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कोयलांचल में रंगदारी और कोयले की कमाई पर वर्चस्व को लेकर 29 साल में हुईंं 340 से ज्यादा हत्याएं

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Dhanbad : कोयले की काली कमाई की चमक से सभी लोग आकर्षित होते हैं और जल्दी कमाने की होड़ में अपना गैंग बनाने में जुट जाते हैं. नये लोग बंद पड़ी खदानों से अवैध उत्खनन कर करोड़ों की कमाई करते हैं और संरक्षण देनेवाले अपने आकाओं को एक बड़ी राशि रंगदारी के रूप में देते हैं. ये छोटे गैंग स्थानीय लोगों से बंद पड़ी खदानों से कोयला निकलवाते हैं. कोयले की इसी अवैध कमाई पर वर्चस्व को लेकर झारखंड के कोयलांचल में हत्याओं का दौर भी लगातार जारी है. कोयलांचल में आधे दर्जन से अधिक बड़े गैंग प्रमुख तौर पर चल रहे हैं. इनमें अधिकतर लोगों का रिकॉर्ड पुलिस के पास मौजूद है. आंकड़े बताते हैं कि पिछले 29 सालों में 340 से भी ज्यादा लोगों की हत्याएं कोयला माफियाओं ने कर दी, जबकि छोटे-छोटे प्यादे तो लगभग रोज ही मारे जाते हैं. 400 करोड़ की कमाई के लिए यह तो कुछ भी नहीं. लोग सिर्फ दिग्गजों की हत्या की ही बात करते हैं, जबकि रंगदारी के खेल में हत्याएं छुटभैयों की होती है, तो उसकी उपेक्षा कर दी जाती है.

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जिले से बाहर भी हुईं दर्जनों हत्याएं, कई हुए लापता

धनबाद में कोयले के काले धंधे पर वर्चस्व और रंगदारी को लेकर दशकों से खूनी खेल जारी है. यह खेल ऐसा है कि धनबाद से बाहर भी लोग मारे गये. मनोहर सिंह, राजू यादव, राजदेव राय आदि की हत्याएं धनबाद से बाहर रंगदारी के मामले में हुईं. बहुत से लोग लापता कर दिये गये. ऐसे लोगों की पुलिस को लाश भी नहीं मिली. इनमें प्रमुख नाम झरिया विधायक संजीव सिंह के बड़े भाई राजीव रंजन सिंह का है. उनके गायब होने के कई दशक बीत जाने के बाद भी पुलिस नहीं बता सकी है कि वह जिंदा हैं या नहीं.

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कोयलांचल में वैध रूप से चल रहीं 40 खदानें

कोयलांचल में 40 वैध खदानें हैं, जबकि इससे कहीं अधिक अवैध खनन की साइट्स हैं. यहां वैध खदानों से लगभग 1.50 लाख टन कोयले का उत्पादन होता है. इस उत्पादन में लोडिंग, अनलोडिंग और तस्करी में लगभग 400 करोड़ रुपये की रंगदारी की वसूली माफिया के गुर्गे करते हैं. वैसे पिछले 57 साल से कोयलांचल में वर्चस्व की लड़ाई चल रही है, लेकिन पिछले 29 सालों से इस लड़ाई ने हिंसक रूप ले लिया है. कोयलांचल में वर्चस्व को लेकर 340 से भी ज्यादा हत्याएं हो चुकी हैं, जिसका रिकॉर्ड पुलिस के पास है. उसके बाद भी हर रोज एक छोटा गैंग उभरकर सामने आ जाता है.

सिंह मेंशन के भाइयों में फूट का फायदा उठा रहे गैंग्स ऑफ वासेपुर के गुर्गे

कोयलांचल में अभी भी सिंह मेंशन का ही दबदबा है. अब फर्क सिर्फ यह हो गया है कि सिंह मेंशन में भी बंटवारा हो गया है और चारों भाइयों और उनके बेटों का अलग गैंग हो गया है. इतनी हत्याओं के बाद भी कोयले की अवैध काली कमाई से लोगों का मोह भंग नहीं हो पा रहा है. सिंह मेंशन में भाइयों में फूट होता देख गैंग्स ऑफ वासेपुर के गुर्गों ने अपने पांव कोयले की कालिख पर रखने शुरू कर दिये और सिंह मेंशन के सहयोगी से ही रंगदारी मांगना शुरू कर दिया. रंगदारी नहीं देने पर मौत के घाट उतारने में भी जरा भी देरी नहीं की.

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रंगदारी नहीं देने पर हुई रंजीत सिंह की हत्या

अभी एक सप्ताह पूर्व ही बीजेपी कोटा से झरिया विधायक संजीव सिंह के खासमखास माने जानेवाले झाविमो के युवा नेता रंजीत सिंह की हत्या कर दी गयी थी. इस हत्या का कारण रंगदारी थी. यह रंगदारी गैंग्स ऑफ वासेपुर के गुर्गे ने मांगी थी. वह पिछले कई महीनों से कोयले की लोडिंग पर प्रति टन पांच रुपये के हिसाब से रंगदारी मांग रहा था और नहीं देने पर जान से मारने की धमकी भी दी थी. इसकी सूचना लिखित रूप से एसएसपी को भी दी गयी थी, जिसकी भनक गुर्गे के लोगों को लग गयी और उन लोगों ने रंजीत सिंह को सरेआम गोलियों से भून डाला. इससे रंजीत सिंह की मौके पर ही मौत हो गयी. रंजीत सिंह झारखंड विकास युवा मोर्चा के जिलाध्यक्ष बने हुए थे. रंजीत सिंह की हत्या से झरिया सहित पूरा कोयलांचल हिल गया और कोयले की काली कमाई करनेवाले फिर चर्चा में आ गये.

