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मेरी लड़ाई सरकार से, मैं कभी भी गलत नीतियों का समर्थन नहीं कर सकताः जयराम महतो

Ranchi: बोकारो और धनबाद में एक शख्स इतनी भीड़ जुटा पा रहा है जितना कोई जनप्रतिनिधि भी नहीं. इस युवा को सुनने के लिए सिर्फ जवान ही नहीं बल्कि बूढ़े और महिलाएं भी खाली पैर अपने गांव से पहुंचती हैं. नाम है जयराम महतो. जन्म धनबाद जिले में हुआ. गिरिडीह और धनबाद की सीमा पर स्थित पारसनाथ पहाड़ की तलहटी में बचपन गुजरा. फिलहाल विनोद बिहारी विश्वविद्यालय धनबाद से अंग्रेजी में पीएचडी कर रहे हैं.
आखिर कौन हैं जयराम और क्या है इनकी शख्सियत? यह जानने के लिए न्यूजविंग के विशेष संवाददाता अक्षय कुमार झा ने उनसे बात की.

पढ़िए Exclucive Interview.

सवालः ऐसा क्या हो गया कि बीते दो-तीन महीने से आपको राजनीतिक बयान देना पड़ रहा है. भीड़ जुटाने की जरूरत पड़ रही है ?
जवाबः मैं पीएचडी कर रहा हूं. अपने आस-पास की सारी चीजों को काफी करीब से देख रहा हूं. राजनीतिक, आर्थिक घटनाक्रम को समझ रहा हूं. हमारे रिसोर्सेस, खेत खलिहान हमसे छिन रहे हैं. हमारी जमीनों का अधिग्रहण हो रहा है. हम विस्थापित हो रहे हैं. बदले में हमें कुछ मिल नहीं रहा है. हमें सिर्फ डर मिल रहा है और तकलीफ दी जा रही है.

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सवालः विस्थापन जब होता है तो विस्थापितों को इसके बदले मुआवजा, पुनर्वास और सुविधाएं सरकार या कंपनी देती तो है?
जवाबः आपने अच्छा सवाल पूछा है. लेकिन काश यह विस्थापित नीति धरातल पर लागू होती. अगर ऐसा होता तो आज हमलोग यह आंदोलन करने पर बाध्य नहीं होते. वास्तविकता यह है कि कंपनी मुआवजा देती है एक एकड़ जमीन का और अधिग्रहण कर लेती है तीन एकड़.
इतना ही नहीं बीसीसीएल सरीखी कंपनी जबरन जमीन पर कब्जा भी कर लेती है. इसके मुआवजे के लिए वार्ता होती रहती है. वार्ता होते वक्त कोई बड़ा नेता आता है और सीधा कंपनी के साथ नेता डील कर लेता है. ग्रामीणों की हालत जस के तस बनी रहती है. जरूरत पड़ने पर ग्रामीणों पर लाठी चार्ज भी कर दिया जाता है.

सवालः विस्थापन नीति कैसे लागू नहीं है, ये बताइए ?
जवाबः विस्थापन नीति लागू है. लेकिन उसका क्रियान्वयन नहीं हो पा रहा है. बनने को तो भारत का संविधान भी बना है. लेकिन उसे कहां कोई फॉलो कर रहा है. नेताओं की संपत्ति लगातार बढ़ रही है. अधिकारियों की संपत्ति बढ़ रही है.

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सवालः क्या आपकी लड़ाई सिर्फ विस्थापितों की लड़ाई है ?
जवाबः नहीं लड़ाई सिर्फ विस्थापितों की नहीं है. झारखंड में जब देश का 40 फीसदी खनिज है, तो झारखंड को होना कहां चाहिए था. अगर इंडेक्स की बात करें तो शिक्षा के क्षेत्र में झारखंड 20वें नंबर पर है. रैंकिग पीछे से मिल रही है. रोजगार, चिकित्सा तमाम चीजों की रैकिंग में झारखंड काफी पीछे है.

