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राष्ट्रीयता का अलख जगानेवाले राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त

जयंती पर विशेष

Naveen Sharma

Ranchi : मैथिलीशरण गुप्त का जन्म 3 अगस्त 1886 चिरगाँव, झाँसी, (उत्तर प्रदेश) में हुआ था. संभ्रांत वैश्य परिवार में जन्मे मैथिलीशरण के पिता का नाम सेठ रामचरण और माता का नाम काशीबाई था. रामभक्ति तथा काव्य रचना उन्हें विरासत में मिली थी.

12 वर्ष की आयु में ब्रजभाषा में कविता लिखना शुरू किया. मुंशी अजमेरी के साहचर्य ने उनके काव्य–संस्कारों को विकसित किया. उनके व्यक्तित्व में प्राचीन संस्कारों तथा आधुनिक विचारधारा दोनों का समन्वय था. मैथिलीशरण गुप्त को साहित्य जगत में ‘दद्दा’ नाम से बुलाया जाता था.

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मैथिलीशरण स्वभाव से ही लोकसंग्रही कवि थे और अपने युग की समस्याओं के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील रहे. उनका काव्य एक ओर वैष्णव भावना से परिपूर्ण था, तो साथ ही जागरण व सुधार युग की राष्ट्रीय नैतिक चेतना से अनुप्राणित भी था.

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जयद्रथ वध और भारत भारती में क्रान्तिकारी स्वर

लाला लाजपतराय, बाल गंगाधर तिलक, विपिनचंद्र पाल, गणेश शंकर विद्यार्थी और मदनमोहन मालवीय उनके आदर्श रहे. महात्मा गांधी के भारतीय राजनीतिक जीवन में आने से पूर्व ही गुप्त का युवा मन गरम दल और तत्कालीन क्रान्तिकारी विचारधारा से प्रभावित हो चुका था. ‘अनघ’ से पूर्व की रचनाओं में, विशेषकर जयद्रथ वध और भारत भारती में कवि का क्रान्तिकारी स्वर सुनाई पड़ता है.

महावीर प्रसाद द्विवेदी के संसर्ग से गुप्त की काव्य–कला में निखार आया और उनकी रचनाएँ ‘सरस्वती’ में निरन्तर प्रकाशित होती रहीं. 1909 में उनका पहला काव्य जयद्रथ–वध आया. जयद्रथ–वध की लोकप्रियता ने उन्हें लेखन और प्रकाशन की प्रेरणा दी. 59 वर्षों में गुप्त ने गद्य, पद्य, नाटक, मौलिक तथा अनुदत सब मिलाकर, हिन्दी को लगभग 74 रचनाएँ प्रदान की हैं. इनमें दो महाकाव्य, 20 खंड काव्य, 17 गीतिकाव्य, चार नाटक और गीतिनाट्य हैं.

काव्य के क्षेत्र में अपनी लेखनी से संपूर्ण देश में राष्ट्रभक्ति की भावना भर दी थी.महात्मा गांधी ने उन्हें राष्ट्रकवि कहा था.
बुंदेलखंड में जन्म लेने के कारण वे बोलचाल में बुंदेलखंडी भाषा का ही प्रयोग करते थे.

इनकी प्रसिद्धी का मूलाधार भारत–भारती है. भारत–भारती उन दिनों राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम का घोषणापत्र बन गई थी. साकेत और जयभारत, दोनों महाकाव्य हैं.

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साकेत में लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला की व्यथा

साकेत रामकथा पर आधारित है, किन्तु इसके केन्द्र में लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला है. साकेत में कवि ने उर्मिला और लक्ष्मण के दाम्पत्य जीवन के हृदयस्पर्शी प्रसंग तथा उर्मिला की विरह दशा का अत्यन्त मार्मिक चित्रण किया है, साथ ही कैकेयी के पश्चात्ताप को दर्शाकर उसके चरित्र का मनोवैज्ञानिक एवं उज्ज्वल पक्ष प्रस्तुत किया है.

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यशोधरा में बुद्ध की पत्नी की मनःस्थितियों का मार्मिक अंकन

यशोधरा में गौतम बुद्ध की पत्नी यशोधरा केन्द्र में है. यशोधरा की मनःस्थितियों का मार्मिक अंकन इस काव्य में हुआ है. विष्णुप्रिया में चैतन्य महाप्रभु की पत्नी केन्द्र में है. वस्तुतः गुप्त ने रबीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा बांग्ला भाषा में रचित ‘काव्येर उपेक्षित नार्या’ शीर्षक लेख से प्रेरणा प्राप्त कर अपने प्रबन्ध काव्यों में उपेक्षित, किन्तु महिमामयी नारियों की व्यथा–कथा को चित्रित किया और साथ ही उसमें आधुनिक चेतना के आयाम भी जोड़े.

विविध धर्मों, सम्प्रदायों, मत–मतांतरों और विभिन्न संस्कृतियों के प्रति सहिष्णुता व समन्वय की भावना गुप्त जी के काव्य का वैशिष्ट्य है. पंचवटी काव्य में सहज वन्य–जीवन के प्रति गहरा अनुराग और प्रकृति के मनोहारी चित्र हैं, तो नहुष पौराणिक कथा के आधार के माध्यम से कर्म और आशा का संदेश है.

झंकार वैष्णव भावना से ओतप्रोत गीतिकाव्य है, तो गुरुकुल और काबा–कर्बला में कवि के उदार धर्म–दर्शन का प्रमाण मिलता है. खड़ी बोली के स्वरूप निर्धारण और विकास में गुप्त जी का अन्यतम योगदान रहा.

1952 में गुप्त राज्यसभा के सदस्य मनोनीत हुए और 1954 में उन्हें पद्मभूषण अलंकार से सम्मानित किया गया. गुप्त जी का देहावसान 12 दिसंबर, 1964 को चिरगांव में ही हुआ.

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