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जयंत सिन्‍हा के खेद में मॉब लिंचिंग की निंदा नहीं है

क्‍या सचमुच जयंत सिन्‍हा को मॉब लिंचिंग के अपराधियों का स्‍वागत करने और उनका उत्साह बढ़ाने का खेद है.

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Faisal Anurag

क्‍या सचमुच जयंत सिन्‍हा को मॉब लिंचिंग के अपराधियों का स्‍वागत करने और उनका उत्साह बढ़ाने का खेद है. यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्‍योंकि मीडिया से बात करते हुए उन्‍होंने कहा है कि उन्‍हें इस बात का खेद है, लेकिन मीडिया में छपी रिपोर्ट की भाषा देखकर यह सवाल गंभीर हो जाता है. श्री सिन्‍हा ने कहा है कि यदि मेरे काम से गलत संदेश गया है तो मैं खेद जताता हूं. तो क्‍या सोशल मीडिया और देशभर की मीडिया में हुयी उनकी आलोचना से उन्‍हें खेद व्‍यक्‍त करने की जरूरत महसूस हुयी है या फिर वे सच में मानते हैं कि जिन लोगों ने मॉब लिंचिंग में हत्‍या की है और कोर्ट ने जिसे सजा दे ही है वे अपराधी हैं और उनका साथ देकर इन्होंने गलत किया है. इस सवाल का जबाव शायद ही जयंत सिन्‍हा दें, लेकिन हावर्ड में पढ़े जयंत सिन्‍हा के इस स्‍वागत कार्यक्रम से सचेत लोगों में क्षोभ पैदा हुआ है. उसकी आंच हावर्ड तक पहुंच गयी है. हावर्ड  यूनिवर्सिटी को चालीस हजार से ज्‍यादा इमेल मिला है, जिसमें कहा गया है कि श्री सिन्‍हा की डिग्री को हावर्ड वापस ले और उनकी निंदा करें.  इस तरह के मेल से श्री सिन्‍हा की छवि पर बुरा असर पड़ रहा है, इससे वे सचेत हैं. उनके सामने एक ओर अपनी छवि बचाने का संकट है और दूसरी ओर वेटबैंक को ध्रवीकृत करना.

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जयंत सिन्‍हा की एक परेशानी उनके पिता यशवंत सिन्‍हा भी हैं, जो लगातार मोदी विरोधी अभियानों में भाग ले रहे हैं और मोदी राज की आर्थिक नीतियों पर तार्किक हमला कर रहे हैं. ऐसे में जयंत सिन्‍हा को खतरा लग रहा है कि कहीं पिता के मुखर विरोध का शिकार उन्‍हें भाजपा में न होना पड़े इसलिए इन्हें कट्टर  छवि बनाने की जरूरत है. सवाल उठता है कि मोदी सरकार के दो मंत्रियों  ने जिस तरह सांप्रदायिक नफरत करने वालों के साथ खुद को खड़ा किया और जिस पर देशभर में प्रतिक्रिया हुयी, उसपर भारतीय जनता पार्टी और मोदी सरकार ने चुप्‍पी साध रखी है. चुप्‍पी से ऐसा लगता है कि इन दोनों का समर्थन इन मंत्रियों के साथ है,  इससे मॉब लिंचिंग करनेवालों और दंगा करने वालों का उत्‍साह बढ़ा ही है, जो देश की शांति व्‍यवस्‍था के लिए खतरनाक है. जब कांग्रेस सत्‍ता में थी तो भाजपा विपक्ष की हैसियत से मंत्रियों का इस्‍तीफा मांगती थी, लेकिन मोदी राज में यह नियम सा बन गया है कि विपक्ष या कोई भी मंत्रियों के खिलाफ कितना भी गंभीर आरोप क्‍यों ना लगाए, उन पर इस्‍तीफा का दबाव नहीं बनाया जाएगा. इससे गलत कार्य के लिए प्रोत्‍साहन ही मिलता है.

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मोदी सरकार के अनेक मंत्रियों और भाजपा के अनेक नेताओं ने अनेक बार ऐसी  गतिविधयां की हैं, जिसकी भारी आलोचना हुयी है, लेकिन उन्‍हें खेद व्‍यक्‍त करने तक जरूरत महसूस नहीं हुयी है. लोकतंत्र विमर्श से चलता है और उसमें विरोधियों  की आलोचना का भी भारी महत्‍व है, लेकिन भारतीय लोकतंत्र की विडंबना यह हो गयी है कि जिम्‍मेदारी के पदों पर बैठे व्‍यक्ति आमतौर पर बिना किसी भय के अनर्गल बयान देते हैं और समाज में घृणा फैलाने वालों के प्रति सहानुभूति दिखाते हैं, कोई भी स्‍वस्‍थ लोकतंत्र इसे सहन नहीं कर सकता है, यदि इसे आज सहा जा रहा है तो मानना होगा कि हमारे लोकतंत्र के स्‍वास्‍थ्‍य की स्थिती गलत दिशा ले रही है. वक्‍त रहते इसका इलाज जरूरी है. जयंत सिन्‍हा के साथ गिरिराज सिंह ने जिस तरह दगा करने वालों के साथ सहानुभूति दिखायी है, उसे तो भाजपा के सहयोगी जदयू भी सही नहीं मान रही है.  गिरिराज सिंह विवादास्‍पद बयान देने के लिए जाने जाते हैं और उनका मुस्लिम विद्वेश अक्‍सर उजागर होता रहता है. यही उनकी राजनीतिक ताकत भी है और भाजपा में प्रमुख बने रहने का कारण भी.

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जैसे-जैसे लोकसभा चुनावों का समय नजदीक आ रहा है, सामाजिक नफरत से भरे बयानों ओर गतिविधयों में तेजी भी आ रही है. हो सकता है कि इससे किसी को लगे कि वह चुनाव जीत सकता है. लेकिन वास्‍तव में वह लोकतंत्र की कब्र ही खेद रहा होता है.  दुनियाभर की कई संस्‍थाओं ने भारत में सामाजिक और सांप्रदायिक तनाव और नफरत को लेकर सख्‍त टिप्‍प्‍णी भी की है, इसका असर भार की वैश्विक छवि पर भी पडता है. इसे नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए. यह सर्वविदित है कि मॉब लिंचिंग और दंगा कराने वालों को आर्थिक सहयोग भी इस तरह के नेता करते हैं और कोर्ट में उनके केस लड़ने का खर्च भी वहन करते हैं.

जयंत सिन्‍हा को यदि वास्‍तव में अपने कृत्‍य पर खेद है तो उन्‍हें स्पष्ट रूप से  मॉब लिंचिंग की निंदा करनी चाहिए. इसमें शामिल अपराधियों की भी निंदा करते हुए उन्हें सजा दिलाने का प्रयास करना चाहिए. वे एक मामूली सांसद भर नहीं हैं बल्कि एक जिम्‍मेदारी के पद पर हैं और सबका साथ उनकी सरकार की प्राथमिकता है.

(लेखक न्यूज विंग के वरिष्ठ संपादक हैं और ये उनके निजी विचार हैं.)

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