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मोदी सरकार बड़े कॉरपोरेट घरानों के हितों के लिए RBI की स्वायत्तता के साथ कर रही खिलवाड़

आरबीआई की धारा सात का इस्तेमाल करने के सरकार के फैसले से यह सवाल गहराई से उठा है और वित्त मामलों के जानकार लगातार इसे भारतीय अर्थव्यवस्था के लिये घातक कदम बता रहे हैं.

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Faisal Anurag

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यह साफ होता जा रहा है कि मोदी सरकार बड़े कॉरपोरेट घरानों के हितों के लिये रिजर्व बैंक ऑफ  इंडिया की स्वयत्तता के साथ लगातार खिलवाड़ कर रही है. आरबीआई की धारा सात का इस्तेमाल करने के सरकार के फैसले से यह सवाल गहराई से उठा है और वित्त मामलों के जानकार लगातार इसे भारतीय अर्थव्यवस्था के लिये घातक कदम बता रहे हैं. इसके साथ अब यह मामला भी स्पष्ट हो गया है कि रिजर्व बैंक के गवर्नर के रूप में रघुराम राजन ने एनपीए मामले में बडे कॉरपोरेट घरानों की सूची प्रधानमंत्री मोदी के कार्यालय के साथ वित मंत्री अरूण जेटली को भी दी थी, जिसपर सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं की और नीरव मोदी, मेहुल चौकसी, विजय माल्या संदेसरा सहित अनेक बैंकों में  घोटाला कर भारत से फरार होने में कामयाब हुए. इनमें से कई को भारत से भगाने में सीबीआई सहित सरकार के कई प्रभावी लोगों ने मदद की.

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संसदीय समिति को राजन ने बताया था कि उन्होंने एनपीए मामले में एक सूची प्रधानमंत्री कार्यालय को दी है. इसमें उन्होंने प्रधानमंत्री के नाम का उल्लेख नहीं किया था. तब सत्तारूढ़ दल के लोगों ने डा. मनमोहन सिंह के नाम का उल्लेख करते हुए बैंक घोटाले के लिए इन्हें दोषी बताने का प्रयास किया था. अब एक मीडिया संस्थान न्यूज प्लेटफॉर्म के आरटीआई का जबाव रिजर्व बेंक ने दिया है. रिजर्व बैंक ने कहा है कि रघुराम राजन ने यह सूची प्रधानमंत्री कार्यालय को 4 फरवरी 2015 को दिया था. मोदी मई 2014 में प्रधानमंत्री बने थे. रिजर्व बैंक के आरटीआई जबाव के बाद केंद्र सरकार बैकफुट पर आ गयी है. वित मंत्रालय को इसका जबाव सूझ नहीं रहा है. राजन ने 6 सितंबर 2015 को जब कहा था कि उन्होंने एक सूची पीएमओ को दी है, तब बहुत हंगामा हुआ था. रिजर्व बैंक के जवाब में यह बताया है कि इस सूची के मिलने के बाद यदि मोदी सरकार ने गंभीरता से कदम उठाया होता तो आज हालात भिन्न होते और बैंक घेटाला कर किसी को विदेश फरार होने का अवसर नहीं मिलता न ही भारतीय बैंको के सामने अभूतपूर्व वित्तीय संकट उभरता. सवाल पूछा जा रहा है कि केंद्र सरकार लगातार इस तरह के लोगों के पक्ष में क्यों हो जाती है. अपने एक भाषण में प्रधानमंत्री ने गर्व से कहा था कि इन्हें पूंजीपतियों के साथ खड़ा होने तक में कोई हिचक नहीं होती. उन्होंने  यह भी कहा था कि पूंजीपति की मेहनत और त्याग सेना से भी ज्यादा है. अब साफ हो रहा है कि मोदी इस तरह की बात करते हुए तमाम बडे कॉरपोरेट घरानों की मदद करते रहे हैं.

