Opinion

शिक्षा के क्षेत्र में निजीकरण के बड़े दरवाजे खोलने वाली है नई शिक्षा नीति

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Faisal Anurag

नयी शिक्षा नीति को स्वीकृति प्रदान कर भारत सरकार ने शिक्षा के निजीकरण के दरवाजे को पूरी तरह से खोल दिया है. इसके साथ ही शिक्षा नीति अनेक मूलभूत बदलाव के साथ राष्ट्रीय स्वयं सेवक के सपनों को एक हद तक अमल में लाने का प्रयास भी है. सभी क्षेत्रों में सुधार को “आपदा के अवसर” की तरह सरकार तेजी से अमल में ला रही है. शिक्षा नीति का मसौदा जब सार्वजनिक बहस के लिए प्रस्तुत किया गया था, उस समय इसे भारी आलोचना का शिकार होना पड़ा था. इसके पहले वाजपेयी सरकार के समय भी शिक्षा नीति में बदलाव लाने का प्रयास किया गया था. लेकिन तब एनडीए के कुछ घटक दलों और देश भर में उभरे भारी विरोध के कारण यह मुमकिन नहीं हो पाया था.

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आर्थिक क्षेत्र में सुधार की प्रक्रिया तेज करने के बाद अब शिक्षा क्षेत्र में बदलाव की शुरुआत भी कर दी गयी है. अगली बारी स्वास्थ्य क्षेत्र की है. दुनिया भर के अनेक कारपोरेट की नजर इन क्षेत्रों में निवेश की है. ताकि वे भारतीय छात्रों से अधिक से अधिक मुनाफा अर्जित कर सकें. नयी शिक्षा नीति ने विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए दरवाजे खोले हैं. इसका असर न केवल प्री स्कूल पर होगा बल्कि सरकारी क्षेत्र के स्कूलों के लिए अस्तित्व का संकट पैदा हो सकता है.

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ऐसा शिक्षाविद् और उनके संगठनों का मानना है. दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ डूटा ने इस नीति का पुरजोर विरोध किया है. डूटा के अध्यक्ष राजीव रे ने कहा है कि इससे शिक्षण संस्थानों की स्वतंत्रता और अकादमिक गतिविधियों की स्वतंत्रता प्रभावित होगी. इससे शिक्षण संस्थानों में संकट गहरायेगा.

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संगठन ने कहा है कि इसका मकसद महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों, यहां तक कि यूजीसी और दूसरी रेग्यूलेटिंग अथॉरिटीज में निहित सभी शक्तियों का आनंद लेना है. हर बोर्ड ऑफ गवर्नर को इन मामलों में निरंकुश शक्तियां हासिल हो जायेंगी. अनेक छात्र संगठनों ने भी इस नीति का विरोध किया है. और विरोध के कारणों को विस्तार से बताया है. इसके साथ ही आनंद सदगोपाल सहित अनेक शिक्षाविद भी इसे ले कर आशंका जाहिर कर रहे हैं. और वैश्विक होड़ में पहले से ही भारत की शिक्षा के लिए और पिछड़ने का संदेह जाहिर कर रहे हैं.

नयी शिक्षा नीति के अनुसार नीति के घोषित उद्देश्यों में से एक भारतीय होने में “गर्व” पैदा करना है. न केवल विचार में, बल्कि आत्मा, बुद्धि और कर्मों में, साथ ही साथ ज्ञान, कौशल, मूल्यों और प्रस्तावों को विकसित करना है. जो मानवाधिकारों, स्थायी विकास और जीवन यापन और वैश्विक कल्याण के लिए जिम्मेदार प्रतिबद्धता का समर्थन करता है.

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इसका उद्देश्य उच्च शिक्षा में सकल नामांकन अनुपात को बढ़ाना है. जिसमें 2035 तक व्यावसायिक शिक्षा को 26.3% से बढ़ाकर 50% किया जाएगा.  ‘संबद्ध कॉलेजों की प्रणाली को धीरे-धीरे 15 वर्षों में समाप्त कर दिया जाएगा. इस नीति में लोकविद्या पर जोर दिया गया है.

अनेक शिक्षक और छात्र संगठनों के साथ जिस तरह शिक्षा के जानकारों की प्राथमिक प्रतिक्रिया आ रही है, उससे लग रहा है कि नीति को ले कर तीखे विरोध हो सकते हैं. हालांकि सरकार सुधारों के नाम पर तमाम पूर्ववर्ती नीतियों में बदलाव लाने की बात निरंतर कर रही है.

सैद्धांतिक तौर पर यह नीति 1986 की शिक्षा नीति में प्राथमिकताओं के निर्धारण से अलग है. बल्कि वह भारत के अब तक के मौलिक धर्मनिरपेक्ष सोच को भी प्रभावित करती है. हालांकि आरएसएस इस नीति से और ज्यादा उम्मीद कर रही थी. लेकिन सरकार ने एक तरफ आरएसएस को संतुष्ट करने का प्रयास किया है. वहीं दूसरी तरफ संभावित वैचारिक विरोधों के अंदेशे को ध्यान में रखते हुए बीच के रास्ते की छवि भी बनाने का प्रयास किया है. इंडियन एक्सप्रेस में रीतिका चोपड़ा और श्यमलाल यादव ने लिखा है कि इस नीति के मसौदा लेखन में आरएसएस की कुछ अनुषंगी संस्थाएं और व्यक्ति शामिल रहे हैं. ड्रफ्टिंग कमेटी के चेयरमेन के कस्तूरीरंगन और शिक्षा मंत्रालय के अधिकारियों के साथ आरएसएस ने चर्चा में विस्तार से भाग लिया था.

वाजपेयी सरकार ने अपने कार्यकाल में अंबानी बिड़ला कमेटी का गठन किया था. अंबानी बिड़ला  कमेटी ने शिक्षा नीति के दरवाजे निजी और विदेशी पूंजी के लिए खोलने का सुझाव दिया था. इस शिक्षा नीति से ऐसा लगता है कि उन सुझावों को भी ध्यान में रखा गया है. हालांकि प्रत्यक्ष तौर पर सरकार तो भारत की संस्कृति के अनुरूप शिक्षा की पक्षधर है. लेकिन जिस संघ और भाजपा की भारतीय संस्कृति की परिभाषा मूल रूप से उस उन तमाम सांस्कृति संमिश्रणों के निषेध पर आधारित है जो भारत के विकास में अहम भूमिका निभाते हैं. यह एक गंभीर विमर्श है.

शिक्षा और उसकी नीति पर नियंत्रण शासकों का शगल है. ताकि वे अपने वैचारिक नजरिये से नागरिकों का निर्माण कर सकें. जिन देशों में शिक्षा के निजी और राष्ट्रवादी प्रयोगों पर जोर दिया गया है, उन देशों में विज्ञान की प्रगति प्रभावित हुई है. इस समय दुनिया के अनेक देशों में अतीत की तलाश की जो भूख दिख रही है, उससे न केवल एकाधिकारवादी शक्तियां लोकतंत्र को निगल रही हैं, बल्कि विचारों की असहमित का विवेक भी खोता जा रहा है.

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