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माओवादी संगठनों में जातिवाद, यादव जाति का है वर्चस्व- पूर्व माओवादी कमांडर

पूर्व माओवादी नेता और तृतीय प्रस्तुति सम्मेलन कमिटी (टीपीसी) के जोनल कमांडर गोपाल जी का साक्षात्कार

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न्यूज विंग संवाददाता मनोज दत्त के साथ पूर्व माओवादी नेता और वर्तमान में तृतीय प्रस्तुति सम्मेलन कमेटी (टीपीसी) के जोनल कमांडर गोपाल जी का साक्षात्कार

सवालः- झारखण्ड में आपका संघर्ष क्षेत्र कितना बढ़ा है. माओवादी कितने कमजोर हुए है ?

गोपाल जीः– 2005 से माओवादियों और तृतीय प्रस्तुति सम्मेलन कमेटी (टीपीसी) के बिच खूनी संघर्ष होना शुरु हुआ, जो आज भी जारी है. मगर इस खूनी संघर्ष के बाद भी तृतीय प्रस्तुति सम्मेलन कमेटी ने अपना क्षेत्र विस्तार जारी रखा. आज झारखण्ड के हेरहंज, बालूमाथ ,चंदवा, लातेहार, पांकी, लेस्लीगंज, छतरपुर, हरिहरगंज प्रखंड जो माओवादियों का मध्य जोन है, सहित चतरा, हजारीबाग, रांची में भी तृतीय प्रस्तुति सम्मेलन कमेटी ने माओवादियों को किनारे करते हुए अपना वर्चस्व बनाया है. हमने जनता को माओवादियों के शोषण से मुक्त कराया है.

तृतीय प्रस्तुति सम्मेलन कमेटी के नक्सलियों ने माओवादियों से सीधा मुठभेड़ किया है. किसी भी निर्दोष जनता को माओवादियों का मुखबिर बता कर ना हमने मारा है और न ही परेशान किया है. मगर माओवादी, तृतीय प्रस्तुति सम्मेलन कमेटी के साथ सीधा संघर्ष न कर के, आम जनता को तृतीय प्रस्तुति सम्मेलन कमेटी और पुलिस का दलाल बता कर हत्या करते रहे है.

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सवालः- नक्सली संघठनो में जातिवाद आज कितना हावी है? और गंझू फैक्टर क्या है ?

गोपाल जीः– नक्सली संघठनों में जातिवाद हावी है. इसी कारण तो माओवादी संगठन टूट रहा है और माओवादियों से टूट कर नए-नए संगठन बन रहे हैं. ये नए संगठन माओवादियों से लड़ रहे हैं. झारखंड में कोई भी नक्सली संगठन हो. उनमें सबसे ज्यादा गंझू जाति के लड़के ही शामिल हैं. हमारी जाति हमेशा से पिछड़ी रही. हमारा शोषण हुआ, हमें सताया गया. हमें दबाया गया. इस कारण बड़ी संख्या में गंझू जाति के लड़के नक्सलवादी संगठनों में शामिल हुए.

लेकिन माओवादियों ने भी हमारा शोषण किया. गंझू जाति के लड़कों को कभी बड़ा पोस्ट नहीं दिया गया. हमें हमेशा पीछे-पीछे घुमाया जाता है. संख्या के लिहाज में हम नक्सली संगठनों में सबसे ज्यादा हैं, लेकिन वहां का नेतृत्व यादव जाति के पास है. यादव जाति के लोग हमारा शोषण करते हैं, बल्कि यों कहें कि वे तानाशाह की तरह व्यवहार करते हैं.

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सवालः- माओवादी शीर्ष नेता सुधाकरण जी के पीछे पुलिस हाथ धोकर पड़ी है. सुधाकरण जी के पकड़े जाने से पार्टी को कितना नुकसान होगा ?

गोपाल जीः– माओवादी शीर्ष नेता अरविंद जी के पकड़े जाने या मारे जाने के बाद से भाकपा माओवादी बिहार, झारखंड और छत्तीसगढ़ से लगभग समाप्त हो जाएगा. क्योंकि बिहार और झारखण्ड में माओवादियों का कोई भी बड़ा नेता नहीं बचा है. माओवादियों के सभी शीर्ष नेता या तो मारे गए हैं या पकड़े गए हैं.

सवालः- जन अदालत क्यों लगाते हैं? किस तरह मामलों का निपटारा करते हैं ?

