न्यूज़ विंग
कल का इंतज़ार क्यों, आज की खबर अभी पढ़ें

मुस्लिम समाज- सियासत में हाशिये पर जाता मुस्लिम समाज

1,341

Dr Mahfooz Aalam

प्रजातंत्र में संसद एक महत्वपूर्ण सदन होता है जहां देश की किस्मत के फैसले होते हैं. तरक्की के मीठे चश्मे फूटते हैं और खुशहाली की खेती के लिए जमीन तैयार की जाती है. जनता के द्वारा चुने गये प्रतिनिधि जनता की तरक्की का खाका तैयार करते हैं. अगर सदन में अवाम के सच्चे प्रतिनिधि मौजूद होते हैं, तो कई समस्याओं का समाधान आसानी से हो जाता है. जब भी चुनाव का समय आता है, मुस्लिम समाज की मांग होती है कि संसद में जनसंख्या के अनुपात में उन्हें प्रतिनिधित्व मिले. जिससे उनकी आवाज सरकार तक  पहुंचाई जा सके. जब कोई घटना घटती है, तो उनके सामने सबसे बड़ी समस्या यह होती है कि वह अपना दर्द, अपने आंसू और अपनी आह किससे कहे. वह अपने आपको असहाय महसूस करते हैं. गत वर्ष देश के विभिन्न भागों में जो घटनाएं हुई हैं, उन्होंने मुसलमानों को जैसे अकेला कर दिया है. अभी हालिया घटना गुरुग्राम की सामने आयी है. इस घटना ने मुस्लिम समाज को फिर से आहत किया है. जहां कुछ असामाजिक तत्वों ने  एक घर में घुसकर निहत्थे लोगों के साथ जो तांडव मचाया है, वह शर्मनाक और निंदनीय है.

आजादी के बाद से देश में 1952 से 2014 के बीच जो लोकसभा चुनाव हुए,  इन चुनावों में लोकसभा में मुस्लिम एमपी की संख्या जनसंख्या के अनुपात में बहुत कम रही है. सातवां लोकसभा चुनाव, जो 1980 में संपन्न हुआ था, उसमें मुस्लिम एमपी की संख्या 49 थी. यह संख्या अबतक की सबसे अधिक संख्या है.   इसके बाद हुए लोकसभा चुनावों में मुस्लिम एमपी की संख्या में कमी आती गयी. 2009 के लोकसभा के चुनाव में मुस्लिम एमपी की संख्या 30 थी, जबकि 2014 में यह संख्या घटकर मात्र 23 रह गयी. 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में मुस्लिम आबादी लगभग 14%  है. जनसंख्या के अनुपात में मुस्लिम एमपी की संख्या 70 से  ऊपर होनी चाहिए. देश की 28 लोकसभा सीटें ऐसी हैं, जहां मुस्लिम आबादी 40% से 97% तक है और 29 लोकसभा क्षेत्र ऐसे हैं जहां मुस्लिम आबादी 30%से अधिक है. यदि कुल मिलाकर देखा जाये  तो लोकसभा की कुल 543 सीटों में से लगभग 200 सीटें ऐसी हैं, जहां मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका अदा करते हैं. उदाहरण स्वरूप बिहार- झारखंड को ही देखा जा सकता है. बिहार की 10 लोकसभा सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम आबादी 20% से लेकर 67% के बीच है. झारखंड में मुस्लिम आबादी 14% से अधिक है. जिनमें तीन लोकसभा सीटें हैं- गोड्डा,  राजमहल और जमशेदपुर. जहां मुस्लिम मतदाताओं की संख्या 20% से अधिक है. इस आधार पर झारखंड के बुद्धिजीवियों और मुस्लिम नेताओं ने लोकसभा की एक या दो सीट पर राजनीतिक पार्टियों से मुस्लिम को टिकट देने की मांग की थी,लेकिन उन्हें भी निराशा हाथ लगी.

SMILE

अब सवाल यह है कि राजनीतिक पार्टियां मुस्लिमों को टिकट क्यों नहीं देती हैं. कुछ लोगों का मानना है कि राजनीतिक पार्टियां मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट इसलिए नहीं देती हैं कि कहीं उन पर मुस्लिम तुष्टीकरण का आरोप न लग जाये. और बहुसंख्यक का वोट गंवा न बैठें. जबकि कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि  इसका कारण मुस्लिम लीडरशिप को उभरने नहीं देना है. उन्हें मुस्लिम वोट तो चाहिए मगर उन्हें मुस्लिम लीडरशिप पसंद नहीं. ईमानदारी से कोई भी राजनीतिक दल आज, मुस्लिम प्रतिनिधित्व की बात नहीं करता.  वास्तविकता यह है कि सियासी रूप से मुस्लिम समाज आज भी अपरिपक्व एवं पिछड़ा  हुआ है.

इसे भी पढ़ेंः जगरनाथ महतो के केस की सुनवाई तीन अप्रैल को, नामांकन 16 अप्रैल से, अभी तक उम्मीदवार की घोषणा नहीं

हमें सपोर्ट करें, ताकि हम करते रहें स्वतंत्र और जनपक्षधर पत्रकारिता...

Get real time updates directly on you device, subscribe now.

You might also like
%d bloggers like this: