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नेशनल एथलीट और कोच मारिया को नहीं मिली 1 लाख की सरकारी मदद, पेंशन की लगा रहीं गुहार

Amit Jha

Ranchi : जेवलिन थ्रो की नेशनल प्लेयर औऱ शानदार एथलेटिक्स कोच रहीं मारिया गोरती खलखो फाकाकशी में दिन गुजार रही हैं. या कहें कि पिछले दो सालों से लोगों से मिल रही मदद पर जीवन जी रही हैं. जिंदगी भी दो सालों से एक लंग्स के ही भरोसे है.

अक्टूबर, 2019 में रिम्स में लंग्स संबंधी बीमारियों के इलाज के लिए डेढ़ महीने तक इलाज कराना पड़ा था. इसमें खेल विभाग ने भी मदद की थी.

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1 लाख रुपये की आर्थिक मदद किये जाने का भी कमिटमेंट था. पर सालभर से अधिक हो गये. न पैसे आये, न सरकार ने फिर पूछा. फिलहाल वो पैसे के साथ साथ वृद्धा पेंशन की आस लिये सरकार से गुहार लगा रही हैं.

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हर महीने केवल दवाओं पर 4000 रुपये का खर्च

मारिया ने खेल के जुनून में शादी नहीं की. फिलहाल वे आऱा गेट में अपनी सगी बहन के घर में आसरा लिये दिन काट रही हैं. नामकुम प्रखंड के आरा गेट में रह रही मारिया गोरती कहती हैं कि लंग्स संबंधी चुनौतियों से गुजरने के बाद अब वे केवल एक ही लंग्स पर जी रही हैं.

2019 में रिम्स में इलाज कराये जाने के बाद से उन्हें लगातार दवाओं का सहारा लेना जरूरी हो गया है. इसके लिए हर महीने 4000 रुपये की जरूरत होती है. इसके अलावे भी अन्य जरूरतें हैं जिनके लिए उन्हें समाज से मदद लेनी पड़ रही है. इलाज के बाद से अब तक 1 लाख से भी अधिक का कर्ज उनके सर पर हो चुका है.

संविदा पर नौकरी का नुकसान

एथलेटिक्स कोच के तौर पर मारिया गोरती खलखो ने महुआडांड़ एथलेटिक बालिका सेंटर, लातेहार में 1988 में योगदान दिया. 1000 रुपये महीने से कॉन्ट्रैक्ट पर नौकरी शुरू हुई. अगस्त 2018 में संविदा पर ही नौकरी करते रिटायर हो गयीं.

30 सालों में उनका मानदेय 1000 से 31,000 तक पहुंचा. इस बीच सेंट्रल स्कूल और दूसरी जगहों से नौकरी का ऑफर आया पर बेहतर भविष्य की आस में मारिया एथलेटिक्स बालिका सेंटर में ही रह गयीं. अब वे अफसोस करती हैं.

रिटायरमेंट के बाद उनके हाथ खाली ही हैं. अब स्थिति यह है कि उन्हें वृद्धा पेंशन पाने को मेहनत करनी पड़ रही है. मारिया के मुताबिक पूरे जीवन में लगभग दो दर्जन ऐसे एथलीट महुआडांड़ सेंटर से निकले जिनकी चर्चा राज्य स्तर पर हो रही है. पर इन सब प्रयासों के बाद भी उनके पास खुद के भविष्य के लिए कोई ठोस सहारा नहीं.

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1 लाख की स्वीकृति

जानकारी के अनुसार खिलाड़ी कल्याण सहायता कोष से खिलाड़ियों, कोचों को मदद किये जाने का प्रावधान है. खास कर ऐसे मामले जिनमें गंभीर बीमारी से खिलाड़ियों, कोचों को आर्थिक मदद की जरूरत है. इसके लिए पैसे की लिमिट नहीं है.

इसी आधार पर पूर्व खेल निदेशक अनिल कुमार सिंह के समय में मारिया के लिए भी मेडिकल ग्राउंड के आधार पर 1 लाख रुपये तक की मदद की स्वीकृति दी गयी थी.

फिलहाल यह राशि अब तक मारिया को नहीं मिल सकी है. इस मामले में न्यूज विंग ने खेल निदेशक जीशान कमर से फोन पर संपर्क करने का प्रयास किया पर उनसे बात नहीं हो सकी.

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