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मिट्टी की सोंधी गंध में लिपटी नाहीद साहिबा की नागपुरी कविता

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गांव कर दशा

 

सुना हय गांव काले…?

सोचत ही…

ना झिंगुर कर झिंग-झिंग…?

ना बेंगकर टर्रर्र-टर्रर्र….?

ना फन जोरल उफनत नदी!

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ना ढापल करिया बदरी….!

ना डाँड़-टिकुर हरियर!

भेत भूइयाँ बजंर हियां.

सुखल-पखल रोपा खेत,

बनत हैंरेजाकुली हियां.

सुना है गांव काले….?

सोचत ही….

किसान इसने मोरत है,

दलाल दल भरत है…!

घांस-फूस छोलात हे,

पहारक छाती चिरात हे…!

धंसत हैं माटीक घर,

उठ्त हैं बिल्डिंग हियां…!

सिरात हैं जंगली जीव,

फरत पोस्ता-अफीम हियां.

बिसरत हैं पतइ मोरा-पोरा,

बनत हैं प्लास्टिक ठोंघा हियां.

ई कइसन होवत हवा पानी…?

कि बेसो परत बीमार हियां….?

सोचत ही….

हेरात हे हरियर सखुवक सोंध,

माटियो में होव्त हमला हियां.

मोरत हेमन मानवता,

लुटात हे जल जंगल हियां.

छुट्त हे  आपन धुवा-धंधा,

बिछत सगर कंपनीक फंदा.

भागत हैं भूखल पेट जने-तने,

करतेहे जाथैं पलायन हियां.

सुना हय गांव काले…!

सोचत ही……

सब के कर जोरी कइर,

कहे नाहिद आपन बात.

जदि जंगल है बचायक तो

खाऊ तनी किरिया कसम.

बन पतरा अगर बाची नहीं,

नी बाची आपन कोनो करम.

मोरब सब हियां हुवाँ जने तने,

टूटी नइ जखन ई आपन भरम.

बुझू! सुपट जंगल है जने-जने,

खिलथैं मधुर जीवन तने-तने..

………………..

 

संपर्क: परसा, भरनो, गुमला (झारखंड)

Mobile:  93346 07341

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SP Jamshedpur 24/01/2020-30/01/2020

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