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मोदी का पिछड़ा एजेंडा कहीं उन्हीं को ना पड़ जाये भारी ?   

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Faisal Anurag

अच्छे दिन, विकास और न्यू इंडिया के साथ भविष्य के विकसित भारत की किसी भी तस्वीर की चर्चा इस बार प्रधानमंत्री मोदी अपने चुनाव अभियान में नहीं कर रहे हैं. उनके चुनाव अभियान का एजेंडा लगातार बदल रहा है. यदि 2014 के चुनावी भाषणों से तुलना की प्रचार एजेंडा में लगातार शिफ्ट परोक्ष रूप से बहुत कुछ रेखांकित करता है.

कोशिश यह है कि चुनाव हिंदू मुस्लिम ध्रुवीकरण के साथ पिछड़े सवाल पर केंद्रित हो. भाजपा को पता है कि इसबार के अभियान में रोजगार, किसान और सरकार की वायदाखिलाफी बेहद हावी है और भाजपा अलग नरेटिव बनाकर उसका सामना नहीं करना चाहती है. प्रधानमंत्री ने कहा कि उनके पिछड़ा होने के कारण उन्हें गालियां दी जा रही हैं और अब चोर भी कहा जा रहा है.

उन्हें पता है कि चौकीदार चोर को विपक्ष ने जिस तरह उठाया है, उससे उनकी छवि कॉरपोरेटपरस्त और किसानों, बेरोजगारों के साथ गरीबों के बुनियादी सवालों को नजरअंदाज करने वालों की बन गयी है. प्रधानमंत्री को किसने गाली दी, यह तो वे नहीं बता रहे हैं.

लेकिन उनकी पार्टी के हिमाचल प्रदेश अध्यक्ष ने राहुल गांधी को मां की गाली दी, लेकिन भाजपा का पूरा नेतृत्व,प्रधामंत्री और चुनाव आयोग इस पर खामोश है. यही नहीं चुनावों में भाषा की तमाम मर्यादाओं को तार-तार करने में उनकी पार्टी के नेता किसी से कम नहीं हैं, बल्कि कई मामलों में तो वे बीस ही साबित हो रहे हैं.

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नरेटिव यह बनाने की कोशिश है कि प्रधानमंत्री को विपक्ष पाकिस्तान के इशारे पर ही आक्रमण कर रहा है और उन्हें चुनाव में हराने के लिए वह पाकिस्तान के एजेंट के रूप में काम कर रहा है. इस नरेटिव को सरकार के कई मंत्रियों ने बनाने की कोशिश भी की है.

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान के उस बयान, जिसमें उन्होंने मोदी की सत्ता की वापसी माना की है, इसको भी कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों का प्रायोजन बनाया जा रहा है. रक्षामंत्री सीतारमण ने तो प्रेसकांफ्रेस करके यह सब कहा है. बिना कोई सबूत पेश किए इस तरह की चुनावी आरोप भाजपा लंबे समय से लगाती रही है.

गुजरात के विधानसभा चुनाव के दौरान मोदी ने मनमोहन सिंह पर आरोप लगाया था कि वे और कांग्रेस पाकिस्तान के साथ मिलकर उन्हें सत्ता से हटाने की साजिश कर रही है. बाद में राज्यसभा में अरूण जेटली ने मोदी के इस कथन पर माफी भी मांगी थी, लेकिन तब तक चुनाव के नतीजे आ चुके थे. भाजपा जब पाकिस्तान पर हमला करती है तो वह जानती है कि इससे उसे देश के एक तबके में उसे बढ़त बनाने में मदद हो सकती है. 2014 में भी ये सब मुद्दे भाजपा के कोर मुद्दे की  तरह ही थे.

लेकिन तब अच्छे दिनों का सपना और विकास का गुजरात मॉडल फैंस पर बैठे मतदाताओं को लुभाने में कारगर रहा था, इस चुनाव में भाजपा इस फेंस पर बैठे वोटरों के बीच कोई सपना बेचने में कारगर नहीं होने पर अपने कोर सवालों से ही चुनावों में आगे बढ़ रही है.

