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मां पंख देती हैं तो पिता उड़ना सिखाते हैं

Lalit Garg

जून माह के तीसरे रविवार को दुनिया भर में फादर्स डे मनाने की रवायत कायम हो गयी है. भारत की बात करें तो पिता सदैव परिवार की धुरी रहे हैं. पिता रिश्तों के शिखर होते हैं. हर पिता अपनी संतान को हार न मानने और हमेशा आगे बढ़ने की सीख देते हुए हौसला बढ़ाते हैं. पिता से अच्छा मार्गदर्शक, हितैषी, गुरु कोई हो ही नहीं सकता. हर बच्चा अपने पिता से ही सारे गुण सीखता है जो उसे जीवनभर परिस्थितियों के अनुसार ढलने और लड़ने के काम आते हैं.

उनके पास सदैव हमें देने के लिए ज्ञान का अमूल्य भंडार होता है, जो कभी खत्म नहीं होता. उनकी कुछ प्रमुख विशेषताएं उन्हें दुनिया में सबसे खास बनाती है जैसे -धीरज, संयम, अनुशासन, त्याग, बड़ा दिल, प्रेम, स्नेह एवं गंभीरता.

फादर्स डे की शुरुआत बीसवीं सदी के प्रारंभ में पिताधर्म, पिता के अवदानों तथा पुरुषों द्वारा अपनी संतान की परवरिश का सम्मान करने के लिए एक उत्सव के रूप में हुई. यह हमारे पूर्वजों की स्मृति और उनके सम्मान में भी मनाया जाता है.

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दुनिया के अलग-अलग देशों में अलग-अलग दिन और विविध परंपराओं के कारण उत्साह एवं उमंग से यह दिवस मनाया जाता है. हिन्दू परंपरा के मुताबिक पितृ दिवस भाद्रपद महीने की सर्वपितृ अमावस्या के दिन होता है.

मानवीय रिश्तों में दुनिया में पिता और संतान का रिश्ता अनुपम है, संवेदनाभरा है. कोई पिता कहता है, कोई पापा, अब्बा, बाबा, तो कोई बाबूजी, बाऊजी, डैडी कहता है. इस रिश्ते के कितने ही नाम हैं पर भाव सब का एक है.

सबमें एक-सा प्यार, सबमें एक-सा समर्पण. ऋग्वेद की ऋचा में पिता को सभी भलाइयों और दया का प्रतीत बताया गया है. श्रीराम ने अपनी माता से पिता की महिमा बताते हुए कहा है कि पिता का स्थान देवताओं से भी श्रेष्ठ है और उनकी आज्ञा देवाज्ञा है.

पिता ही पुत्रों को प्रारम्भिक शिक्षा देता है. जब वह स्वयं किसी विषय का पारंगत विद्वान होता था तो उस विषय की विशिष्ट शिक्षा भी वही देता था. अरूणेय स्वयं बड़ा विद्वान था, अतएव उसने अपने पुत्र श्वेतकेतु को भी विद्वान बना दिया.

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पिता का स्थान इतना आदरणीय है कि इसे अति गुरू की संज्ञा दी गयी है. इसे माता और गुरु की कोटि में रखा गया है. मनुस्मृति में भी कहा गया है कि ‘पिता मूतिर्रूप्रजापतयते अर्थात् पिता अपनी संतान के लिए आदर्श होता है.

तैतिरीय उपनिषद् में समावर्तन समारोह के अवसर पर आचार्य स्नातकों को उपदेश देते हुए कहते हैं ‘मातृ देवो भव, पितृ देवो भव’ अर्थात् पिता और माता को देवता मानो.

पिता हर संतान के लिए एक प्रेरणा हैं, एक प्रकाश हैं और संवेदनाओं के पुंज हैं. पिता गंगोत्री की वह बूंद है जो गंगा सागर तक एक-एक तट, एक-एक घाट को पवित्र करने के लिए धोता रहता है.

पिता वह आग है जो घड़े को पकाता है, लेकिन जलाता नहीं जरा भी. वह ऐसी चिंगारी है जो जरूरत के वक्त बेटे को शोले में तब्दील करता है.

वह ऐसा सूरज है, जो सुबह पक्षियों के कलरव के साथ धरती पर हलचल शुरू करता है, दोपहर में तपता है और शाम को धीरे से चांद को लिए रास्ता छोड़ देता है.

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पिता वह पूनम का चांद है जो बच्चे के बचपने में रहता है, तो धीरे-धीरे घटता हुआ क्रमशः अमावस का हो जाता है. पिता समंदर के जैसा भी है, जिसकी सतह पर असंख्य लहरें खेलती हैं, तो जिसकी गहराई में खामोशी ही खामोशी है. वह चखने में भले खारा लगे, लेकिन जब बारिश बन खेतों में आता है तो मीठे से मीठा हो जाता है.

