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MOTHERS DAY : वृद्धाश्रम में सिसक रहीं माताएं, बिना बच्चों के कैसा मदर्स डे

Jamshedpur : मां शब्द से ही पूरी प्रकृति एक गोद में समा जाती है. प्रकृति के सही अभास को समझा जाए तो विवाह के साथ ही विवाहिता का सपना होता है कि वह प्रकृति की सबसे सुंदर स्वरूप वो मां बने. जैसे ही नन्हा सा शिशु उसकी बाहों में आ जाता है तो उससे ज्यादा खुशी उसके लिए दुनिया में कुछ भी नहीं रह जाती. बच्चा बड़ा हो या छोटा, उसकी मां उसके दिल के सबसे ज्यादा करीब होती है. जीवन में सबसे खास जगह रखने वाली मां आपकी हंसी के पीछे छिपे गम को भी झट से पहचान लेती है. अब तक ऐसी कोई कलम नहीं बनी जो मां की ममता को शब्दों में बयां कर सके. मां की ममता का कोई मोल नहीं लगा सकता. वेदों में भी मां को भगवान से ऊंचा दर्जा दिया गया है. बदलते समय में मां की जीवन में भूमिका को समझते हुए मदर्स डे मनाया जाने लगा, लेकिन मदर्स डे की ये अवधारणा वृद्धाश्रम में आकर दम तोड़ देती है. वृद्धाश्रम में रह रही माताओं के लिए मदर्स डे का कोई मूल्य नहीं है क्योंकि उनके बच्चे उन्हें छोड़ चुके हैं.

ऐसे ही कुछ बातों को 8 मई मातृ दिवस के अवसर पर आप सबों के बीच वैसी माताएं जो वृद्धा आश्रम में जीवन काटने को मजबूर हैं. जमशेदपुर के बाराद्वारी स्थित आशीर्वाद भवन ऐसे ही बच्चों से दूर माताएं रह रही हैं. यहां इस संस्था की ओर से असहाय बुजुर्गों को एक नई जिंदगी देने का प्रयास कर रहा है जिसमें लगभग 11 से तेरह माताओं को यहां आश्रय दिया गया है.

जिनके बारे में जानकारी लेने पर यह पता चला कि कुछ महिलाएं जमशेदपुर की हैं तो कुछ महिलाएं रांची एवं अन्य क्षेत्रों से यहां आश्रय ली हैं. सभी ने अपनी व्यथा सुनाते हुए कहा कि भले कुछ भी हो जाए हमारे बच्चे और उनका परिवार सुख-समृद्धि के साथ अपना जीवन व्यतीत करें यही हमलोग आशीर्वाद देते हैं. लेकिन सोचने वाली बात यह की जन्म देने वाली माता को यहां आश्रय लेने के लिए क्यों मजबूर होना पड़ा. कुछ माताओं ने कहा कि अपनी बीमारी का दवा लेने के लिए घर से बाहर निकले तो अचानक तबीयत बिगड़ गई और किसी ने सहारा तो दिया, लेकिन घर पहुंचने के बजाय पुलिस की मदद से यहां तक पहुंच गए. लेकिन इतने दिन बाद भी घर परिवार के लोग हम तक नहीं पहुंच पाए.

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वहीं किसी माता ने कहा कि हमारी तो एक से 2 बेटियां हैं. बेटियो के घर में कब तक रहेंगे इस वजह से भी हम लोग खुद अपनी इच्छा से यहां आश्रम लेने आ गए ताकि बेटी का घर सुखी संपन्न रह सके. लेकिन उन्हें उनसे कोई शिकायत नहीं लेकिन कुछ ऐसे भी माताएं हैं उनका कहना है की बेटा तो सही है लेकिन बहू की वजह से हमें यहां तक आना पड़ा क्योंकि बेटा जब काम पर चला जाता है तो बहू कई तरह की बातें कर परेशानी पैदा करती थी. हमें ऐसा लगा कि मेरे रहने से परिवार टूट जाएगी इसलिए घर छोड़कर यहां आ गए. लेकिन आने के बाद एक बार भी बेटा पूछने तक नहीं आया. इसी तरह आश्रय लेने वाली माताएं अपनी व्यथा सुनाते हुए उनकी आंखों से आंसू छलक पड़े. सबों का एक ही कहना था कि हमारे बच्चे और उनका परिवार सुखी-संपन्न रहे यही हमलोगों का आशीर्वाद है भले ही हमें पूछने ना आए.

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