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रंजय हत्याकांड के प्रतिशोध में हुई पूर्व डिप्टी मेयर की हत्या

धनबाद में पिछले साल 2017 में ही हुई डिप्टी मेयर नीरज सिंह की हत्या ने कोयलांचल में एक बार फिर बदले की आग को भड़का दिया है. नीरज सिंह सहित चार लोगों को 21 मार्च की शाम गोलियों से भून दिया गया था. नीरज की हत्या का आरोप उनके ही चचेरे भाई एवं स्वर्गीय सूरजदेव सिंह के बेटे संजीव सिंह पर लगा. संजीव अभी झरिया से भाजपा के विधायक हैं. पुलिस ने हत्या के आरोप में संजीव सिंह को गिरफ्तार किया है. वैसे संजीव इस हत्या के आरोपों से इनकार करते हुए कहते हैं, “भला मैं अपने चचेरे भाई की हत्या क्यों करूंगा.” इस हत्या को सिंह मेंशन के करीबी रहे रंजय सिंह की हत्या से जोड़कर देखा जा रहा है. नीरज के बाद उनके भाई एकलव्य सिंह एक बड़ा चेहरा हैं. अभी वह धनबाद नगर निगम के डिप्टी मेयर हैं. सूरजदेव सिंह के छोटे बेटे संजीव सिंह हमेशा 25 अंगरक्षकों से घिरे रहते हैं. वह झरिया से भाजपा के विधायक हैं. कई कोलियरी पर इनका कब्जा है. सूरजदेव सिंह के एक अन्य भाई सकलदेव सिंह की हत्या के बाद उनके बेटे रणविजय सिंह ने कतरास के इलाके में अपना कब्जा जमा रखा है. ये भी 23 एक्स आर्मीमैन के जत्थेवाला सुरक्षा घेरा लेकर चलते हैं. इनके घर की भी मजबूत किलेबंदी है.

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यूनियन व माफियाओं की आड़ में हुई है सबसे अधिक हत्या

दरअसल, पिछले कुछ सालों में माफियाओं ने यूनियन की आड़ में कोयलांचल में अपना वर्चस्व कायम कर लिया है. इन वर्षों में अगर सबसे ज्यादा मार किसी पर पड़ी, तो वे मजदूर हैं. करीब साढ़े तीन सौ से भी ज्यादा हत्याएं हुईं, कई की तो लाशें भी नहीं मिलीं. उन्हें बेदर्दी से जलती आग में फेंक दिया गया. कई हाई प्रोफाइल हत्याएं भी हुईं. आपसी जंग में माफियाओं ने एक-दूसरे का खूब बहाया.

इन बड़े चेहरों की कर दी गयी हत्या

कोयलांचल में रंगदारी एवं कोयला क्षेत्र में अपना साम्राज्य कायम करनेवाले बीपी सिन्हा ने 28 मार्च 1978 को आखिरी सांसें लीं. इनकी मौत के बाद से ही 1983 में सफी खान, 1984 में मोहम्मद असगर, 1986 में शमीम खान, 15 जुलाई 1998 को विनोद सिंह, 25 जनवरी 1999 को सकलदेव सिंह, वहीं 2003 में प्रमोद सिंह एवं सुशांतो सेनगुप्ता की हत्या कर दी गयी. इतना ही नहीं, जैसे-जैसे साल बढ़ता गया हत्याओं का दौर जारी रहा और 8 दिसंबर 2011 को फिर एक बड़े चेहरे सुरेश सिंह की हत्या कर दी गयी. वहीं, 29 जनवरी 2017 को विधायक संजीव सिंह के करीबी रंजय सिंह की हत्या कर दी गयी. इसके प्रतिशोध में 21 मार्च 2017 को ही पूर्व डिप्टी मेयर नीरज सिंह समेत अन्य चार लोगों को सरेशाम गोलियों भूनकर मौत के घाट उतार दिया गया. इस हत्याकांड के हुए एक साल बीता भी नहीं था कि फिर एक बार विधायक संजीव को दोबारा झटका लगा. इनके करीबी माने जानेवाले बीकेबी  आउटसोर्सिंग के साइट इंचार्ज एवं जेवीएम के युवा जिलाध्यक्ष रंजीत सिंह की हत्या कर दी गयी.

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धनबाद में बढ़ते क्राइम को देखते हुए राज्य सरकार ने दिये तीन एसपी

क्राइम कंट्रोल करने को लेकर राज्य सरकार ने जिले में तीन-तीन पुलिस अधीक्षक (एसपी) की तैनात कर दिये. फिर भी अपराधियों का मनोबल कम न होकर और बढ़ता गया. अपराधी जिसे चाहते हैं, उसे आराम से मारकर चलते बनते हैं और पुलिस कागजी कार्रवाई करने की बात कहकर अपना समय गुजार देती है. लोगों को अपराधियों को पकड़ने को लेकर आंदोलनरत होते देख पुलिस अफसरों की नींद खुलती है, तब जाकर कोई उचित कार्रवाई कर अपराधियों को पकड़ने में सफलता मिलती है.

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