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इधर भी एनडीए और उधर भी एनडीए की सरकार, फिर भी नहीं सलटा नदियों के पानी का मामला

  • MOU के बाजवूद बिहार और झारखंड के बीच तीन बड़े जलाशयों में फंसा रह गया पेंच
  • पानी बंटवारे की हिस्सेदारी का मामला नहीं सुलझा, अंतराज्यीय अड़चन बड़ी बाधा

Ranchi : झारखंड और बिहार में एनडीए (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) की सरकार होने के बावजूद तीन बड़े जलाशयों के पानी बंटावारे का मामला नहीं सुलझ पाया. इसमें पेंच फंसा ही रह गया. झारखंड की रघुवर सरकार ने कई बार दावा किया था कि जल्द ही पानी बंटवारे का पेंच सुलझा लिया जायेगा. लेकिन यह इंटर स्टेट मामला जस के तस ही रह गया.

इस तीनों बड़े जलाशय प्रोजेक्ट के प्रबंधन, कंस्ट्रक्शन, ऑपरेशन, पानी की हिस्सेदारी और प्रोजेक्ट के मेनटेनेंश के लिए एमओयू भी हुआ. लेकिन पेंच होने की वजह से काम पूरा नहीं हो पाया. इनमें उत्तरी कोयल जलाशय परियोजना, बथाने जलाशय परियोजना और बटेश्वरथान पंप कनाल परियोजना शामिल है.

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क्या होना था उत्तरी कोयल परियोजना में

इस परियोजना के तहत बिहार और झारखंड दोनों को बचा हुआ काम पूरा करना था. पलामू में कुटकू डैम और मोहम्मदगंज में बराज का निर्माण किया जाना था. इसके लिए झारखंड को आधारभूत संरचना का निर्माण करने के साथ मेनटेनेंश करना था.

इस परियोजना से झारखंड के 12470 हेक्टेयर और बिहार को 111800 हेक्टेयर में सिंचाई की सुविधा उपलब्ध होती. साथ ही बिहार और झारखंड में सिंचाई सुविधा के साथ नगर निगम क्षेत्र और उद्योगों को भी पानी मिलता.

बथाने जलाशय प्रोजेक्ट की स्थिति जस की जस

झारखंड और बिहार के बीच मामला उलझे होने के कारण बथाने जलाशय प्रोजेक्ट की स्थिति भी जस की तस की बनी हुई है. इस प्रोजेक्ट के निर्माण, ऑपरेशन और मेनटेनेंश का काम दोनों राज्यों को करना था. इसमें जो खर्च आता उसका वहन झारखंड और बिहार दोनों राज्य करते.

इस प्रोजेक्ट से झारखंड में 1660 और बिहार में 10466 हेक्टेयर भूमि में सिंचाई सुविधा उपलब्ध होती. इस जलाशय से बिहार और झारखंड को 64.14 मिट्रिक क्यूबिक मीटर पानी उपलब्ध होता. साथ ही इस क्षेत्र में पर्यटन को भी बढ़ावा देने की बात कही गई थी.

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बटेश्वरथान पंप कनाल प्रोजेक्ट में दोनों राज्यों को करना था निर्माण कार्य

बटेश्वरथान पंप कनाल प्रोजेक्ट में दोनों राज्यों बिहार और झारखंड को निर्माण कार्य करना था. इसके तहत गंगा नदी से नहर निकाल कर झारखंड में पानी पहुंचाना था. इस प्रोजेक्ट से बिहार में 22328 हेक्टेयर और झारखंड में 4887 हेक्टेयर भूमि पर सिंचाई की सुविधा उलब्ध होती. दोनों राज्यों के बीच 978 क्यूसेक पानी का बंटवारा होता. इस प्रोजेक्ट से सिर्फ सिंचाई की सुविधा उपलब्ध कराने की बात कही गई थी.

चार नदियों को जोड़ने की योजना भी ठंडे बस्ते में

प्रदेश में चार नदियों को जोड़ने की योजना भी ठंडे बस्ते में चली गई. चार साल कसरत के बावजूद योजना से जुड़ी फाइल एक इंच भी आगे नहीं बढ़ पाई. इस योजना के तहत दक्षिण कोयल नदी को स्वर्णरेखा बेसिन से जोड़ा जाना था.

इसके तहत दक्षिण कोयल बेसिन में 1281 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी तजना नदी और चांडिल डैम तक पहुंचाया जा सकता था. इन दोनों नदियों के बेसिन को जोड़ने में खरकई नदी का पानी भी लिया जाता.

दूसरी योजना के तहत दामोदर-बराकर- स्वर्णरेखा नदी को जोड़ा दाना था. इससे 494 मिलियम क्यूबिक मीटर पानी का उपयोग होता और 1.5 लाख हेक्टेयर भूमि पर सिंचाई की सुविधा उपलब्ध होती. तीन और चौथी योजना के तहत शंथ व दक्षिणी कोयल और शंख नदी को गुमला से जोड़ने की योजना थी.

अंतराज्यीय अड़चन बन गई है झारखंड के लिए बड़ी बाधा

अंतराज्यीय अड़चन झारखंड के लिये बड़ी वजह बन गई है. इसका कारण यह है कि झारखंड के जलाशयों में जमा पानी पड़ोसी राज्यों का देना पड़ता है. प्रदेश का अधिकांश हिस्सा पठारी है. नदियों में बराज, डैम और चैकडैम का उचित स्थान पर निर्माण नहीं होने के कारण पानी ठहर नहीं पाता है.

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