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विदेश से कर्ज जुटाना कहीं भारत को विदेशी ताकतों का गुलाम बनाने की तैयारी तो नहीं

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Girish Malviya

मोदी सरकार की गलत आर्थिक नीतियों के कारण अर्थव्यवस्था तबाह हो गयी है. बढ़ते NPA के कारण बैंकिंग सेक्टर की हालत अब इतनी खराब हो चुकी है कि उसके पास MSME फर्मों को जो बड़े पैमाने पर निर्यात क्षेत्र से जुड़ी हुई है, उन्हें लोन देने के लिए पैसा नहीं है….जबकि वित्तमंत्री सदन में बतला रही हैं कि हमने NPA कम कर दिया है, सच तो यह है कि हालात इतने खराब हैं कि भारत सरकार लाखों छोटी फर्मों को करीब 14.5 अरब डॉलर का कर्ज दिलाने के लिए विदेशी ऋणदाताओं से बातचीत कर रही है.

यह खबर देने वाले अधिकारी ने नाम नहीं छापने की शर्त पर कहा कि सरकार विदेशी संस्थाओं से करीब 1 लाख करोड़ रुपये का कर्ज लेने की योजना बना रही है, क्योंकि भारतीय बैंक रोजगार सृजन के लिहाज से महत्वपूर्ण छोटे उद्यमों को पर्याप्त पूंजी मुहैया कराने की स्थिति में नहीं हैं.

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भारत में एमएसएमई की संख्या करोड़ों में हैं, जिनका देश के विनिर्माण एवं सेवा उत्पादन में एक चौथाई से भी अधिक योगदान है. अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए इनकी मदद करना बेहद जरूरी है. लेकिन देश के कुल निर्यात में 45 फीसदी हिस्सेदारी वाली इन फर्मों को कर्ज मिलने में बहुत दिक्कतें आ रही हैं, क्योंकि भारत में बैंकिंग क्षेत्र की हालत पतली है और गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियां NBFC  नकदी के भारी टोटे से जूझ रही हैं.

सरकारी बैंक अधिक कर्ज दे नहीं सकते, क्योंकि उनपर 145 अरब डॉलर के खराब कर्ज का बोझ पड़ा हुआ है. इस कारण छोटी फर्मों को कर्ज बहुत मुश्किल से मिल रहा है. यह हालत तब है, जब छोटी फर्म बैंकों को 17 फीसदी और एनबीएफसी को 20 फीसदी सालाना तक ब्याज देती हैं.

पिछले साल भारतीय रिजर्व बैंक की एक समिति ने माना है कि एमएसएमई सेक्टर को कर्ज की कुल कमी करीब 20 लाख करोड़ रुपये से 25 लाख करोड़ रुपये होने का अनुमान है. मोदी सरकार खुद अपनी संप्रभुता को विदेशों में सॉवरेन बॉन्ड जारी कर गिरवी रखने जा रही है.

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट में घोषणा की है कि सॉवरेन बॉन्ड के द्वारा विदेश से कर्ज लिया जाएगा. सूत्रों के मुताबिक, सॉवरेन बॉन्ड की पहली किस्त तीन से चार अरब डॉलर की हो सकती है. इस वित्त वर्ष के दौरान केंद्र को करीब सात लाख करोड़ रुपये के उधार की जरूरत है और सॉवरेन बॉन्ड से इसकी कुछ जरूरत पूरी की जाएगी….

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आरएसएस से जुड़ी संस्था स्वदेशी जागरण मंच (SJM) का भी मानना है कि विदेश से कर्ज लेना देशहित के खिलाफ है और इससे अर्थव्यवस्था को दीर्घकालिक जोखिम हो सकता है. इससे धनी देश और उनकी संस्थाएं हमारे देश की नीतियों के निर्धारण में दखल दे सकती हैं.

इसी संगठन के अश्विनी महाजन कह रहे हैं कि जो हालत अर्जेंटीना और टर्की की हुई, वह हमारी हो जाएगी ‘हम उन देशों का उदाहरण देख चुके हैं, जिन्होंने अपने सरकारी घाटे की भरपाई के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजारों से लोन लिया है. उन देशों का अभी तक का अनुभव अच्छा नहीं रहा है…

SMILE

देश के बड़े अर्थशास्त्री भी इस सॉवरेन बॉन्ड विदेश में जारी करने की नीति के खिलाफ है. आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने आशंका जताई है कि सरकार की इस योजना से वास्तव में कोई लाभ नहीं होने वाला है और यह कदम जोखिमों से भरा है.

‘विदेश में बॉन्ड की बिक्री से घरेलू सरकारी बॉन्ड की मात्रा कम नहीं होगी, जिनकी बिक्री स्थानीय बाजार में करनी है. देश को विदेशी निवेशकों के उस रुख की चिंता करनी चाहिए, जिसमें वे भारतीय अर्थव्यवस्था में बूम रहने पर खूब निवेश करते हैं और जैसे ही सुस्ती आती है, निवेश से कन्नी काट लेते हैं….

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आरबीआई के तीन पूर्व अधिकारियों ने भी केंद्र सरकार की इस योजना का विरोध किया है. उनका कहना है कि अभी इस योजना के क्रियान्वयन का वक्त नहीं है, क्योंकि भारत बड़े बजट घाटे से जूझ रहा है…

अर्थशास्त्री और योजना आयोग के उपाध्यक्ष रहे मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने मोदी सरकार को विदेशी बॉन्ड बाजार का उपयोग करते हुए धन जुटाने की योजना को टालने का सुझाव दिया है. अहलूवालिया  कहते हैं, ‘हमें लगता है कि इससे लाभ के बजाए नुकसान ज्यादा होगा.’

उन्होंने कहा कि अगर आप चाहते हैं कि अधिक विदेशी धन यहां आये तो आप विदेशी मुद्रा में सीधे उधार क्यों लेना चाहते हैं? आप उन्हें पैसा लाने दीजिए तथा उन्हें यहां बॉन्ड खरीदने दीजिए. दरअसल सार्वजनिक बॉन्ड की बिक्री विदेशी निवेशकों को करने से केवल विदेशी मर्चेन्ट बैंकरों को ही फायदा होगा. वह धन की व्यवस्था करने के लिए भारी कमिशन हासिल करेंगे…

यानी साफ है कि देश के बड़े अर्थशास्त्री जो स्वतंत्र रूप से सोचते हैं, वह मोदी सरकार की इस सॉवरेन बॉन्ड योजना के खिलाफ हैं. आरएसएस का स्वदेशी जागरण मंच भी इसके खिलाफ है, लेकिन उसके बावजूद मोदी सरकार विदेशों से कर्ज लेकर घी पीने-पिलाने पर लगी हुई है. अब तो वह चाहती है कि न सिर्फ सरकार बल्कि देश की छोटी-बड़ी कंपनियां भी विदेशों से कर्ज ले लें…

अगर मोदी सरकार को ऐसे कदम उठाने से रोका नहीं गया तो आज जो आप पाकिस्तान की आर्थिक हालात देख कर हंसते हो, कल को अपने देश भारत की भी यही हालत हो सकती है…

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(लेखक आर्थिक मामलों के जानकार हैं, ये उनके निजी विचार हैं)

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