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मोदी के टीके के साइड इफेक्ट

Baijnath Mishra

 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 1 मार्च को सवेरे ही कोरोना का टीका लगवा लिया. उनके पास टीके के दो विकल्प थे. पहला था सिरम इंस्टीट्यूट का कोविशिल्ड और दूसरा था-आइसीएमआर और भारत बायोटेक का कोवैक्सीन.

मोदी ने दूसरा विकल्प चुना, क्योंकि कोवैक्सीन को लेकर मोदी विरोधी जमात शुरू से ही आरोप लगा रही थी कि बिना थर्ड फेज ट्रायल शुरू हुए ही इसे मंजूरी दे दी गई, इसका पूरा डेटा सामने नहीं लाया गया, हड़बड़ी में अपनी पीठ थपथपाने के लिए मोदी ने देश के नागरिकों की जान खतरे में डालने का अपराध किया है, वगैरह-वगैरह.

चूंकि देश में इस तरह के आरोपों से विदेशों में भी इस टीके को लेकर भ्रम फैल रहा था. हमारे वैज्ञानिक, टीका विशेषज्ञ और प्रख्यात चिकित्सक बार-बार कह रहे थे कि दोनों टीके सुरक्षित हैं. लेकिन, तब पूछा जा रहा था कि यदि ऐसा है तो फिर मोदी और उनके मंत्रिमंडलीय सहयोगी यही टीका क्यों नहीं लगवा रहे हैं? मोदी ने कोवैक्सीन लगवा कर कई सवालों के जवाब दे दिये हैं.

दरअसल, कोविशील्ड पुणे के सिरम इंस्टीट्यूट ने बनायी जरूर है, लेकिन इसका मूल आधार लंदन में किया गया शोध है. इसके विपरीत कोवैक्सीन पूर्णतः भारतीय है. इसका अनुसंधान, निर्माण सब कुछ भारतीय वैज्ञानिकों ने किया है.

यानी यह आत्मनिर्भर भारत की गौरव गाथा का एक प्रमाण है. चूंकि मोदी आत्मनिर्भर भारत के लिए माहौल बनाने में लगे हैं, इसलिए वह इतनी बड़ी उपलब्धि का स्वयं इस्तेमाल नहीं करते तो विपक्ष दाना-पानी लेकर चढ़ बैठता और दुनिया हमारे अपने टीके को शक की नजर से देखने लगती.

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कोवैक्सीन को लेकर भ्रांति या इरादतन-शरारतन फैलायी जानेवाली अफवाह का आलम यह है कि छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार ने अपने राज्य के लोगों को यह भारतीय टीका लगवाने के मना कर दिया है. उसने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ हर्षवर्धन से साफ-साफ कह दिया है कि उसे कोवैक्सीन पर भरोसा नहीं है. लिहाजा, छत्तीसगढ़ में कोविशील्ड भेजी जाये.

इतना ही नहीं, कोवैक्सीन के टीके छत्तीसगढ़ सरकार ने स्टोर करके रख लिया है, अपने नागरिकों को सिर्फ कोविशील्ड ही लगवा रही है. इसके ठीक उलट मोदी विरोधी गिरोह के नये सूरमा असदुद्दीन ओवैसी का कहना है कि कोविशील्ड 64 साल से अधिक उम्र के लोगों के लिए कारगर नहीं है. उन्होंने अपने ज्ञान का आधार जर्मनी में प्रकाशित किसी जर्नल में की गयी टिप्पणी को बनाया है.

लेकिन उनका इशारा यह है कि मोदी ने कोवैक्सीन इसलिए लगवायी है कि कोविशील्ड उनकी उम्र के लिहाज से प्रभावी नहीं होती. इसके पीछे आत्मनिर्भर भारत को बढ़ावा देने और भारत प्रेम जैसी कोई बात नहीं है. इसका जवाब दिया एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने. उन्होंने कोविशील्ड वैक्सीन लगवायी और कहा कि यह सबके लिए सुरक्षित तथा प्रभावी है.

पवार, फारुख अब्दुल्ला और उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने टीका लगवा कर ओवैसी के साथ-साथ अखिलेश यादव को भी जवाब दिया है, जो इन्हें भाजपा का टीका बता रहे थे और इसके कारगर होने पर सवाल उठा रहे थे.

नरेंद्र मोदी को टीका लगने के बाद असहज महसूस कर रही कांग्रेस के दो बड़े नेताओं ने हास्यास्पद बयान दिये. राज्यसभा में प्रतिपक्ष के नेता खड़गे ने कहा कि वैज्ञानिकों ने बड़ा काम किया है, वह भी टीका लगवायेंगे, लेकिन टीका पहले युवाओं को लगना चाहिए, क्योंकि उन्हें लंबे समय तक जीना है और दुनिया देखनी है. हमलोग तो चलाचली की वेला में हैं. हमें टीके की खास जरूरत नहीं है.

