Opinion

गुजरात प्रयोगशाला बनाम पाठशाला का नया पाठ, महात्मा गांधी ने नेहरू से तंग आकर आत्महत्या की

Faisal Anurag

“गांधी जी आपघाट करवा माते शु करियु?” (गांधीजी ने आत्महत्या कैसे की) यह सवाल गुजराती में कक्षा 9 के छात्रों से एक परीक्षा में पूछा गया है. आज सोशल मीडिया पर इसकी काफी चर्चा भी है. यह सवाल अब गुजरात के श्सफलम शाला विकास संकुलश् के स्कूल में आधिकारिक रूप से पढ़ाया जा रहा है.

लेकिन गुजरात की शिक्षा में ऐसी गलतबयानी की यह कोई पहली घटना नहीं हैं. इसके पहले भी वहां कई बार इस तरह की विवादित घटनाएं घट चुकी हैं.

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इसके अतिरिक्त गुजरात राज्य स्कूल के कक्षा चार की किताब के अनुसार रोजा का अर्थ है एक संक्रामक रोग. जिसमें उल्टी और दश्त होता है. यह प्रेमचंद की कहानी ईदगाह में आये शब्द रोजा का अर्थ बताते हुए लिखा गया है.

अनजाने में इस तरह के सवाल नहीं पूछे जा रहे हैं. गुजरात  को एक ऐसी प्रयोगशाला बना दिया गया है जहां आज के शासकों की विचारधारा के प्रच्छन्न एजेंडे का ख्याल रखकर प्रयोग किया जाता है.

आदिवासियों के हिंदूकरण की प्रक्रिया का भी पहला खुला प्रयोग गुजरात में ही किया गया था. जब शबरी के बेर के प्रतीक का इस्तेमाल किया गया था.

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गुजरात की स्कूली शिक्षा में इस तरह के तमाम प्रयोग किये जा रहे हैं, जिससे ऐसी मानसिकता तैयार हो जो आरएसएस ओर भाजपा को ही भारत का इकलौता प्रतीक बना दिया जाये. चूंकि आजादी के इतिहास से कांग्रेस और उसके नेताओं का जुड़ाव जगजाहिर है, इसलिए उनको खलनायक बनाने की चौतरफा कोशिश की जा रही है.

गुजरात की शिक्षा पर नजर रखने वाले एक जानकार के अनुसार महात्मा गांधी की हत्या को आत्महत्या साबित करने की प्रवृति को सुनियोजित तरीके से आजमाया जा रहा है. उनके अनुसार स्कुलों में बच्चों को बताया जाता है कि महात्मा गांधी ने जवाहर लाल नेहरू से तंग आ कर आत्महत्या की थी.

बच्चों को बताया जाता है कि गांधी जी आरएसएस के बहुत करीब थे और उसे बहुत मानते थे. उन्होंने आरएसएस में शामिल होने का निर्णय ले लिया था. लेकिन नेहरू ने उन्हें यह कदम उठाने से रोक दिया. इसी से तंग आ कर उन्होंने आत्महत्या की थी.

इसी तरह नाथूराम गोडसे का भी महिमामंडन स्कूलों में किया जाता है. गोडसे ने गांधी की हत्या की थी. इस तथ्य को बच्चों के दिमाग से नष्ट कर देने के लिए इस तरह की बातें बच्चों को बताने की प्रवृति तेजी से बढ़ रही है.

प्रज्ञा ठाकुर ने गोडसे का खुले आम महिमा मंडन किया था. और अब भी उनके विचार गांधी को ले कर बदले नहीं हैं. प्रज्ञा ठाकुर अकेली नहीं हैं. वह जिस विचारधारा की बात करती हैं, उसमें गोडसे को महान बताने का प्रचलन नया नहीं है.

इस प्रवृति के खिलाफ तो सरदार पटेल ने गृहमंत्री रहते हुए कड़ा विचार व्यक्त किया था. उन्होंने ने अपने अनके भाषणों में भी इसे व्यक्त किया था.

2014 के बाद जिस न्यू इंडिया की बात की जा रही है, उसमें इतिहास की उन तमाम घटनाओं को ले कर जिस तरह टिप्पणियां की गयी हैं और नेहरू को खलनायक बनाने का प्रयास किया गया है, उस प्रवृति को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए.

यहां तक कि प्रधानमंत्री मोदी भी अनेक मौके पर इतिहास के तथ्यों से खिलवाड़ करते रहे हैं. शहीद-ए-आजम भगत सिंह के बारे में उन्होंने जिस तरह नेहरू पर हमला किया था, वह भी इसी सिलसिले का हिस्सा रहा है.

गुहमंत्री अमित शाह भी अपने भाषणों में इतिहास को जिस तरह गलत तरीके से पेश करते हैं, वह किसी जानकारी का अभाव नहीं है. बल्कि यह सब एक सुनियोजित रणनीति का हिस्सा हैं.

नोबेल पुरस्कार से सम्मनित प्रो अर्मत्य सेन ने अमरीका की प्रसिद्ध पत्रिका न्यूयार्कर को दिये गये एक इंटरव्यू में जिस तल्खी का इसतेमाल किया है, वह इन प्रवृतियों की ओर ही इशारा है. प्रो सेन के अनुसार भारत में सेक्युलर डेमोक्रेसी, जो कि संविधान की मूल आत्मा है, पर लगातर हमले किये जा रहे हैं.

भारत में भय का माहौल गहरा गया है. उन्होंने मीडिया के एकतरफा होने पर भी गहारी चिंता जतायी है. इस इंटरव्यू में भारत में जिस तरह की प्रवृतियों उभर रही हैं, उसे लेकर भी अपनी चिंता प्रकट की है. सेन का यह इंटरव्यू दुनिया भर में चर्चा के केंद्र में है.

लोकतंत्र सेकुलर अवधारणा और सत्ता की एकाधिकारवादी होती प्रवृति को ले कर उन्होंने विस्तार से अपना नजरिया पेश किया है.

भारत के रिजर्व बैंक के गवर्नर रह चुके रघुराम राजन भी अर्थशास्त्री हैं. अकादमिक दुनिया में उनकी प्रतिष्ठा है. अमरीका के ही ब्राउन विश्वविद्यालय में एक लेक्चर के दौरान उन्होने कहा है- अधिनायकवाद और बहुसंख्यकवाद भारत को अंधेरे रास्ते पर ले जा रहा है.

इसे बेहद खतरनाक बताते हुए भारत की तमाम संवैधानिक संस्थानाओ की स्वायत्तता पर हमले का भी उन्होने उल्लेख किया है. इस लेक्चर में इकोनॉमिक हालात पर चिंता तो है ही, इसके साथ ही बहुसंख्यकवादी राजनीति के खतरनाक होते जाने पर भी फोकस है.

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