गोपाल जीः– हम जन अदालत इसलिए लगाते हैं क्योंकि सरकार का कानून अंधा है. वो केवल सुनती है और कही-सुनी बात पर अपना निर्णय सुनाती है. गरीब जनता का पैसा भी खर्च होता है और गरीब ग्रामीणों को न्याय बी नहीं मिलता.
हम जन अदालत लगाते हैं ताकि गरीब जनता को न्याय के लिए दर-बदर की ठोकरें नहीं खानी पड़े, उनका पैसा खर्च ना हो. जन अदालतों में आम ग्रामीण जनता के बीच न्याय किया जाता है. वहां सैंकड़ो ग्रामीण उपस्थित रहते हैं. दोनों ओर से आरोप-प्रत्यारोप होता है. अंत में निर्णय कोई और नहीं, बल्कि ग्रामीणों के बीच से चुना हुआ सरपंच ही करता है. इस तरह गरीब जनता का पैसा भी बचता है और तुरंत न्याय भी मिल जाता है.

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सवालः- माओवादियों का आरोप है कि आपके संगठन तृतीय प्रस्तुति सम्मेलन कमेटी को पुलिस का संरक्षण प्राप्त है ?

गोपाल जीः– हमारे संगठन का पुलिस से किसी तरह का गठजोड़ नहीं है. हमारे संगठन को बदनाम करने के लिए माओवादियों ने प्रॉपोगेंडा फैलाया है. ये सच है कि हम माओवादियों का विरोध करते हैं और माओवादी हमारा. हमारे संगठन के लोगों को भी पुलिस अरेस्ट करती है, कुर्की जब्ती करती है. पुलिस हमें भी परेशान करती है. ये गठजोड़ की बात माओवादियों की साजिश का हिस्सा है.

सवालः- आप पार्टी में क्यों आए ?

गोपाल जीः– सरकार की बनाई व्यवस्था में भेद भाव है. इसे गरीब और अमीर को ध्यान में रख कर बनाया गया है. अमीरों को, उच्च जाति के लोगों को सारी सुविधायें दी जाती हैं. सरकार के बनाये न्याय व्यवस्था में भी अमीरों के पक्ष में न्याय होता है.
दूसरी ओर गरीब को पेट भर खाना नहीं मिलता, आवास की सुविधा नहीं है, इलाज की सुविधा नहीं है, पहनने को कपड़ा नहीं है. और तो और गरीब को बोलने की आजादी तक नहीं है. मैं पार्टी में आया ताकि सरकार की बनाई गई व्यवस्था से आम गरीब जनता को मुक्त करा सकूं. जन संघर्ष तेज कर गरीबों को आगे बढ़ा सकूं.

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सवालः- झारखण्ड जन मुक्ति परिषद (जेजेएमपी) नक्सली संगठन को किस रूप में देखते हैं. हाल के दिनों में झारखण्ड जन मुक्ति परिषद (जेजेएमपी) और माओवादियों के बीच चल रहे मुठभेड़ को किस रूप में देख रहे हैं ?

गोपाल जीः– जेजेएमपी और माओवादियों के बीच चल रहा मुठभेड़ वर्चस्व की जंग है और कुछ नहीं. दोनों के बीच मुठभेड़ अपना-अपना वर्चस्व स्थापित करने को लेकर है क्योंकि दोनों एक ही क्षेत्र में काम करते हैं. इसके अलावा मुठभेड़ का क्या कारण है ये मैं नहीं जानता. झारखण्ड जन मुक्ति परिषद (जेजेएमपी) फिलहाल मजबूत स्थिति में जरुर है. लेकिन उसका कोई वजूद नहीं है क्योंकि उस संगठन की कोई नीति और सिद्धांत नहीं है. जेजेएमपी से हमारा संघर्ष भी हो सकता है. जब हमारा क्षेत्र विस्तार बरवाडीह, गारु, महुआडांड़ और छत्तीसगढ़ के सीमांत क्षेत्रों में होगा, तब ये संघर्ष बढ़ेगा.

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सवालः- बिहार झारखण्ड मध्य जोन पर आपका कब्ज़ा है. फिर आप के साथी अफीम की खेती और अवैध उत्खनन को क्यों नहीं रोकते हैं. ये कार्य तो आम जनता के हित में सही तो नहीं हैं ?

गोपाल जीः– हमारे संगठन के साथियों के द्वारा हमेशा से अफीम की खेती और अवैध उत्खनन पर प्रतिबंध लगाया गया है. मगर ग्रामीण नहीं मानते हैं. क्षेत्र में गरीबी व्याप्त है, ग्रामीणों को कम लागत में अधिक रुपया मिलता है. कहीं-कहीं तो लागत भी नहीं लगाना पड़ता है. केवल ज़मीन के एवज में ही बहुत रुपया मिल जाता है. इस कारण ग्रामीण हमारी भी बातों को नहीं मानते हैं.

न्यूज विंग संवाददाता मनोज दत्त के साथ बातचीत पर आधारित

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