स्थिति यह है कि 40 फीसदी खनिज हमारे पास और 12 लाख झारखंड के मजदूरी राज्य से बाहर रोजगार कर रहे हैं. मैं दूसरे राज्यों की बात नहीं करता. जब मेरे राज्य में संसाधन है, खनिज संपदा है तो हमारे लोग बाहर मजदूरी क्यों करेंगे ? झारखंड पर सबसे पहला अधिकार झारखंडियों का है. दूसरे और तीसरे नंबर के लिए हम दूसरों को आमंत्रित करते हैं. लेकिन यहां तो चीजें उल्टी है.

सवालः फर्स्ट में यहां कौन लोग है ?
जवाबः पहले नंबर पर यहां विकसित राज्यों के लोगों का कब्जा है. चाहे वो बंगाल, बिहार या ओडिशा हो. मैं ये नहीं कहता कि आईएएस और आईपीएस यहीं के लोग हों. लेकिन कम-से-कम यहां के दारोगा तो झारखंडी हों. फर्जी कागजात देकर बाहरी लोग यहां अतिक्रमण कर रहे हैं. मेरे पास सारे सबूत हैं, तभी मैं लड़ाई लड़ रहा हूं. मैं कोई गिल्ली और डंडा का खेल खेलने नहीं आगे आया हूं.

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सवालः आपका उद्देश्य क्या है ?
जवाबः झारखंडियों को उसकी असली पहचान नहीं मिल पायी है. सरकारें तो कह रही हैं कि 10वीं और 12वीं जो यहां से कर रहा है वो झारखंडी है. रांची में जर्मनी के लोगों के बच्चों ने यहां से मैट्रिक और इंटर किया है, तो क्या वो झारखंडी हो गए. झारखंडी कौन हैं उसकी पहचान करने को कहा जा रहा है और झारखंडी होने का आधार क्या है, हम उसकी मांग कर रहे हैं. झारखंडी जो भी हो वह खतियान के आधार पर तय हो. यही मांग कर रहे हैं.

सवालः क्या आप 1932 की बात कर रहे हैं ?
जवाबः वो डेडलाइन है. बाकी जब जैसा सेटेलमेंट हुआ है उस आधार पर बने. रघुवर दास की बनायी हुई नीति जिसमें 1985 के कट ऑफ डेट की बात हो रही है, मैं उससे असहमत हूं. जबकि झारखंड में 1970 के बाद से ही उद्योग लगने शुरू हुए. इस वजह से एक बड़ी आबादी दूसरे राज्यों से यहां पहुंची. यदि उन्हें यहां का मूल निवासी मान लें तो यहां के वाकई जो मूल निवासी हैं, वो कहां जाएंगे.

सवालः क्या आपका मानना है कि झारखंड बनने के बाद दूसरे राज्य के लोगों को अपने राज्य वापस चला जाना चाहिए था. जबकि झारखंड के साथ उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ भी अलग हुआ था और वहां ऐसा कुछ नहीं हुआ था ?
जवाबः छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड में अतिक्रमण नहीं हुआ था. वहां खनिज नहीं थे. वहां कोयला नहीं था. वहां कंपनियां नहीं थीं.

सवालः ऐसे में छत्तीसगढ़ से एमपी और उत्तराखंड से यूपी के लोगों को वापस चले जाना चाहिए?
जवाबः सीधी सी बात है. यूपी से उत्तराखंड और एमपी से छत्तीसगढ़ अलग होने के लिए किसी तरह का कोई संघर्ष नहीं किया गया. लेकिन झारखंड को अलग करने के लिए संघर्ष किया गया. इसलिए झारखंड की तुलना उनसे नहीं की जा सकती है.

