NEWSOpinion

मुस्लिम समाजः मुस्लिमों का खून भी शामिल है यहां की मिट्टी में

Dr Mahfooz Alam

आये दिन भारत के मुसलमानों के विरुद्ध जो लोग जहर उगलते रहते हैं, उन्हें यह बात समझनी होगी कि मुसलमान भी इसी देश के नागरिक हैं. वह किसी और ग्रह से आया हुआ प्राणी नहीं है. उसे देश से निकालने और उन्हें अधिकारों से वंचित करने की धमकी देना असंवैधानिक एवं गलत है. इस देश के निर्माण में उसका लहू भी शामिल है.

इसे भी पढ़ेंः मॉब लिंचिंग पर आजम खान ने  कहा, बंटवारे के समय पाकिस्तान चले जाते मुसलमान, तो उन्हें यह सजा नहीं मिलती

advt

यहां के संसाधनों पर उसका भी उतना ही हक है जितना कि देश के अन्य नागरिकों का. देश की आजादी और इसके विकास में मुसलमानों की कुर्बानियां कम नहीं हैं. यह अलग बात है कि आज उसे भुला दिया गया है. नई पीढ़ी को उनके बलिदान से अनभिज्ञ रखने की कोशिश की जा रही है. खुशवंत सिंह ने सही कहा है कि भारत की स्वतंत्रता का इतिहास मुसलमानों के खून से लिखा गया है. 1857 से लेकर 1947 तक देश के लिए जो कुर्बानी मुसलमानों ने दी है, वह इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में मौजूद है.

इसे भी पढ़ेंः दिल्ली की पूर्व CM शीला दीक्षित का 81 साल की उम्र में निधन

पहला स्वतंत्रता संग्राम 1857 में केवल दिल्ली में 27000 मुसलमानों की हत्या कर दी गयी थी. आजादी की लड़ाई में आम मुसलमानों के साथ साथ मुस्लिम धार्मिक गुरुओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था . यह वही लोग थे जो मदरसों से पढ़कर निकले थे. आज मदरसों को गलत नजरिये से देखा जा रहा है और उन पर संदेह किया जा रहा है. उन धर्मगुरुओं में शाह वली उल्लाह, शाह अब्दुल अजीज देहलवी, मोहम्मद अली शाह मद्रासी ,मौलाना रहमतुल्लाह किहरानी, मौलाना फजलुल हक खैराबादी प्रमुख थे.

चाहे वह 1919 का खिलाफत आंदोलन हो, 1921 का मोपला विद्रोह, 1922 का चौरा चौरी की पुलिस फायरिंग हो या 1942 का हिंदुस्तान छोड़ो आंदोलन हो, हर आंदोलन में मुसलमानों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया है. बहादुर शाह जफर, मौलाना बरकतुल्लाह भोपाली, मौलाना हसरत मोहानी, मोहम्मद अली जौहर, मौलाना शौकत अली, बदरुद्दीन तैयब जी, रहमतुल्लाह सियानी, मौलाना अबुल कलाम आजाद को भला कैसे भुलाया जा सकता है. मुसलमानों को गद्दार कहने वाले उनकी कुर्बानियों पर भी एक नज़र डाल लें. लेकिन आज देश के मुसलमानों के साथ जो व्यवहार किया जा रहा है, वह बडा भयावह है.

adv

कभी गोवंश के नाम पर, कभी पाकिस्तान के नाम पर, कभी धार्मिक नारा का सहारा लेकर, उन्हें प्रताड़ित किया जा रहा है . यहां तक कि बढ़ती जनसंख्या का दोषी भी मुसलमानों को ही माना जाता है, जबकि हकीकत कुछ और ही है. हाल के दिनों में जो घटनाएं घटी हैं, उनसे मुसलमानों में असंतोष एवं असुरक्षा की भावना बढ़ती जा रही है. जबकि प्रधानमंत्री इन्हें आशवस्त कर चुके हैं.

आज भारत का मुसलमान गरीबी, गंदगी, अशिक्षा, कुपोषण, हीन भावना और निराशा से घिरा हुआ है और आये दिन उसके साथ होने वाली ज्यादती उसे और भी कमजोर और निराशावादी बना रही है. मुस्लिम समाज देश से सवाल कर रहा है कि उसे किस जुर्म की सजा दी जा रही है. आज मुस्लिम समाज का विश्वास भी कमजोर हुआ है. हुकूमत को जल्दी ही इस जानिब कोई कारगर कदम उठाना चाहिये.

इसे भी पढ़ेंः आरिफ मोहम्मद खान ने कहा, तीन तलाक पर कानून नहीं बनाया, तो मोदी सरकार भी राजीव गांधी वाली गलती करेगी

 

advt
Advertisement

Related Articles

Back to top button