भाजपा का संकल्पपत्र भी इस बार विकास के किसी ठोस एजेंडे की बात करने में कारगर साबित नहीं हो रहा है और बेरोजगारी के सवाल पर कुछ नहीं कहा है. इससे लगता है कि यह मुद्दा चौदह वाले वोट आधार को आकर्षित नहीं कर पा रहा है.

इसका एक कारण यह है कि रोजगार को सवाल पर सरकार के वायदे विफल रहे ही, विभिन्ना संस्थाओं के शोध अध्ययन से यह वृतातं स्थापित हो चुका है कि , भारत भयावह रोजगारहीनता के दौर से गुजर रहा है और बेरोजगारी खतरे के लाल निशान को छू रहे हैं.

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पहले चरण के बाद के चुनावी रूझान से भी भाजपा में बेहद बेचैनी है. प्रधानमंत्री को पिछड़ा कार्ड के साथ गाली की बात करना यही बताता है कि वे पिछड़ी जाति का प्रतीक बनकर एकबार फिर विभिन्न कारणों से नाराज इन समुदायों में कुछ आधार विकसित कर सकते हैं.

हालांकि प्रधानमंत्री के कथन के बाद सरेश्राल मीडिया पर पिछडों ने जिस तरह की प्रतिक्रिया दी है, उससे प्रधानमंत्री की मंशा को आघात ही लगा सकता है. पिछड़ों के थिंक टैंक मोदी की उस पहल पर बात करना शुरू कर दिया है

जिसमें उन्होंने सवर्मों को आर्थिक आधार पर 10 प्रतिशत आरक्षण दिया है. आदिवासी,दलित और पिछड़ा नरेटिव यह उभरा है कि यह आरक्षण न केवल संविधान का उल्लंघन है, बल्कि इन समूहों के संवैधानिक हकों पर भी हमला है.

सोशल मीडिया पर तीखे सवाल प्रधानमंत्री से पूछे जा रहे हैं, जिसमें बहुजनों के संवैधानिक हकों पर हुए हमले की चर्चा की जा रही है. इसके साथ ही 13 प्वाइंट रोस्टर का मुद्दा भी खड़ा कर दिया गया है, जिसे उच्च शिक्षा से बहुजनों को बाहर किए जाने के मनुवादी साजिश में मोदी को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है.

यह भी कहा जा रहा है कि केवल वोट के लिए ही नरेंद्र मोदी पिछड़ा, दलित और आदिवासी की चर्चा करते हैं, लेकिन उनके अधिकारों पर सबसे ज्यादा कुठाराघात पिछले पांच सालों में ही हुआ है.

जब दिल्ली में भाजपा के समर्थकों ने संविधान को जलाया था, तब प्रधानमंत्री चुप रहे थे. इस मुछ्दे को भी खूब उछाला जा रहा है. बहुजनों का विमर्श यह भी है कि भाजपा उनका वोट तो लेती है और दिखाने के लिए उनके कुछ लोगों को हिस्सेदारी भी देती है, लेकिन उसका बहुजन विरोधी आक्रामक रूप हर मामले में दिख जाता है.

2014 की तुलना में सोशल मीडिया पर यह देखा जा रहा था कि तब नरेंद्र मोदी को बहुजनों ने खुलकर समर्थन बड़ी उन्नीद से दिया था, लेकिन इस बार सोशल मीडिया में इस समूह का बड़ा तबका उनके प्रति नाराजगी खुलकर प्रकट कर रहा है.

प्रधानमंत्री के कल के भाषण के बाद तो इस तबके ने अपना रूख बेहद कड़ा कर आलोचना और सवाल का तूफान खड़ा कर दिया है. मध्यप्रदेश, राजस्थसान, छत्तीसगढ़ के चुनावों में इन तबकों की दिखी नारजगी ने भाजपा को बार-बार अपने गोल पोस्ट को शिफ्ट करने पर बाध्य कर दिया है.

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