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न्यूज प्लेटफॉर्म ने राजन के पत्र के बाबत प्रधानमंत्री और आर्थिक मामलों के विभाग को भी आरटीआई के माध्यम से जानकारी मांगी थी. प्रधानमंत्री कार्यालय ने इस बारे में दिलचस्प जबाव दिया है. प्रधानमंत्री कार्यालय ने कहा है कि न्यूज प्लेटफॉर्म ने जिस जानकारी की मांग की है, वह आरटीआई के सूचना दायरे में नहीं आता है, इसलिए पीएमओ इस बारे में कोई भी जानकारी नहीं देगा. आर्थिक मामलों के विभाग ने कहा है कि उसे रघुराम राजन की किसी सूची के बारे में कोई जानकारी नहीं है.

भारत के बडे बैंक एनपीए के कारण गंभीर संकट से गुजर रहे हैं. पिछले चार सालों में जिस तरह बडे कॉरपोरेट घरानों को एनपीए के मामले में माफी दी गयी है, उससे भी बैंको का घाटा बढ़ा है, बैंकर्स लगातार कह रहे हैं कि वर्तमान हालात में बैंको के दिवालिया होने का संकट भी गहराता जा रहा है. भारत सरकार इस दिशा में कोई रचनात्मक पहल नहीं कर रही है. केंद्र की आर्थिक नीतियों के कारण बैंको का संकट कभी भी विस्फोटक हो सकता है.

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भारत सरकार और रिजर्व बैंक के बीच तनाव गहरा रहा है. कुछ दिनों पहले रिजर्व बैंक के एक बड़े  अधिकारी ने यह कहकर सबको चौका दिया था कि रिजर्व बैंक की स्वयत्तता के साथ खिलवाड़ नहीं किया जाना चाहिए. भारत सरकार में इसकी तीखी प्रतिक्रिया हुई और वित मंत्रालय को सरकार के बचाव में आना पडा. लेकिन अब केंद्र सरकार ने आरबीआई की धारा 7 को लागू कर साफ कर दिया है कि वह चाहती है कि रिजर्व बैंक उसके अनुकूल चले. यह विवाद तब उभरकर सामने आया, जब केंद्र ने आर्थिक संकट का हवाला देते हुए रिजर्व बैंक से सुरक्षित और जमा धनराशि की मांग की. रिजर्व बैंक ने कहा कि इससे देश तबाह हो जायेगा? वह इस तरह का कदम नहीं उठा सकता. इसके बाद ही केंद्र ने धारा 7 लागू कर दिया, जिसे आजादी के बाद से ही किसी भी सरकार ने कभी भी इस्तेमाल नहीं किया. अब आरएसएस भी कह रहा है कि रिजर्व बैंक केंद्र सरकार के अनुकूल चले या गवर्नर इस्तीफा दे दें. इस दबाव से रिजर्व बेंक की स्वयत्तता को खत्म करने को जायज ठहराया जा रहा है. इससे आने वाले वक्त के संकटों का अनुमान लगाए बिना ही खिलवाड़ किया जा रहा है.

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रिजर्व बैंक ने पिछले दिनों एनपीए के मामले में जिस तरह के कदम उठाए और बैंको पर कुछ पाबंदिया लगाकर कर्जखोर कॉरपोरेट को और कर्ज नहीं देने का आदेश दिया, बताया जाता है कि इससे भी केंद्र सरकार खुश नहीं थी. अडानी,एस्सार और टाटा की बिजली परियोजनायें फिलहाल केंद्र  सरकार की मदद से दिवालिया होने से बच गयी हैं क्योंकि इन कॉरपोरेट घरानों ने रिजर्व बैंक के 12 फरवरी 2018 के एक सर्कुलर को ठेंगा दिखा दिया है. इन कॉरपोरेट घरानों पर 1 लाख करोड़ से ज्यादा का कर्ज है. केंद्र सरकार लगातार इन घरानों को बचाने के लिए तथ्यों को झुठला रही है और स्वायत्त  संस्थानों पर हमला कर रही है.

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(लेखक न्यूज विंग के वरिष्ठ संपादक हैं )

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