आप कहीं भी हों, एक व्यवस्था के तहत ही काम करते हैं.

 

सवाल: कोडरमा की राजनीति पर आप क्या कहेंगे?

जवाबः यह कि वह प्रजातंत्र सही नहीं, जहां बदलाव न हो. प्रजातंत्र बदलाव मांगता है, परिवर्तन मांगता है. कोडरमा भी बदलाव मांग रहा है. स्व. रमेश यादव,  अन्नपूर्णा देवी हों या डॉ. नीरा यादव तीनों रिश्तेदार ही हैं. एक परिवार का तंत्र टूटना चाहिए. चाहे पार्टी तोड़े या जनता. दूसरी बात जेंडर जस्टिस का है. 25 साल से महिला ही क्यों? पुरुष को भी मौका मिले.

सवाल: और झारखंड की सरकार? क्या यह अच्छी सरकार है?

जवाबः यह बेकार किस्म की सरकार है. इसके मुख्यमंत्री, मंत्रियों में न सही सोच है, न क्षमता. न नीतियों में नयापन. यह इनोवेशन का जमाना है. इनोवेटिव आइडिया, तेजी से विकास. लोग चाहते हैं कि उनका जीवन आसान हो, जैसा दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की सरकार ने किया. यहां की जाति,धर्म जैसी बातों पर लोगों को गुमराह करती है.

 

सवाल: पार्टियों की भीड़ में आपने आम आदमी पार्टी को ही क्यों चुना?

जवाब : इसके नेताओं की ईमानदारी, जुझारूपन और इनोवेटिव आइडिया. आखिर राशन की होम डिलेवरी, 50 तरह के प्रमाणपत्र की घर पहुंच सेवा किसी दूसरी पार्टी के नेताओं को क्यों नहीं सूझी.  एक रुपए यूनिट बिजली, निःशुल्क पानी, सरकारी स्कूलों की बेहतरी, मुहल्ला किल्निक हमें चौंकाती है . बसों-रेल में महिलाओं को मुफ्त यात्रा सुविधा देना भी क्रांतिकारी फैसला है.

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