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मुस्लिम समाज: मुल्क में विपक्ष के कमजोर होने का खमियाजा भुगत रहे हैं मुस्लिम 

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Dr Mahfooz Alam

प्रजातंत्र में विपक्ष की भूमिका महत्वपूर्ण होती है. और इनकी मौजूदगी ही प्रजातंत्र को मजबूत बनाती है. अगर प्रजातंत्र में विरोधी दल नहीं हों तो प्रजातंत्र तानाशाही में बदल जाता है. इधर देखने में आ रहा है कि देश में विरोधी दल कमजोर हो रहे हैं. या कमजोर किये जा रहे हैं. 2019 में सदन के पहले सत्र में विरोधी दलों की  जो भूमिका रही है, वह देश के लोगों विशेषकर मुस्लिम समाज के लिए निराशाजनक है.

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इस सत्र के दौरान   26 बिल सदन से पास किये गये. जिनमें तीन तलाक बिल, गैर कानूनी गतिविधि बिल,  सूचना का अधिकार बिल,  नेशनल मेडिकल कमीशन बिल,  जम्मू-कश्मीर संबंधी बिल और अन्य बिल हैं, जो विरोधी दलों के  सहयोग से आसानी से सदन में पास हो गये. एक भी बिल स्टैंडिंग कमिटी या सिलेक्ट कमिटी को नहीं भेजा गया.

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हालांकि यह बात साफ है कि धारा 370 से जम्मू-कश्मीर के मुसलमानों को छोड़कर देश के अन्य  मुसलमानों को कोई लेना देना नहीं है. इस संबंध में वह तटस्थ रहे हैं,  लेकिन जो राष्ट्र के हित में बेहतर  हो, उसका समर्थन करने के लिए तैयार हैं.

विरोधी दलों को मुसलमानों का वोट तो चाहिये मगर उन्हें मुसलमानों की भावनाओं, समस्याओं, दुख-दर्द  से कोई लेना-देना नहीं है. समय-समय पर यह भी मुसलमानों का भावनात्मक शोषण करते रहे हैं. धर्मनिरपेक्षता के प्रति इनके नजरिये में भी बदलाव आया है. लोकसभा के सांसद आजम खान के विरुद्ध सदन और सदन के बाहर जो चक्रव्यूह रचा गया और एक शिक्षा संस्थान को जो नुकसान पहुंचाया गया,  इस पर  इनकी पार्टी को जिस प्रकार अपने विरोध का प्रदर्शन करना चाहिये, वह देखने को नहीं मिला.

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यह बात भी समझनी होगी कि आजम खान हो या अन्य राजनैतिक दलों के मुस्लिम नेता,  मुस्लिम समाज उन्हें पहले संबंधित राजनैतिक दल का प्रतिनिधि समझता है और उसके बाद अपना आधा-अधूरा प्रतिनिधि मानता है. क्योंकि मुस्लिम नेता भी पार्टी लाइन से अलग नहीं जा पाते हैं.

आज मुस्लिम समाज इस कशमकश में है कि वह जाये तो कहां जाये. आज पूरे देश में भावनात्मक ज्वार अपने चरम पर है. एक तरफ, एक बड़ा वर्ग गरीबी, बेरोजगारी और देश की आर्थिक स्थिति से बेखबर  है. दूसरी तरफ उसे सोते-जागते गोरी-गोरी लड़कियां दिखायी दी रही हैं. वह उन्नाव रेप केस को भूलता जा रहा है. अगर इन्हे कोई आईना दिखाये या इनके विरुद्ध सही बात कहे तो वह विरोधी नहीं बल्कि गद्दार समझा जायेगा. और देश के गद्दारों के लिए कानून बनकर तैयार है.

देश के मुस्लिम समाज के सिर पर एक और तलवार लटकने जा रही है, वह है एनआरसी (नेशनल रजिस्टर्ड सिटीजन) जिसे पूरे देश में लागू करने पर विचार किया जा रहा है. इसमें यह साबित करना होगा कि हमारे बाप-दादा भी भारतीय थे. असम में हजारों लोग इस कानून से प्रभावित हुए हैं. यहां तक कि भारतीय सेना में 30 वर्षों तक ऑफिसर के रूप में अपने कर्तव्यों को अंजाम देने वाले मोहम्मद सनाउल्लाह को भी एनआरसी के अंतर्गत विदेशी करार दे दिया गया. जिन्होंने कारगिल युद्ध में भी हिस्सा लिया. अब अंदाजा लगाया जा सकता है कि देश का मुस्लिम समाज आज किस कैफियत से गुजर रहा है.

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