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राजनीति के लिये सतत क्रांति की जरूरत

‘कोई अर्जुन नजर नहीं आ रहा जो मछली की आंख पर निशाना साध सके’

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Lalit Garg

जैसे-जैसे 2019 में होने वाले आम चुनाव नजदीक आते जा रहे हैं वैसे-वैसे राजनीतिक सरगर्मियां तेज होती जा रही है. संभवतः आजादी के बाद यह पहला आम चुनाव होगा,  जिसके लिये इतनी अग्रिम चुनावी सरगर्मियां देखने को मिल रही है. ना केवल भाजपा बल्कि सभी राजनीतिक दलों में आम चुनाव का माहौल गरमा रहा है. अपने-अपने प्रान्तों में लोग वर्तमान नेतृत्व का विकल्प खोज रहे हैं जो सुशासन दे सके. सभी पार्टियां सरकार बनाने का दावा पेश कर रही हैं और अपने को ही विकल्प बता रही हैं तथा मतदाता सोच रहा है कि देश हो या राज्य-नेतृत्व का निर्णय मेरे मत से ही होगा.

साल 2019 के आम चुनाव में अमित शाह और नरेंद्र मोदी की नेतृत्व वाली ताकतवर बीजेपी का सामना करने के लिए कांग्रेस समेत विपक्ष के कई दलों ने एकसाथ आने के लिए तैयारियां शुरू कर दी है. देश के तमाम विपक्षी दल इस समय ‘फासीवाद’ से लेकर सांप्रदायिकता से लड़ने की बात कह रहे हैं. इस मुद्दे पर सभी दलों में आपसी सहमति दिखाई भी दे रही है. लेकिन क्या इस सहमति के साथ विपक्ष पूरी ताकत के साथ बीजेपी का सामना करने में सक्षम होगा?

बीजेपी के खिलाफ जिस विपक्ष को बनाने की कोशिशें हो रही हैं उसकी सबसे बड़ी कमजोरी है एक ऐसे नेता की कमी जिसे पूरा विपक्ष अपना नेता मानने के लिए तैयार हो और जिसे देश भी स्वीकार करे. एक बड़ी कमजोरी यह भी है कि विपक्ष के पास कोई कार्यक्रम नहीं है जिसे वह देश के सामने पेश कर सके. नोटबंदी से लेकर जीएसटी पर सरकार की फजीहत होने के बाद भी विपक्ष देश के सामने कोई सार्थक भूमिका पेश नहीं कर सका. सीएसडीएस की सर्वे में एक्जिट पोल के आधार पर राष्ट्रीय राजनीति में व्यापक बदलाव होने के संकेत मिलते हैं. अखिलेश यादव द्वारा बीबीसी को दिया गया इंटरव्यू यह दर्शाता कि 2019 के लोकसभा चुनाव की रणनीति अभी से तैयार हो रही है. तैयारी अच्छी बात है लेकिन किस चीज की?  जीतना बड़ी बात नहीं है, लेकिन उद्देश्यों के साथ जीतना बड़ी बात है.

दरअसल समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी जैसे गैर एनडीए राजनीतिक दल नरेन्द्र मोदी के बढ़ते हुए ग्राफ को लेकर चिंतित हैं और साल 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए चक्रव्यूह तैयार करना चाहते हैं. राष्ट्रीय स्तर पर मोदी के खिलाफ लामबंद होना आसान काम नहीं है. मायावती, अखिलेश यादव,  नीतीश कुमार,  ममता बनर्जी और कांग्रेस के बीच विरोधाभास बहुत ज्यादा है. व्यक्तित्व में असमानता, अपने आप पर शक्तिशाली होने का अहंकार,  कार्यकर्ताओं को इकठ्ठा न कर पाना और जातीय समीकरण कुछ ऐसे बिंदु हैं जहां मोदी विरोधी लाख कोशिश करने के बाबजूद भी लामबंद नहीं हो पार रहे हैं. सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि मोदी के द्वारा खींची गयी बड़ी लकीरों को छोटा करने का कोई उपाय किसी राजनीतिक दल के पास नहीं है. एक बड़ी विडम्बना यह भी है कि देश की बढ़ती समस्याओं से निजात दिलाने का कोई ठोस कार्यक्रम भी किसी राजनीतिक दल के पास नहीं है. आज देश को एक सफल एवं सक्षम नेतृत्व की अपेक्षा है,  जो राष्ट्रहित को सर्वोपरि माने. आज देश को एक अर्जुन चाहिए, जो मछली की आंख पर निशाने की भांति भ्रष्टाचार, राजनीतिक अपराध, महंगाई, बेरोजगारी, बढ़ती आबादी, प्रदूषण, महिला अपराध, व्यापार की डांवाडोल स्थितियों आदि समस्याओं पर ही अपनी आंख गड़ाए रखें.

