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दरभंगा से नेहरू उतना ही चिढ़ते थे, जितना मोदी नेहरू से

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Surendra Prasad

Ranchi : 1883 में दरभंगा के महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह चुनाव जीतकर सदन पहुंचनेवाले पहले जनप्रतिनिधि थे. उन्हें ही रॉयल कोमोनियर की उपाधि मिली थी. 1883 से 1962 तक दरभंगा कभी सदन से बाहर नहीं रहा. ऐसी राजनीतिक विरासत न नेहरू के पास थी और न ही जिन्‍ना के पास… पहली बात. अब दूसरी बात… 1950 तक रूलिंग इस्टेट चुनाव नहीं लड़ सकता था. दरभंगा रूलिंग इस्टेट नहीं था, लेकिन बहुत सारे रूलिंग इस्टेट से ज्यादा समृद्ध था. ठीक वैसे ही, जैसे नेहरू बहुत सारे जमींदार से अधिक समृद्ध थे. ऐसे में दरभंगा आम आदमी का सवाल उठानेवाला पहला जनप्रतिनिधि था. राजनीति में इसका क्या महत्व होता है, यह आप जानते होंगे.

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अब तीसरी बात. रजवाड़े मैदान में थे नहीं. जमींदारों में दरभंगा सबसे मजबूत. बचा तीसरा लेयर. उस तीसरे लेयर में नेहरू की स्थिति वही थी, जो दूसरे लेयर में दरभंगा की थी. नेहरू कई जमींदारों से धनी थे. अकूत संपत्ति के मालिक मोतीलाल के इकलौते बेटे थे. रजवाड़े और जमींदारों के बाद देश में पहला महलनुमा भवन मोतीलाल ने ही बनाया था.

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राजनीतिक रूप से जहां कामेश्‍वर सिंह अपने चाचा लक्ष्‍मीश्‍वर सिंह की राजनीतिक विरासत आगे बढ़ा रहे थे, वहीं नेहरू पिता की विरासत को आगे बढ़ा रहे थे. दरभंगा के नरम समाजवाद को नेहरू एंग्री यंग मैन की तरह कांग्रेस में वामपंथ लेकर आये. 1930 में नेहरू ने किसान आंदोलन में कूदकर जमींदारों के खिलाफ समाज में लामबंदी शुरू की, वैसे 1950 के बाद वह नेहरू कहीं दिखे नहीं. नेहरू के लिए किसान आंदोलन केवल दरभंगा की चुनौती को कम करने का हथियार रहा. दरभंगा के अलावा उनके सामने जो चुनौती थी (सबसे धनी दलित वकील अंबेडकर या सबसे धनी मुस्लिम वकील जिन्ना), उसे वह आजादी के साथ ही निपटा चुके थे. बस लक्ष्‍मीश्‍वर सिंह की विरासत नेहरू के लिए रास्‍ते का रोड़ा था. राजनीति में जो तीन मूल तत्व होते हैं, उन तीनों तत्वों में नेहरू दरभंगा से कमजोर थे. बाकी आप राजनीति शास्त्र पढ़ सकते हैं.

(लेखकर वरिष्ठ पत्रकार हैं.)

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