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नयी खेल नीति बनकर तैयार, खिलाड़ियों और खेल संघों को नसीब नहीं हो सका पॉलिसी का मसौदा

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Ranchi: खेल विभाग ने झारखंड के लिए नयी खेल नीति का मसौदा तैयार कर लिया है. राज्य सरकार की स्वीकृति के लिए इसे पिछले सप्ताह भेजा जा चुका है. कैबिनेट की स्वीकृति के बाद नई खेल नीति की घोषणा कर दी जायेगी. पर खेल संघों और खिलाड़ियों के बीच नयी खेल नीति को जानने की बेचैनी है.

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उनका आरोप है कि खेल नीति पर सरकार की सहमति लेने से पहले सभी स्टेक होल्डर्स के साथ औपचारिक तौर पर बैठक नहीं की गयी. राज्य में 39 खेल संघ हैं और इनमें से किसी भी संघ को यह पता नहीं कि नयी नीति में खेल और खिलाड़ियों के मामले में किन-किन मसलों को शामिल किया गया है.

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खेल नीति पर सरकार की सहमति की तैयारी

खेल निदेशक अनिल कुमार सिंह के अनुसार, झारखंडी हितों के अनुरूप खेल नीति बनायी गयी है. नयी नीति बनाने में खेल संघों की भी राय ली गयी थी. विभाग के द्वारा सीएम के पास इसे भेजा जा चुका होगा. कैबिनेट की स्वीकृति मिलते ही इसे पब्लिकली जारी कर दिया जाएगा. उम्मीद है कि नयी खेल नीति से झारखंडी खिलाड़ियों को लाभ मिलेगा. खेलों के विकास में भी मदद मिलेगी.

झारखंडी टीम को झारखंडी प्लेयर ही दे रहे टक्कर

झारखंड हॉकी संघ के प्रेसिडेंट और कुश्ती खिलाड़ी रहे भोलानाथ सिंह के अनुसार, उन्हें यह नहीं पता कि खेल विभाग ने खेल नीति की ड्राफ्टिंग तैयार कर ली है. इसे सरकार के पास भेजे जाने की भी कोई सूचना उन्हें नहीं है. एक बार काफी पहले उनके संघ से राय मांगी गयी थी.

उन्होंने कहा था कि झारखंड के टॉप हॉकी खिलाड़ी झारखंड छोड़कर बाहर ना जाएं, इस पर नीति बने. अभी स्थिति यह है कि झारखंड महिला हॉकी टीम की टॉप 11 खिलाड़ी सीआरपीएफ ज्वाइन कर वहां सेवा दे रही हैं.

इसी तरह से इंडियन रेलवे में 5-7 हॉकी प्लेयर्स झारखंड से ही हैं. असम, बिहार और अन्य राज्यों में जहाँ कहीं हॉकी खिलाड़ियों को मौका मिला, वहां नौकरी करते हुए हॉकी खेल रहे हैं. अब तो कई बार ऐसा हो जाता है कि हॉकी मैचों में एक टीम में झारखंडी प्लेयर होते हैं तो दूसरे में भी अधिकांश प्लेयर्स झारखंड से ही होते हैं. खेल नीति को सरकार के पास भेजे जाने से पहले खिलाड़ियों, खेल संघों के सामने रखा जाना बेहतर होता.

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स्टेक होल्डर्स की सामूहिक भागीदारी

झारखंड एथलेटिक्स संघ के सचिव मधुकांत पाठक के मुताबिक, आदर्श खेल नीति बनाये जाने में तीन स्टेक होल्डर्स की भूमिका बड़ी होती है. खेल विभाग, खिलाड़ी और खेल संघ. विभाग की ओर से औपचारिक रूप से कभी भी खेल संघों को खेल नीति निर्धारण के संबंध में नहीं कहा गया. एक बार राय मांगी गयी थी. 6 मार्च को विभागीय सचिव राहुल शर्मा और विभागीय पदाधिकारियों के साथ हुई बैठक में खेल नीति पर चर्चा हुई थी.

हालांकि इनमें दिए गए सुझावों पर क्या निर्णय लिया गया होगा, उन्हें नहीं पता. हाल के दिनों में भी एक बार ज़ूम ऐप पर विभाग के साथ हुई चर्चा में खिलाड़ियों और खेल संघों को समुचित समर्थन दिए जाने पर सुझाव दिए गए थे. फाइनल ड्रॉफ्टिंग विभाग ने अगर बना ली तो एक बार इसे खिलाड़ियों और संघों के सामने रखा जाना चाहिये था.

हर साल तक़रीबन 40 खिलाड़ी 45 गेम्स में राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में मेडल जीतते हैं. ऐसे में केवल 30-40 खिलाड़ियों के बारे में ही सोचा जाना तार्किक नहीं होगा. आंध्र प्रदेश, केरल जैसे राज्यों की खेल नीति से बहुत कुछ सीखा जा सकता है. उम्मीद है खेल विभाग ने इसे देखा होगा.

झारखंड वुशू खेल संघ के प्रमुख शिवेंद्र दुबे के अनुसार, विभाग ने राय तो एक बार मांगी थी पर मसौदा नहीं दिखाया गया है. खेल विभाग ने किन-किन सुझावों को शामिल किया और क्या बेहतर हो सकता है, इस पर राय-मशविरा औपचारिक रूप से किया जाना ठीक रहता.

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2007 में बनी थी पहली खेल नीति

राज्य में पहली बार 2007 में खेल नीति बनी थी. उस समय यूपीए गठबंधन वाली सरकार थी. तत्कालीन खेल मंत्री बंधु तिर्की ने खेल नीति बनाये जाने के लिए पहल की थी. नीति के अनुसार, सरकार के विभिन्न विभागों में राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-अलग खेलों में मेडल प्राप्त खिलाड़ियों के लिए 2 प्रतिशत आरक्षण देने की बात तय की गयी थी.

हालांकि जमीनी तौर पर ऐसा 2013-14 तक नहीं हो पाया था. 2014, में यूपीए गठबंधन की सरकार में इसमें आंशिक संशोधन किया गया था. सीएम हेमंत सोरेन के इस कार्यकाल में कुल 5 खिलाड़ियों को पुलिस विभाग में रोजगार मिला. रघुवर सरकार का कार्यकाल दिसंबर 2019 तक पूरा भी हो गया. लेकिन घोषणा के बावजूद नयी खेल नीति नहीं बन सकी थी.

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