Opinion

भारत में अर्थव्यवस्था की नई “कोंपलें” खिल रही हैं या मुरझा रही हैं

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Faisal Anurag

12 प्रतिशत स्टार्टअप बंद हो चुके हैं. 33 प्रतिशत होल्ड हैं. यानी कामकाज नहीं हो रहा है. 22 प्रतिशत मात्र 3 से 6 महीने संचालित करने की स्थिति में हैं. 10 फीसदी का कहना है कि डील्स रद्द कर दी गईं. जो कार्यरत हैं उनमें भी छंटनी और वेतन कटौती के कारण हालात गड़बड़ हैं. मोदी सरकार के महत्वाकांक्षी स्टार्टअप की इस दुर्दशा को कोई और नहीं Federation of Indian Chambers of Commerce and Industry (FICCI) और Indian Angel Network (IAN)  के सर्वे के आधार पर कहा जा रहा है. खुद फिक्की ने ये बात कही है. इस सर्वे ने इस सेक्टर के हालात को बयान किया है. जबकि नीति आयोग का कहना है कि भारत में अर्थव्यवस्था की नई कोंपलें, Green shoots, खिल रही हैं.

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और वह बाउंस बैक कर रहा है. फिक्की ने धुर्व के साथ मिल कर एक और सर्वे किया है जिसमें कंपनियों के सीओज से बात की गयी है. इस सर्वे रिपोर्ट के अनुसार 79 प्रतिशत सीओज ने कहा है कि लॉकडाउन में घोषित ग्रांटेड क्रेडिट इमरजेंसी का कोई लाभ कंपनियों को नहीं मिला है. और 72 प्रतिशत सीओज मानते हैं कि ब्याज दर कम करने से भी कंपनियों को राहत नहीं मिली है. दूसरी ओर  बिजनेस अखबारों के अनुसार 20 लाख करोड़ के पैकेज में 90 हजार करोड़ बिजली कंपनियों के लिए निर्धारित किए गए थे. लेकिन अभी तक इसे ले कर बिजली कंपनियों का उत्साह उत्साहबद्धक नहीं दिखा है. अधिकांश राज्य सरकारों ने इसके लिए बैंक गारंटी देने के मामले में हाथ खड़े कर दिए हैं. इस कर्ज को पाने के लिए बिजली कंपनियों को राज्यों से बैंक गारंटी की बात कही गयी थी.

नीति आयोग के  सीओ अभयकांत ने  तो Green shoots यानी कोंपले बात कर भरोसा वापस लाने की उम्मीद लगायी थी. लेकिन इन सर्वेज के दावे के हकीकतों को नजरअंदाज करना भी संभव नहीं है. अभयकांत ने कहा है कि कई क्षेत्रों में, जिसमें  एमएमसीजी भी है, में देख रहे हैं कि किस गति से अर्थव्यवस्था पटरी पर आयी है. दरअसल हालात तो यह हैं कि नीति आयोग और वित्त राज्यमंत्री अनुराग ठाकुर के दावों के बावजूद न तो इंडस्ट्री और न ही बाजार मजबूत होने की हालत में दिख रहे हैं. वास्तविकतओें को पहले भी नजरअंदाज किया जाता रहा है. खास कर नोटबंदी के प्रभावों को ले कर.

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जिसके बारे में ज्यादातर अर्थशास्त्री मानते रहे हैं इसका दूरगामी असर पड़ेगा. लॉकउाडन के बाद तो अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के प्रयासों के असर को फिक्की के सर्वे में देखा जा सकता है. फिक्की के सेक्रेटरी जनरल दिलीप चिनॉय ने कहा कि सर्वे बताता है कि भारतीय स्टार्टअप्स को परिचालन जारी रखने के लिए एक सक्षम ईकोसिस्टम और फंड्स के प्रवाह की जरूरत है. इस समय स्टार्टअप सेक्टर खुद को बचाए रखने के लिए संघर्ष कर रहा है. निवेश भावना भी नरम है. और आने वाले महीनों में ऐसा बने रहने की उम्मीद है. वर्किंग कैपिटल और कैश फ्लो की कमी से अगले 3-6 महीनों में स्टार्टअप्स को बड़ी छंटनी करनी पड़ सकती है.

IAN के प्रेसिडेंट Padmaja Ruparel ने कहा कि इस समय में जब पूरी दुनिया ही अनिश्चितताओं पर जी रही है वैसे परिस्थिति में हमें भारतीय स्टार्टअप के लिए फंडिंग, मेंटोरिंग और हैंड होल्डिंग सहायता प्रदान करने के लिए अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने में मदद करनी चाहिए.

दोनो ही सर्वे ताजा हैं. इससे यह संकेत मिल ही जाता है कि सरकार उन कमियों की पहचान नहीं कर पा रही है जो अर्थव्यवस्था में लॉकडाउन के पहले से थी. फिक्की ने ही जनवरी 2020 में कहा था कि भारत की इकोनॉमी पिछले 42 सालों में पहली बार खराब दौर से गुजर रही है. और उस पर नए नजरिए से देखे जाने की जरूरत है. नोटबंदी के बाद से तो इकोनॉमी की दशा और दिशा को ले कर चिंता प्रकट की जाती रही है. इस तरह के सवाल उठाने वालों को देशद्रोही के नजरिए से देखा गया है.

और जिन अर्थशास्त्रियों ने गंभीरता से सवाल उठाये उन्हें बदनाम करने या नजरअंदाज करने का प्रयास किया गया. इन हालात के कारण रिजर्व बैंक, नीति आयोग और प्रधानमंत्री के आर्थिक सलहारों के कई लोग इस्तीफा दे कर चले गए. उन इस्तीफों के कारणों को देखने के बजाय सरकार ऐसे दावे करती रही जिस पर जानकारों का भरोसा घटता गया. लॉकडाउन के बाद भी इकोनॉमी को कर किए जा रहे दावों और हकीकत बयान करने वाले सर्वेक्षणों में भारी अंतर है.

लेकिन अभयकांत सरकार के नए कोंपल के मुहावरे को स्थापित करने में लगे हैं. ताकि रोजगारहीन हुए लोग अपनी तकलीफों को निजी मान लें. आर्थिक संकट का कारण नहीं. नई कोपलों के खिलने में अभी काफी समय लगने की संभावना है. वह भी तब जब सरकार अपनी उन नीतियों पर विचार करने जिस कारण लॉकडाउन के पहले से हालात चिंजाजनक हुए हैं.

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