देश, वर्तमान राजनीति विसंगतियों एवं विषमताओं से ग्रस्त है. भ्रष्टाचार, घोटाले और राजनीतिक अपराध की बढ़ती स्थितियों पर कोई भी दल बुनियादी कार्यक्रम प्रस्तुत करने में असफल है. भले ही अपनी जीत को सुनिश्चित करने के लिये राजनीतिक दल ईमानदार और पढ़े-लिखे, योग्य लोगों को उम्मीदवार बनायेंगे, लेकिन इन सबके बावजूद सुधार की अवधारणा अभी संदिग्ध ही दिखाई देती है. फिर भी हम कैसे आशा करें कि कोई गांधी या कोई जेपी के रास्ते पर चलते हुए राजनीति की विकृतियों से छुटकारा दिला देंगे. हमें सम्पूर्ण क्रांति की नहीं, सतत क्रांति की आवश्यकता है.

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सम्पूर्ण राष्ट्र के राजनीतिक परिवेश एवं विभिन्न राजनीतिक दलों की वर्तमान स्थितियों को देखते हुए बड़ा दुखद अहसास होता है कि किसी भी राजनीतिक दल में कोई अर्जुन नजर नहीं आ रहा जो मछली की आंख पर निशाना लगा सके. कोई युधिष्ठिर नहीं जो धर्म का पालन करने वाला हो. ऐसा कोई नेता नजर नहीं आ रहा जो स्वयं को संस्कारों में ढाल, मजदूरों की तरह श्रम करने का प्रण ले सके. जो लोग  किन्हीं आदर्शो एवं मूल्यों के साथ राजनीति में उतरे थे परन्तु राजनीति की चकाचौंध ने उन्हें ऐसा धृतराष्ट्र बना दिया कि मूल्यों की आंखों पर पट्टी बांध ये सब एक ऐसे सेनानायक के निर्देशों की छांव तले अतीत में अपने जीवन की भाग्यरेखा तलाशते रहे. सभी राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र का अभाव है और परिवारवाद तथा व्यक्तिवाद का छाया पड़ा है. कोई अपने बेटे को प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहती है तो कोई अपने बेटे को मुख्यमंत्री के रूप में. किसी का पूरा परिवार ही राजनीति में है, इसलिए विरासत संभालने की जंग भी जारी है.

