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नरेंद्र मोदी-अमित शाह की जोड़ी का जलवा फीका तो नहीं पड़ा

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Zubair Ahmed

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मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में मिली हुई हार के बाद कुछ ऐसा नक़्शा पेश किया जा रहा है जिससे ऐसा महसूस होता है कि भारतीय जनता पार्टी चारों खाने चित्त हो गई है और नरेंद्र मोदी-अमित शाह की जोड़ी का जलवा फीका पड़ चुका है. इस सोच की एक झलक चुनावी नतीजों के आने के बाद आम आदमी पार्टी के प्रमुख और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने एक ट्वीट में मिलती है, जिसमें उन्होंने कहा कि बीजेपी की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है.

लेकिन पार्टी के अंदर से ख़बर ये है कि राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में सत्ता खोने से पार्टी में खलबली नहीं मची है. पार्टी के सूत्रों के अनुसार माहौल मायूसी का ज़रूर है लेकिन सरेंडर का नहीं. पार्टी के बड़े नेता बैठक कर नतीजों पर गहराई से विचार कर रहे हैं. तो क्या 2019 के आम चुनाव में पार्टी की नीति और रणनीति में कोई परिवर्तन होगा? क्या पार्टी के दो बड़े स्तम्भ नरेंद्र मोदी और अमित शाह पार्टी को कोई नई राह दिखाएंगे?

सूत्रों के अनुसार चिंतन बैठक के बाद ही आगे के लिए ठोस फैसले लिए जाएंगे. लेकिन सूत्रों ने कहा नतीजों से कुछ “निष्कर्ष निकले हैं”, जिनमें से कुछ ये हैं-

  1. राजस्थान और मध्यप्रदेश में कई सीटों पर बीजेपी के उम्मीदवार बहुत कम वोटों से हारे हैं. इन नतीजों का विश्लेषण किया जाएगा.
  2. वोटरों ने, ख़ासतौर से युवा वोटरों ने, चरम हिंदुत्व विचारों को पसंद नहीं किया. योगी आदित्यनाथ के भाषणों को आम हिंदुओं ने पसंद नहीं किया, जिस कारण उन्हीं सीटों पर बुरी तरह हार हुई जहां योगी आदित्यनाथ ने भाषण दिए.
  3. लेकिन हिंदुओं से जुड़े आस्था के मामलों को पार्टी आगे भी सामने रखेगी.
  4. टिकट बंटवारे में कुछ ग़लतियाँ हुई हैं, जिन्हें 2019 के चुनाव में नहीं दोहराया जाएगा.
  5. पार्टी 2019 के आम चुनाव में मोदी सरकार की उपलब्धियों को जनता के सामने बेहतर तरीक़े से रखेगी और आगे फोकस इन्हीं उपलब्धियों पर होगा, हिंदुत्व पर नहीं.

इन चुनाव पर योगी का कितना असर

बीजेपी ने 2014 का चुनाव विकास, रोज़गार और भ्रष्टाचार के मुद्दों पर लड़ा था. सरकार ने कई योजनाएं लागू कीं लेकिन इनसे आम लोगों की ज़िंदगी पर कितना फ़र्क़ पड़ा?

राजनीतिक विश्लेषक प्रदीप सिंह कहते हैं, “कई केंद्रीय योजनाओं, जैसे-उज्ज्वला है, शौचालय है, प्रधानमंत्री आवास योजना है, आरोग्य है, मुद्रा है, बिजली कनेक्शन है, इन सबका असर तो पड़ रहा है, ख़ासतौर से समाज के निचले तबके पर, लेकिन उनकी आमदनी नहीं बढ़ रही है.”

चुनावी नतीजों से बीजेपी को समझ में आया है कि समाज को बांटने वाले मुद्दे लोगों को पसंद नहीं आए. इसलिए योगी आदित्यनाथ के पर काटे जा सकते हैं. उन्हें पार्टी का स्टार कैम्पेनर बनाने का कारण ये था कि गुजरात और कर्नाटक के विधानसभा चुनावों में उनके प्रचार करने से पार्टी को लाभ हुआ था.

लेकिन पार्टी को ऐसा लगता है कि हाल के पांच राज्यों के चुनाव के प्रचार भाषणों में उन्होंने ज़रूरत से ज़्यादा लोगों को बाँटनेवाले भाषण दिए. प्रदीप सिंह कहते हैं, “इन पांच राज्यों के चुनावों के नतीजों से ये समझना चाहिए कि जब भी रोज़ी-रोटी का सवाल आएगा, वो धर्म और आस्था पर हमेशा भारी पड़ेगा. तो किसानों की समस्या, नौजवानों की बेरोज़गारी की समस्या, व्यापारियों और कर के बोझ से जूझ रहे मध्यवर्ग की समस्या का हल मंदिर नहीं हो सकता है. अयोध्या में मंदिर एक अलग मुद्दा है, वो इन समस्याओं का जवाब नहीं है.”

राजनीतिक टीकाकार प्रदीप कौशल कहते हैं कि बीजेपी और नरेंद्र मोदी की नीतियों में कोई फ़र्क़ नहीं आएगा, हां रणनीति में परिवर्तन आ सकता है. “लेकिन ये निर्भर करेगा कि राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकारों का प्रदर्शन कैसा होता है”.

राम मंदिर

प्रदीप कौशल के मुताबिक़ कांग्रेस ने चुनाव में किसानों के कर्ज़ों की माफ़ी का वादा किया है. अगर इसे पूरा नहीं किया गया तो बीजेपी को एक मुद्दा मिलेगा और इसकी रणनीति इसी के हिसाब से तय हो सकती है. प्रदीप कौशल कहते हैं कि एक बात तो तय है और वो ये कि कांग्रेस पार्टी को अब बीजेपी और भी गंभीरता से लेगी. प्रदीप सिंह भी ऐसा ही मानते हैं, “ये साफ़ है कि अब ये आम चुनाव दो घोड़े की दौड़ है.” विशेषज्ञ कहते हैं कि बीजेपी को कोर्स करेक्शन करना होगा और नई रणनीति बनानी पड़ेगी.

बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी कहते हैं कि पार्टी की रणनीति में एक ही परिवर्तन संभव है और वो है अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण पर पूरी तरह से फोकस. लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि राम मंदिर के नाम पर पहले के चुनावों की तुलना में अब बहुत कम वोट मिलेंगे. वो कहते हैं कि पार्टी को अपने प्रतिद्वंदी को सामने रख कर रणनीति तय करनी होगी.

प्रदीप कौशल कहते हैं कि हाल के चुनावों के नतीजों के बाद कांग्रेस में उत्साह बढ़ेगा. वे कहते हैं, “कांग्रेस कार्यकर्ताओं में जोश भी आया है और राहुल गांधी की लीडरशिप को बल भी मिला है. बीजेपी को इस सच्चाई का सामना करना पड़ेगा”. प्रदीप सिंह इस बात को इस तरह से रखते हैं, “अब तक राहुल गांधी की छवि एक ऐसे नेता की थी जिसे कोई गंभीरता से नहीं लेता था. अब वो एक चैलेंजर के रूप में आ गए हैं. बीजेपी को उन्हें गंभीरता से लेना होगा. उन्हें अपनी रणनीति बदलनी पड़ेगी.”

साभारः बीबीसी हिंदी

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