सबकी अपनी एक खासियत होती है. किसी देश के लोगों की लंबाई साढे छह फीट होती है तो कहीं लोग बौने होते हैं. अलग झारखंड के लिए 88 हजार लोगों ने बलिदान दिया है. देश के दूसरे राज्यों से झारखंड अलग है. यहां के लोग अलग हैं. यहां की संस्कृति सबसे अलग है. सीएनटी एक्ट का उल्लंघन अगर कहीं हो रहा है तो वो धनबाद में हो रहा है. सीएनटी नौवीं अनुसूची में शामिल है. यानी संविधान इसको मानता है. फिर भी उल्लंघन क्यों? इसलिए मैं कहता हूं कि झारखंड से सांसद और विधायक अंग्रेजों से भी बुरे हैं. ये लोग संविधान का उल्लंघन कर रहे हैं. सीएनटी नहीं मानना है तो पहले पूरे देश को एक कीजिए. एक भाषा का प्रावधान कीजिए. लेकिन जब झारखंडी अधिकार मांगता है तो तरह-तरह के तर्क दिए जाते हैं. ऐसे में हम कहां जाएंगे.

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सवालः दूसरे नेताओं की तरह क्या आप भी क्या टाइगर हैं ?
जवाबः इंसान का पहले से कोई नाम नहीं होता है. उसको नाम देना पड़ता है. किसी का नाम सूरज है, तो क्या वो सूरज हो गया. कोई लता है, तो क्या वो लता हो गयी? हां, मेरा नाम टाइगर है. मैं 12 वर्षों से पहाड़ पर रहा. टाइगर जंगल और पहाड़ में ही रहते हैं. इसलिए मैं भी टाइगर हूं.

सवालः आप भी जगरनाथ और ढुल्लु महतो जैसे टाइगर हैं?
जवाबः देखिए जगरनाथ महतो और ढुल्लू महतो परिस्थिति के टाइगर हैं. उनका नाम टाइगर कैसे पड़ा मैं नहीं बता सकता हूं. मैं सिर्फ अपने बारे जानता हूं. मैंने लोगों को नहीं कहा कि मुझे टाइगर बुलाओ. मुझे लोगों ने टाइगर कहना खुद ही शुरू कर दिया.

सवालः टाइगर नाम सुन कर खुश होते हैं ?
जवाबः खुश कैसे होंगे. यहां ये टाइगर रह रहा है और उसके झारखंड के लोग बिलख रहे हैं. मैं शुरू से कह रहा हूं कि मेरी लड़ाई किसी दूसरे राज्य से व्यक्ति से नहीं है. किसी भाषा से नहीं है. हमारी लड़ाई सरकार से है. अगर इस सरकार को झारखंडी सरकार कहा जा रहा है तो भी इसकी गलत नीतियों का समर्थन मैं नहीं कर सकता. क्या सरकार की गलत नीतियों का समर्थन कर दें. खतियानधारी को तो सुरक्षित करना होगा.

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सवालः रघुवर दास ने जब 1985 के कट ऑफ डेट की तो आपने विरोध क्यों नहीं किया ?
जवाबः मैं आंदोलन में शामिल था. रणधीर वर्मा चौक पर धरने पर बैठा था, लेकिन सोशल मीडिया पर नहीं था. फेसबुक आईडी नहीं थी. मेरे पास एंड्रॉइड मोबाइल भी नहीं था. एक स्पाइस का डूएल सिम का मोबाइल था. इतना ही रिचार्ज करता था कि दोस्त को मिस कॉल कर सकूं. दूसरी बात कि केंद्र और राज्य दोनों जगह बीजेपी थी. ऐसे में हमारी आवाज को दबा दिया गया.

सवालः आप भीड़ कैसे जुटा पा रहे हैं ?
जवाबः भीड़ मैं नहीं जुटा रहा हूं. मैं सिर्फ लोगों को जागरूक कर रहा हूं. भगत सिंह ने कहा था कि गुलामों को गुलामी का ऐहसास कराओ. वही काम मैं कर रहा हूं.

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