नये-नये नेतृत्व उभर रहे हैं लेकिन सभी ने देश-सेवा के स्थान पर स्व-सेवा में ही एक सुख मान रखा है. आधुनिक युग में नैतिकता जितनी जरूरी मूल्य हो गई है उसके चरितार्थ होने की सम्भावनाओं को उतना ही कठिन कर दिया गया है. ऐसा लगता है मानो ऐसे तत्व पूरी तरह छा गए हैं. खाओ, पीओ, मौज करो. सब कुछ हमारा है. हम ही सभी चीजों के मापदण्ड हैं. हमें लूटपाट करने का पूरा अधिकार है. हम समाज में, राष्ट्र में, संतुलन व संयम नहीं रहने देंगे. यही आधुनिक सभ्यता का घोषणा पत्र है, जिस पर लगता है कि हम सभी ने हस्ताक्षर किये हैं. भला इन स्थितियों के बीच वर्ष 2019 के आम चुनावों में हमें वास्तविक जीत कैसे हासिल हो? आखिर जीत तो हमेशा सत्य की ही होती है और सत्य इन तथाकथित राजनीतिक दलों के पास नहीं है. महाभारत युद्ध में भी तो ऐसा ही परिदृश्य था. कौरवों की तरफ से सेनापति की बागडोर आचार्य द्रोण ने संभाल ली थी. एक दिन दुर्योधन आचार्य पर बड़े क्रोधित होकर बोले-”गुरुवर कहां गया आपका शौर्य और तेज? अर्जुन तो हमें लगता है समूल नाश कर देगा. आप के तीरों में जंग क्यों लग गई. बात क्या है?” आज लगभग हर राजनीतिक दल और उनके नेतृत्व के सम्मुख यही प्रश्न खड़ा है और इस प्रश्न का उत्तर उन्हीं के पास है. राजनीति की दूषित हवाओं ने हर राजनीतिक दल और उसकी चेतना को दूषित कर दिया है. सत्ता और स्वार्थ ने अपनी आकांक्षी योजनाओं को पूर्णता देने में नैतिक कायरता दिखाई है. इसकी वजह से लोगों में विश्वास इस कदर उठ गया है कि चौराहे पर खड़े आदमी को सही रास्ता दिखाने वाला भी झूठा-सा लगता है. आंखें उस चेहरे पर सच्चाई की साक्षी ढूंढती है. यही कारण है कि दुर्योधन की बात पर आचार्य द्रोण को कहना पड़ा, ”दुर्योधन मेरी बात ध्यान से सुनो. हमारा जीवन इधर ऐश्वर्य में गुजरा है. मैंने गुरुकुल के चलते स्वयं ‘गुरु’ की मर्यादा का हनन किया है. हम सब राग-रंग में व्यस्त रहे हैं. सुविधाभोगी हो गए हैं, पर अर्जुन के साथ वह बात नहीं. उसे लाक्षागृह में जलना पड़ा है, उसकी आंखों के सामने द्रौपदी को नग्न करने का दुःसाहस किया गया है, उसे दर-दर भटकना पड़ा है, उसके बेटे को सारे महारथियों ने घेर कर मार डाला है, विराट नगर में उसे नपुंसकों की तरह दिन गुजारने को मजबूर होना पड़ा. अतः उसके वाणों में तेज होगा कि तुम्हारे वाणों में, यह निर्णय तुम स्वयं कर लो. दुर्योधन वापस चला गया. लगभग यही स्थिति आज के राजनीतिक दलों के सम्मुख खड़ी है. किसी भी राजनीतिक दल के पास आदर्श चेहरा नहीं है, कोई पवित्र एजेंडा नहीं है, किसी के पास बांटने को रोशनी के टुकड़े नहीं हैं, जो नया आलोक दे सकें. हमें किसी पार्टी विशेष का विकल्प नहीं खोजना है. किसी व्यक्ति विशेष का विकल्प भी नहीं खोजना है. विकल्प तो खोजना है भ्रष्टाचार का, अकुशलता का, प्रदूषण का, भीड़तंत्र का, गरीबी के सन्नाटे का, महंगाई का, राजनीतिक अपराधों का. यह सब लम्बे समय तक त्याग, परिश्रम और संघर्ष से ही सम्भव है. इसलिये वक्त की नजाकत को देखते हुए राजनीति के सभी जिम्मेदार तत्त्व अपनी पार्टियों के लिये समय को स्वार्थों के संघर्ष में न बिताए, देश-हित में सृजन करें. गरीब देश की टूटती सांसों को जीने की उम्मीद दें. भ्रष्टाचार में आकंठ लिप्त धमनियों में ईमानदारी एवं पारदर्शिता का संचार करें. इस वक्त सब-कुछ बाद में, पहले देश-हित की रक्षा और उसकी अस्मिता है, राष्ट्रीय एकता का लक्ष्य है. ऐसा लक्ष्य जिसका भी होगा, वही वर्ष 2019 के चुनाव को निर्णायक मोड़ दे सकेगा.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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