माता-पिता ही हैं जो हमें सच्चे दिल से प्यार करते हैं बाकी इस दुनिया में सब नाते रिश्तेदार झूठे होते हैं. पता नहीं क्यों हमें हमारे पिता इतना प्यार करते हैं, दुनिया के बैंक खाली हो जाते हैं मगर पिता की जेब हमेशा हमारे लिए भरी रहती है.

पता नहीं जरूरत के समय न होते हुए उनके पास अपने बच्चों के लिए कहां से पैसे आ जाते हैं. भगवान के रूप में माता-पिता हमें एक सौगात हैं जिनकी हमें सेवा करनी चाहिए और कभी उनका दिल नहीं तोड़ना चाहिए.

एक बच्चे को बड़ा और सभ्य बनाने में उसके पिता का योगदान कम करके नहीं आंका जा सकता. मां का रिश्ता सबसे गहरा एवं पवित्र माना गया है, लेकिन बच्चे को जब कोई खरोंच लग जाती है तो जितना दर्द एक मां महसूस करती है, वही दर्द एक पिता भी महसूस करते हैं.

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पिता कठोर इसलिए होते हैं ताकि बेटा उन्हें देख कर जीवन की समस्याओं से लड़ने का पाठ सीखे, सख्त एवं निडर बन कर जिंदगी की तकलीफों का सामना करने में सक्षम हो.

मां ममता का सागर है पर पिता उसका किनारा है. मां से ही बनता घर है पर पिता घर का सहारा है. मां से स्वर्ग है मां से बैकुंठ, मां से ही चारों धाम है पर इन सब का द्वार तो पिता ही है. उन्हीं पिता के सम्मान में पितृ दिवस मनाया जाता है. आधुनिक समाज में पिता-पुत्र के संबंधों की संस्कृति को जीवंत बनाने की अपेक्षा है.

बचपन में जब कोई बच्चा चलना सीखता है तो सबसे पहले अपने पिता की उंगली थामता है. नन्हा सा बच्चा पिता की उंगली थामे और उसकी बांहों में रह कर बहुत सुकून एवं शक्ति पाता है.

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एक बालक के निर्माण में पिता की सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका होती है. बाहर से सख्त और कठोर दिल के दिखने वाले पिता हमारे दोस्त और कोच दोनों होते हैं.

उनकी सलाह से हमेशा आगे बढ़ने की सीख मिलती है. जैसे एक शिल्पकार प्रतिमा बनाने के लिए जैसे पत्थर को कहीं काटता है, कहीं छांटता है, कहीं तल को चिकना करता है, कहीं तराशता है तथा कहीं आवृत को अनावृत करता है, वैसे ही पिता अपने संतान के जीवन को संवारते हैं, मेरे पूज्य पिताश्री रामस्वरूपजी गर्ग ने भी मेरे व्यक्तित्व को तराश कर उसे महनीय और सुघड़ रूप प्रदान किया.

मां ने पंख दिये तो पिताजी ने उड़ना सिखाया. उन्होंने अपनी हैसियत से अधिक खुशियां दीं. जितनी उन्होंने खुशियां दीं, हमारी इच्छाओं को पूरा किया, उतना ही वे हमारे जीवन निर्माण के लिए सर्तक रहे.

आज वे देह से विदेह होकर भी हर पल मेरे साथ प्रेरणा के रूप में, शक्ति के रूप में, संस्कार के रूप में रहते हैं. हर पिता अपने पुत्र की निषेधात्मक और दुष्प्रवृत्तियों को समाप्त करके नया जीवन प्रदान करता है.

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पिता की प्रेरणाएं पुत्र को मानसिक प्रसन्नता और परम शांति देती है. जैसे औषधि दुख, दर्द और पीड़ा का हरण करती है, वैसे ही पिता शिव शंकर की भांति पुत्र के सारे अवसाद और दुखों का हरण करते हैं.

विश्व के अधिकतर देशों की संस्कृति में माता-पिता का रिश्ता सबसे बड़ा एवं प्रगाढ़ माना गया है. भारत में तो इन्हें ईश्वर का रूप माना गया है.

लेकिन एक विडम्बना है कि हिन्दी कविताओं में मां के ऊपर जितना लिखा गया है उतना पिता के ऊपर नहीं. जबकि उनका योगदान कम नहीं है. इसीलिए पिता के चरणों में भी स्वर्ग एवं सर्व कहा गया है.

क्योंकि वे हर क्षण परिवार एवं संतान के लिए छाया की भांति एक बड़ा सहारा बनते हैं और उनका रक्षा कवच परिवारजनों के जीवन को अनेक संकटों से बचाता है. इस अहसास को जीवंत करके ही हमें पिता-दिवस को मनाने की सार्थकता पा सकेंगे.

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