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अब खड़गे साहब को कौन समझाए कि किसे किस फेज में टीका लगना चाहिए, इसका फैसला मोदी सरकार ने नहीं किया है. दुनिया भर के वैज्ञानिकों, डॉक्टरों, विश्व स्वास्थ्य संगठन के विशेषज्ञों और हमारे भारतीय चिकित्सकों ने तय किया है कि किसे पहले टीका लगना चाहिए.

इसका आधार यह है कि किन लोगों की जान ज्यादा खतरे में है और किस आयुवर्ग के लोगों की इम्युनिटी कमजोर होती है तथा कोरोना से मृत्युदर किस आयुवर्ग की ज्यादा है. उधर लोकसभा में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि दक्षिण भारतीय पोशाक पहने, असम का गमछा लपेटे, पुडुचेरी और केरल की नर्सों से टीका लेकर मोदी चुनावी संदेश दे रहे थे.

अगर कुछ कमी थी तो बस यही कि उनके एक हाथ में महर्षि अरविंद की तस्वीर और दूसरे हाथ में गीतांजलि नहीं थी. यानी सिर्फ बंगाल छूट गया. इसका जवाब डॉ हर्षवर्धन ने दिया. उन्होंने कहा कि यह उच्चतम कोटि का निकृष्टतम बयान है.

वैसे भी गुजरात का मुख्यमंत्री बनने से पहले जिन लोगों ने सवेरे-सवेरे मोदी को भाजपा दफ्तर के परिसर में बने कमरों में देखा होगा, उन्हें मालूम है कि वे लुंगी और हाफ शर्ट या हाफ गंजी पहनते थे. नर्सों का हब तो दक्षिण भारत ही है.

रही गमछे की बात तो कोरोना काल में मोदी मास्क के साथ अमूमन गमछा भी लपेटे रहते हैं और सबसे बड़ी बात यह कि यदि उन्हें इस टीकाकरण के जरिए की राजनीति करनी होती तो ऐसा तामझाम होता और प्रचार की ऐसी व्यवस्था होती कि विपक्ष भौंचक रह जाता.

लेकिन कोराना के खिलाफ लड़ाई पूरा देश लड़ रहा है, लड़ना चाहिए. यह लड़ाई अकेले केंद्र सरकार या राज्य सरकारें नहीं लड़ सकतीं.

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मोदी चाहते तो घर पर ही टीका लगवा लेते. लेकिन वे स्वयं एम्स गये. बिना प्रचार-प्रसार के. उनका संदेश यही है कि विशिष्ट लोग अस्पतालों में जायें और टीके लगवायें. इससे डॉक्टरों-नर्सों का मनोबल तो बढ़ेगा ही, जनता के बीच एक सकारात्मक संदेश पसरेगा. मोदी के टीका लगवाने के बाद लोगों का टीके के प्रति भरोसा बढ़ा है. लेकिन सवाल उठानेवाले अब भी बाज नहीं आ रहे हैं.

कुछ कह रहे हैं कि पहले खुद क्यों टीका लगवा लिया? यही लोग कहते थे कि पहले क्यों नहीं लगवाया? अब लगवा लिया तो कह रहे हैं क्यों लगवा लिया? लगवाया भी तो फोटो क्यों खिंचवायी? फोटो नहीं होती भाई लोग टीकाकरण का सबूत मांगते, ये कहते कि मोदी आदतन झूठ बोलते हैं. डॉ रणदीप गुलेरिया और दोनों नर्सें बतातीं भी कोई सुनता ही नहीं. मोदी टीका पहले भी लगवा सकते थे.

लेकिन उन्होंने टीका तब लिया जब उनका नंबर आया. पहले ही टीका ले लेते तो जनता को मरने के लिए छोड़ दिया और खुद टीका ले लिया. प्रधानमंत्री पद का दुरुपयोग कर दिया. बहरहाल, प्रधानमंत्री ने कोवैक्सीन लेकर सियासत, अफवाह और दुष्प्रचार के सभी साइड इफेक्ट खत्म ही कर दिये हैं. उन्होंने टीका को अपनी बांह में लिया, लेकिन विघ्नसंतोषियों का दिमाग वैक्सीनेट कर दिया है.

पूरी दुनिया मान रही है कि भारत ने कोरोना की लड़ाई ठीक से लड़ी. इतना बड़ा देश, बहुवर्णी, बहुधर्मी, बहुभाषी होने के बावजूद भारत एकजुट होकर लड़ा और लड़ा रहा है. भारत ने विश्व बंधुत्व की मिसाल पेश करते हुए दूसरे देशों की मदद की है.

चूंकि यह सब मोदी के नेतृत्व में हुआ और हो रहा है, इसलिए उनका गुणगाण भले ही मत कीजिए, मौन रहिए या कम से कम उन्हें गरियाए मत. कोराना पर बहुत हो चुकी सियासत, अब राष्ट्र गौरव की रवायत शुरू होनी चाहिए.

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