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मुस्लिम बहुल आबादी वाली सीटों को जानबूझकर एससी/एसटी कोटे में आरक्षित किया जाता है : कमाल फारुखी

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NewDelhi : देश में बड़ी मुस्लिम आबादी वाली सीटों को जानबूझकर एससी/एसटी कोटे में आरक्षित कर दिया जाता है. इस कारण लोकसभा-विधानसभाओं में मुस्लिम प्रतिनिधित्व कम हो गया है. उत्तर प्रदेश की सपा सरकार में मंत्री रहे और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के संस्थापक सदस्य कमाल फारुखी ने आरोप लगाते हुए यह बात कही. कमाल फारुखी न्यूज18 के एक कार्यक्रम में अपने विचार व्यक्त कर रहे थे. उन्होंने कहा कि मुस्लिम आबादी वाली सीटों को आरक्षित बना कर मुस्लिम प्रतिनिधित्व को और भी कम कर दिया गया है.

 

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मुसलमानों ने आज तक कभी भी अलग राजनीति करने की कोशिश नहीं की

इस क्रम में फारुखी ने कहा कि मुसलमानों ने आजादी के बाद से आज तक कभी भी अपनी अलग राजनीति करने की कोशिश नहीं की है. अभी तक मुसलमान अलग-अलग राजनीतिक दलों को अपना समर्थन देकर जिताता रहा है. कहा कि जो मुसलमान हिंदुस्तान में रुक गये थे, उन्हें यहां के सेक्युलरिज़्म पर भरोसा था. मुसलमानों को हमेशा यही लगता था कि प्रतिनिधित्वके मामले में उनके साथ भेदभाव नहीं होगा.

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देश की सियासत में मुसलमानों को लेकर बहुत हो-हल्ला मचाया जाता है

कहा गया कि देश की सियासत में मुसलमानों को लेकर बहुत हो-हल्ला मचाया जाता है. लेकिन हकीकत है कि आजादी के बाद से 2014 के लोकसभा चुनावों में सबसे कम 22 मुसलमान उम्मीदवार ही जीत कर संसद में पहुंचे. इससे पूर्व 1957 में 23 मुसलमान लोकसभा पहुंचे थे. एएमयू, अलीगढ़ के प्रोफेसर शकील समदानी के अनुसार 1980-84 में ही मुसलमान 49 और 42 की संख्या में लोकसभा पहुंचे थे.

लेकिन उसके बाद से प्रतिनिधित्व नीचे की ओर गिरता चला गया. 1999 में एक बार जरूर 34 मुस्लिम उम्मीदवार जीते थे. हालांकि अब यूपी उपचुनाव के बाद 16वीं लोकसभा में मुसलमानों की संख्या 24 हो गयी है. एक मुस्लिम महिला संसद में पहुंच गयी हैं. आंकड़ों के अनुसार देश की 13.4 फीसदी आबादी वाले समुदाय की संसद में मौजूदगी वर्तमान में 4.2 फीसदी है.

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