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मोदी सरकार चाहती है हर दिन सोने का अंडा देने वाली मुर्गी के सारे अंडे एक साथ निकालना  

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इस बार के बजट में मोदी सरकार ने भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) से कहा है कि अब अपने हर साल के जनरल फंड के सरप्लस का 75 फीसदी कंसोलिडेटेड फंड ऑफ इंडिया को ट्रांसफर करना होगा. बजट प्रस्ताव के मुताबिक, सभी खर्चों को पूरा करने के बाद सेबी को बाकी बचा फंड कंसोलिडेटेड फंड ऑफ इंडिया को ट्रांसफर कर दिया जाना चाहिए.

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सेबी को जब यह आदेश मिला तो उसके इम्प्लॉई एसोसिएशन और ब्रोकर फोरम ने इसका कड़ा विरोध किया. सेबी के चेयरमैन अजय त्यागी ने इसका लिखित जवाब भेजते हुए इस आदेश पर सवाल खड़े किये हैं, उन्होंने अपने पत्र में लिखा है कि यह हमारी वित्तीय स्वायत्तता पर हमला है.

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यह तो हुई सेबी की बात इससे पहले सरकार ने रिजर्व बैंक के ऊपर सरप्लस फंड ट्रांसफर को लेकर दबाव बना रखा है. इसी दबाब के कारण रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल ने इस्तीफा दे दिया था.

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दरअसल सरकार चाहती है कि रिजर्व बैंक अपने आपातकालीन फंड में से ढाई-तीन लाख करोड़ रुपये सरकार को ट्रांसफर कर दे. इस संबंध में रिजर्व बैंक ने विमल जालान समिति बनायी थी. जिसकी अंतिम बैठक भी हो चुकी है.

न्यूज एजेंसी ने सूत्रों के हवाले से बताया है कि 3-5 साल के अंदर अलग-अलग हिस्सों में सरकार को सरप्लस फंड ट्रांसफर करने की सिफारिश की गयी है. लेकिन कमेटी ने कितनी रकम की सिफारिश की है, यह पता नहीं चल पाया है.

यानी यह दांव भी फिलहाल फेल होता दिख रहा है. दरअसल सरकार को आज ही सारे अंडे चाहिए इसलिए वह रिजर्व बैंक पर दबाव बना रही है, कि उसे रिजर्व बैंक से इस साल डिविडेंड के रूप में 90 हजार करोड़ रुपये चाहिए.

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जो पिछले फिस्कल ईयर के मुकाबले यह 32 फीसदी ज्यादा है. उस वक्त RBI ने 68,000 करोड़ रुपये दिए थे. RBI के गवर्नर शक्तिकांत दास ने बताया कि अकाउंटिंग 30 जून को पूरी हुई है. इसके आधार पर ही ऑडिट कमिटी यह बताएगी कि RBI के पास डिविडेंड देने लायक फंड है या नहीं. ऑडिट कमेटी की रिपोर्ट के बाद RBI 90,000 करोड़ रुपये के डिविडेंड पर आखिरी फैसला लेगा.

इस डिविडेंड का कुछ हिस्सा अंतरिम डिविडेंड के रूप में सरकार तुरंत लेने के चक्कर में है. पिछली बार उसने 28,000 करोड़ रुपये अंतरिम डिविडेंड के रूप में हासिल किये थे.

सच तो यह है कि गलत आर्थिक नीतियों के कारण अंदरूनी तौर पर सरकार की वित्तीय हालत दिन ब दिन खराब होती जा रही है. रिजर्व बैंक पर फंड ट्रांसफर को लेकर वह अनावश्यक दबाव तो बना ही रही थी.

अब सेबी सरीखी नियामक एजेंसियों से भी उसे पैसा चाहिए, कल को बीमा नियंत्रण करने वाली इरडा पर भी वह ऐसा ही दबाव बना सकती है. मार्केट में भी अचानक से आयकर और जीएसटी से जुड़ी छापेमारी को इसी से जोड़कर देखा जा सकता है.

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(लेखक आर्थिक मामलों के जानकार हैं, ये इनके निजी विचार हैं) 

SP Deoghar

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